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आख़िर कोबरापोस्ट के स्टिंग में कितनी सच्चाई है?
- Author, जस्टिन रॉलेट
- पदनाम, दक्षिण एशिया संवाददाता
कोबरापोस्ट का 'ऑपरेशन 136' एक ऐसा स्कैंडल है जो भारतीय लोकतंत्र के एक अहम स्तंभ 'प्रेस की आज़ादी' पर ज़ोरदार हमले का दावा करता है.
इसके बावजूद भारतीय न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में इससे जुड़ी ख़बरें नज़र नहीं आईं.
इसकी एक वजह ये है कि इसमें कई प्रतिष्ठित भारतीय मीडिया संस्थानों पर आरोप लगाए गए हैं.
न्यूज़ वेबसाइट कोबरापोस्ट ने हाल ही में मीडिया संस्थानों पर एक स्टिंग ऑपरेशन किया है.
कोबरापोस्ट वेबसाइट दावा करती है कि स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया है कि देश के बड़े मीडिया समूहों में सत्तारूढ़ दल बीजेपी की ओर गहरा झुकाव है.
इसके साथ ही कई बड़े मीडियाकर्मी और पत्रकार धन लेकर राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए तैयार दिखाई दिए.
स्टिंग का नाम 'ऑपरेशन 136' क्यों?
कोबरापोस्ट एक छोटा लेकिन विवादित मीडिया समूह है जो अपने अंडरकवर स्टिंग ऑपरेशन के लिए चर्चित है.
ख़ुद को एक ग़ैर-लाभकारी न्यूज़ समूह के तौर पर पेश करने वाला कोबरापोस्ट मानता है कि भारत में इतनी ज़्यादा 'पत्रकारिता' हो रही है कि इसका 'महत्व कम हो गया' है.
कोबरापोस्ट ने अपने स्टिंग को 'ऑपरेशन 136' नाम दिया है. दरअसल, साल 2017 की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम रैंकिंग में भारत का स्थान 136वां था.
कोबरापोस्ट के मुताबिक़ उसकी रिकॉर्डिंग्स दिखाती हैं कि भारत के बड़े मीडिया समूहों में से कुछ समूह "लोगों में सांप्रदायिकता ही नहीं बल्कि किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष में चुनावी नतीजों को भी झुकाने" के लिए तैयार हैं.
इसके साथ ही ये मीडिया समूह पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं.
इस तरह के अंडरकवर स्टिंग ऑपरेशन ज़्यादातर विश्वास करने लायक नहीं होते हैं.
इस तरह लिए गए साक्षात्कारों में वीडियो एडिटिंग की मदद से सवालों और उनके जवाबों को तोड़-मरोड़ कर अपनी सुविधा के हिसाब से पेश किया जा सकता है.
कोबरापोस्ट के एक अंडरकवर रिपोर्टर पुष्प शर्मा कहते हैं कि उन्होंने भारत के 25 से ज़्यादा मीडिया समूहों से संपर्क किया और सभी को एक तरह की पेशकश की.
स्टिंग ऑपरेशन में दावा करते हुए वे कहते हैं कि वो एक ऐसे आश्रम और संगठन से आए हैं जिसके पास बहुत पैसा है.
ये संगठन आगामी चुनावों में हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने के लिए बेशुमार धन देने के लिए तैयार है.
शर्मा ने बताया कि उन्होंने मीडिया समूहों के सामने आश्रम की ओर से एक तीन तरह की रणनीति पेश की.
क्या थी वो रणनीति?
शर्मा ने मीडिया संस्थानों को प्रस्ताव दिया कि 'सॉफ़्ट हिंदुत्व' को प्रमोट करें; ऐसा करने के लिए भगवान कृष्ण के वचनों और भगवद् गीता की कहानियों को प्रमोट किया जा सकता है.
इसके बाद दूसरे चरण में बीजेपी के राजनीतिक विरोधियों, खासकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को निशाने पर लिया जाए.
फिर तीसरे और अंतिम चरण में हिंदुत्व के पोस्टर बॉय की छवि वाले नेताओं के भाषणों को प्रमोट किया जाए.
शर्मा ने कुछ मीडियाकर्मियों को ये भी समझाया कि तीसरे चरण के पीछे ये विचार है कि इससे मतदाताओं का ध्रुवीकरण किया जाए. इसमें आशा की जा रही थी कि इससे चुनाव के दौरान बीजेपी को फ़ायदा मिलेगा.
वायरल वीडियोज़ और जिंगल्स
कोबरापोस्ट वेबसाइट कहती है कि इसने टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे दिग्गज अख़बार के साथ भी बातचीत की जो पूरे भारत ही नहीं, दुनिया में सबसे ज़्यादा बिकने वाला अख़बार है.
इसके अलावा, अंग्रेजी अख़बार द न्यू इंडियन एक्सप्रेस और इंडिया टुडे ग्रुप से संपर्क किया जो देश में कई लोकप्रिय टीवी चैनलों को चलाता है.
हिंदी भाषा के अख़बार और क्षेत्रीय मीडिया समूहों से भी संपर्क किया गया था.
कोबरापोस्ट के मुताबिक़, दो संस्थानों को छोड़कर दो दर्जनों से ज़्यादा मीडिया समूहों ने कहा कि वह इस प्लान पर विचार करना चाहते हैं.
कोबरापोस्ट वेबसाइट पर प्रकाशित साक्षात्कारों में मीडिया कर्मी, संपादक और पत्रकार बात करते दिखे हैं कि वे शर्मा के प्रस्ताव पर किस तरह काम कर सकते हैं.
'हिंदुत्व एजेंडा' के लिए अलग-अलग टीमें
मीडिया समूह अलग-अलग सुझावों के साथ सामने आए जिनमें अघोषित 'एडवर्टोरियल', पेड न्यूज़ और स्पेशल फीचर्स छापा जाना भी शामिल है.
कुछ समूहों ने कहा है कि वो स्पेशल टीमें बनाएंगे जिससे आश्रम के उद्देश्यों को पूरा किया जा सके.
इस दौरान वायरल वीडियोज़, जिंगल, क्विज़ और इवेंट्स बनाने की बात भी हुई.
कोबरापोस्ट ने कुछ मजबूत मीडिया संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं.
किसी अन्य लोकतांत्रिक देश में अगर ऐसा स्कैंडल सामने आता तो इसे ख़बरों में जगह मिलती और जनता की ओर से भी विरोध प्रदर्शन देखे जाते.
इतना कुछ होने के बावजूद भारत के चुनिंदे मीडिया संस्थाओं (द वायर, स्क्रॉल और द प्रिंट) ने ही अपनी वेबसाइटों में जगह दी है.
रिवर्स स्टिंग का मतलब क्या है?
कोबरापोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन में जिन मीडिया समूहों को निशाना बनाया गया है, उन्होंने अपना स्पष्टीकरण दिया है.
ऐसे मीडिया समूहों ने कहा है कि किसी भी तरह का ग़लत काम नहीं किया गया है और अंडरकवर रिपोर्टर के साथ हुई बातचीत के वीडियो की एडिंटिंग की गई है ताकि इन वीडियोज़ में हुई बातचीत का असली मतलब बदला जा सके.
उदाहरण के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया कहता है कि "ये सामग्री की डॉक्टरिंग और फ़र्जीवाड़े का मामला" है और कोबरापोस्ट ने जिन मीडिया समूहों का नाम लिया है उनमें से कोई भी "किसी भी तरह के ग़ैरक़ानूनी और अनैतिक काम के लिए तैयार नहीं हुआ और कोई भी कॉन्ट्रेक्ट पर हस्ताक्षर" नहीं किया गया था.
कोबरापोस्ट के वीडियोज़ में बेनेट कॉलमेन समूह के प्रबंध निदेशक विनीत जैन दिखाई देते हैं जो काम के बदले कितनी रक़म ली जाए, इस मुद्दे पर बात कर रहे थे.
विनीत जैन ने कहा था कि वह लगभग एक हज़ार करोड़ रुपए चाहते हैं, लेकिन इसमें से आधे पर तैयार हो गए.
इसके अलावा इस मुद्दे पर भी बात हुई कि भुगतान कैश में किया जा सकता है जिससे टैक्स से बचा जा सके.
बेनेट कॉलमेन ने इसके बाद से किसी भी तरह की बेईमानी से इनकार किया है.
यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में एक लेख भी छापा गया है जिसमें बताया गया है कि उन्होंने कोबरापोस्ट के साथ ही स्टिंग ऑपरेशन कर दिया है.
लेख बताता है कि समूह के बड़े अधिकारी पहले से जानते थे कि शर्मा एक बहरूपिया हैं और जानबूझकर इस प्रस्ताव को सुनने के लिए तैयार हुए ताकि "धोखेबाज को फंसाकर उसके असली मक़सद को सामने लाया जा सके".
इंडिया टुडे समूह ने भी कुछ भी ग़लत करने से इनकार किया है.
कंपनी ने एक बयान जारी करके कहा है कि कंपनी के प्रबंधक किसी तरह के अनैतिक काम नहीं करेंगे और अपने चैनलों पर ऐसे विज्ञापन नहीं चलाएंगे जो देश को धार्मिक और जाति के आधार पर बांटते हों.
डूबेंगे या उतर जाएंगे?
लेकिन न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने कहा है कि इसमें किसी तरह की संपादकीय समस्याएं नहीं हैं क्योंकि ये मुलाक़ातें अंडरकवर रिपोर्टर और विज्ञापन लेकर आने वाले कर्मचारियों के बीच हुई थीं और उनके बीच बातचीत भी विज्ञापन को लेकर हुई थी.
इस अख़बार ने भी कहा है कि वो भी कभी ऐसे विज्ञापन स्वीकार नहीं करेगा जो कि सांप्रदायिक तनाव पैदा करे और कर्मचारियों ने ये साफ़ कर दिया था कि कोई भी विज्ञापन पहले क़ानूनी रूप से जांचा जाएगा.
इसमें कोई शक नहीं है कि कोबरापोस्ट के आरोपों को शक की निगाह से देखा जाना चाहिए, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि वे भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर शक पैदा करते हैं.
दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र अगर प्रेस की आज़ादी की रैंकिंग में नीचे की ओर जाने लगे तो ये अपने आप में राष्ट्रीय शर्म की बात है.
अगर ये आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो इसमें कोई शक नहीं है कि भारत इस रैंकिंग में और नीचे चला जाएगा.
न्यूज़ वेबसाइट स्क्रोल ने जो हेडलाइन लगाई है वो उस चुनौती को बयां करता है जिसका ये देश सामना कर रहा है.
स्क्रोल की हेडलाइन कहती है, "कोबरापोस्ट एक्सपोज़ दिखाता है कि भारतीय मीडिया डूब रहा है...अब या तो हम डूब जाएं या इसका सामना करें."
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