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क्या भारत सिर्फ हिंदुओं का और हिंदुओं के लिए है?
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, नई दिल्ली
चंद हफ़्ते पहले त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की ज़बरदस्त जीत के बाद राज्य में पूर्व की वामपंथी सरकार के दौर में स्थापित की गई रूसी क्रांति के नेता लेनिन की मूर्तियों को उखाड़ दिया गया था.
इस घटना के एक दिन बाद तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ द्रविड़ आंदोलन के नेता पेरियार की मूर्ति भी क्षतिग्रस्त की गई. कई जगहों पर दलित नेता आंबेडकर की मूर्ति भी तोड़ी गई.
साथ ही जवाहर लाल नेहरू की मूर्ति को भी नुकसान पहुंचाने की ख़बर आई. नेहरू स्वतंत्रता के बाद देश में पश्चिम की तर्ज़ पर धर्मनिरपेक्ष सरकार चलाने के लिए जाने जाते हैं.
विश्लेषक शोमा चौधरी मानती हैं कि इन मूर्तियों को इस तरह नुक़सान पहुंचाना बहुत गंभीर मामला है.
वो कहती हैं, "ये सिर्फ़ चुनावी राजनीति नहीं है. ये समाज और संस्कृति के नाम पर एक जंग की तैयारी हो रही है. इसके पीछे उस मानसिकता का हाथ है जो ये सोचते हैं कि जो भी शख़्स बाहर से आया है उसके लिए भारत में कोई जगह नहीं है."
आर्य असल भारतीय हैं?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के संस्थापकों का ख़्याल था कि आर्य नस्ल के लोग असल भारतीय हैं और हिंदुओं की दो अहम किताबें 'महाभारत' और 'रामायण' सिर्फ़ धार्मिक किताबें नहीं बल्कि ऐतिहासिक हक़ीक़त हैं और उनके पात्र हज़ारों साल पहले हक़ीक़त में वजूद में थे.
उनका ख़्याल है कि इस्लाम, ईसाइयत और वामपंथ जैसी 'बाहरी' अवधारणाओं ने हिंदू संस्कृति और सभ्यता को गहरा नुक़सान पहुंचाया है. आरएसएस और बीजेपी जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों की राय ये भी है कि ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में लिखे गए देश के इतिहास की किताबों में संस्कृति और सभ्यता के बड़े दौर और उसकी कामयाबियों को कमतर किया गया और उसे ग़लत तरीके से बताया गया.
उनके हिसाब से 'भारत हिंदुओं का है, हिंदुओं के लिए है.' आरएसएस के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य का कहना है कि 'भारत के इतिहास का असली रंग भगवा है और हमें देश में सांस्कृतिक बदलाव लाने के लिए इतिहास को जल्द ही लिखना होगा.'
इतिहास की समीक्षा
मोदी सरकार ने कुछ समय पहले इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और संस्कृति के स्कॉलरों की एक कमेटी बनाई है बताया जा रहा है कि वो ये साबित करेगी कि मौजूदा हिंदू भारत में सबसे पहले बसने वाले असली लोगों की ही संतानें हैं.
ये भी जानकारी दी जा रही है कि ये कमेटी पुरातात्विक, प्राचीन पांडुलिपियों और डीएनए के आधार पर ये साबित करने की कोशिश करेगी कि मौजूदा हिंदू ही देश में हज़ारों बरस पहले आबाद होने वाले लोगों की नस्लें हैं.
इतिहासकारों की यह कमेटी ये भी साबित करेगी कि हिंदुओं की प्राचीन धार्मिक किताबें सिर्फ़ कहानियां नहीं ऐतिहासिक हक़ीक़त हैं और उसके पात्र असली हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इस कमेटी के अधिकतर सदस्यों और बीजेपी के कुछ मंत्रियों से इंटरव्यू के बाद लिखा है कि मोदी सरकार की मंशा सिर्फ़ राजनीतिक शक्ति हासिल करने तक सीमित नहीं है 'वो भारत की राष्ट्रीय पहचान को अपने इस धार्मिक नज़रिए से पुख़्ता करना चाहते हैं कि भारत हिंदुओं का और हिंदुओं के लिए है.'
हिंदू मध्य एशिया से आए थे?
भारत के स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है कि आर्य नस्ल के लोग तीन से चार हज़ार साल पहले मध्य एशिया से भारत आए और अधिकतर हिंदू उन्हीं की नस्लें हैं.
ये अवधारणा ब्रिटिश इतिहासकारों ने स्थापित की थी लेकिन हिंदू राष्ट्रवादी इस विचार को अस्वीकार करते हैं. उनका कहना है कि आर्य यहीं के थे और वही भारत के असली लोग थे जिनके वो वारिस हैं.
इतिहासकार रोमिला थापर का कहना है कि राष्ट्रवादियों के लिए ये बिंदु बहुत महत्वपूर्ण है कि सबसे पहले यहां कौन था? 'क्योंकि अगर वो हिंदू राष्ट्र में हिंदुओं की बढ़त क़ायम करना चाहते हैं तो उसके लिए लाज़िमी है कि वो ये दिखाएं कि उनका धर्म बाहर से नहीं आया.'
संस्कृत वैज्ञानिक और सर्वोत्तम भाषा!
प्रमुख स्तंभकार तवलीन सिंह का कहना है कि देश के प्राचीन इतिहास की समीक्षा के लिए प्रधानमंत्री ने जो कमेटी बनाई है उसका स्वागत किया जाना चाहिए.
वो लिखती हैं, "भारतीय बच्चों को ये हक़ है कि वे ये जानें कि अयोध्या में एक राजा थे जिनका नाम राम था या फिर वो एक कहानी के राजा थे. उन्हें इस संस्कृति के बारे में जानने का हक़ है जिसने हज़ारों बरस पहले संस्कृत जैसी वैज्ञानिक और सर्वोत्तम भाषा बनाई, वो कौन लोग थे? क्या वो मध्य एशिया या पूर्व से आए थे जैसे कि हमें वामपंथी इतिहासकार बताते आए हैं, या फिर प्राचीन नदी सरस्वती के किनारे आबाद कोई संस्कृति थी जो उस नदी के साथ ही मिट गई.'
हिंदुत्व का नज़रिया हीनभावना पर आधारित?
'व्हाई आई एम हिंदू' के लेखक शशि थरूर का कहना है इतिहास को हिंदू रंग देने का मक़सद हिंदुत्व के नज़रिए को केंद्रित करना है. '
हिंदुत्ववादियों के साथ एक मसला ये है कि उनका हिंदुत्व का नज़रिया हीनभावना पर आधारित है. उन्हें लगता है कि हिंदुओं पर एक हज़ार साल पहले हमला होता रहा, उन पर ज़ुल्म किया गया और उन्हें अपमानित किया गया. उनके ख़्याल में उनके लिए ये जवाब देने और अपने की शीर्ष बनाने का मौक़ा है.'
इतिहासकार रोमिला थापर कहती हैं कि पश्चिम एशिया के देश को जो इतिहास विरासत में मिला वह साम्राज्यवादी इतिहासकारों या उनसे प्रभावित इतिहासकारों ने लिखा था.
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