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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई आख़िर क्यों हुई
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुधा भारद्वाज का जन्म अमरीका के मैसाच्युसेट्स में हुआ था, उनके माता-पिता के भारत वापस लौटने के बाद उन्होंने अपना अमरीकी पासपोर्ट छोड़ दिया था.
आगे चलकर वो एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बनीं और ट्रेड यूनियन में भी शामिल रहीं. वो खनिजों से समृद्ध छत्तीसगढ़ में हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों के अधिकारों के लिए लड़ती रहीं हैं.
छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य हैं, जहां देश के कुछ सबसे ग़रीब और शोषित लोग रहते हैं.
56 साल की सुधा देश की एक बड़ी यूनिवर्सिटी में लॉ पढ़ाती हैं. उन्होंने आदिवासी अधिकार और भूमि अधिग्रहण पर एक सेमिनार में हिस्सा लिया था.
छत्तीसगढ़ में तीस सालों तक ग़रीबों के लिए काम करने वाली सुधा, न्याय के लिए लड़ रहे कई लोगों की उम्मीद बन गईं. उन्होंने 2015 में एक पत्रकार से कहा था, "मैं जानती हूं कि कई लोग मेरे दुश्मन बन जाएंगे, इसके बावजूद मैं अपना संघर्ष जारी रखूंगी."
अब लग रहा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी उनकी वही दुश्मन बन गई है. मंगलवार को चार कार्यकर्ताओं और वकीलों समेत उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया.
विवादास्पद क़ानून की आलोचना
इन सभी की गिरफ्तारियां देश के अलग-अलग शहरों से हुई हैं. पुलिस का कहना है कि जाति आधारित हिंसा की एक घटना और माओवादियों से संबंधों के चलते इन्हें गिरफ्तार किया गया है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार माओवादियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताया था.
गिरफ्तार लोगों में 78 साल के वरवर राव का नाम भी शामिल हैं. राव एक सम्मानित लेखक, वामपंथी और माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले शख्स हैं. उनका कहना है कि वो वामपंथ, आदिवासियों और गरीबों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं.
गौतम नवलखा नागरिक अधिकारों के लिए काम करते रहे हैं और एक मशहूर अंग्रेज़ी पत्रिका के संपादकीय बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं.
कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा और वरनॉन गोंज़ाल्विस मंबई के रहने वाले हैं. मार्च में इन दोनों ने मिलकर न्यूज़ वेबसाइट, द वायर के लिए एक आर्टिकल लिखा था, जिसमें उन्होंने भारत सरकार के एक विवादास्पद कानून की आलोचना की थी.
पुलिस का कहना है कि इन कार्यकर्ताओं ने पिछले दिसंबर के दौरान महाराष्ट्र में हुई एक बड़ी जन रैली में दलितों को उकसाया था, जिसकी वजह से हिंसक झड़पें हुई और एक व्यक्ति की मौत भी हो गई थी. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से कहा, "इन बुद्धिजीवियों के उकसावे पर हिंसा हुई. ये इनकी माओवादी गतिविधियों का हिस्सा है."
इन गिरफ्तारियों की देशभर में आलोचना हो रही है.
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर लिखा, ''ये बेहद हैरान करने वाली बात है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को जल्द से जल्द दखल देना चाहिए.''
वहीं द प्रिंट के संपादक शेखर गुप्ता ने ट्वीट किया, "जिन लोगों से आप सहमत नहीं है, उन्हें आप चरमपंथी कहकर बंद नहीं कर सकते हैं."
कुछ लोगों का कहना है कि इन कार्रवाइयों ने 1975 के आपातकाल की यादें ताज़ा कर दी हैं, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया था, विपक्षी नेताओं और पत्रकारों को जेल में डाल दिया था और मीडिया पर नकेल कस दी थी."
हालांकि भारत में किसी को भी असहमति जताने की हक है और ऐसे मामलों का लंबा इतिहास रहा है, जहां लोगों ने असहमति जताई.
लेकिन बाद की सरकारें कुछ समूहों की मांगों के आगे झुकती रही हैं. सलमान रुश्दी की 1988 में आई किताब 'द सैटेनिक वर्सेज़' पर बैन लगाने वाला भारत पहला देश था. कई मुस्लिमों ने इसकी निंदा की थी.
असहमति का दौर
कई छोटे राइट-विंग हिंदुत्व समूहों के दबाव में आकर अंतरराष्ट्रीय पब्लिशरों को किताबें नष्ट करने को कहा गया.
देश के जाने-माने कलाकार एमएफ़ हुसैन पर कट्टरपंथी हिंदुत्व संगठनों ने अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाया था, जिसके बाद उन्हें देश से बाहर निकाल दिया गया.
ब्रिटिश ज़माने के कानून देश में आज भी लागू हैं और बोलने की आज़ादी के अधिकारों को कमज़ोर कर रहे हैं.
सरकारें दशकों से छात्रों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार की आलोचना करने वालों के ख़िलाफ औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे देशद्रोह के एक कानून का इस्तेमाल करती रही है.
भारत सरकार अक्सर कानून का राज स्थापित करने में कमज़ोर साबित हुई है, लेकिन अपने ख़िलाफ आवाज़ उठाने वालों के प्रति वो हमेशा ही कठोर रहती है.
लेकिन कई लोग पुरानी सरकारों और आज की सरकार में एक अंतर बताते हैं. वो कहते हैं कि मौजूदा सरकार खुद से असहमत लोगों पर संगठित अभियान चलाकर निशाना साध रही है.
राष्ट्र विरोधी कौन
नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी पर सांप्रदायिकता की राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं. जो लोग मोदी सरकार और उनकी पार्टी की आलोचना करते हैं, उन्हें "अर्बन माओवादी" या राष्ट्र विरोधी करार दे दिया जाता है. कुछ वैसे ही, जैसे अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पत्रकारों को "लोगों का दुश्मन" कहते रहे हैं.
देश में मॉब लिंचिंग की घटनाओं ने भी कई सवाल खड़े किए हैं. इसके अलावा सरकार समर्थित न्यूज़ चैनलों के प्राइम टाइम पर होने वाली बहसों में सरकार के खिलाफ बोलने वालों को टारगेट किया जाता है और एंकर चिल्लाकर उन्हें चुप करा देते हैं.
नरेंद्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से गौरक्षक समूहों ने कम से कम 20 लोगों को पीट-पीट कर मार दिया है. इनमें से ज़्यादातर लोग मुस्लिम थे, और इन्हें बीफ ले जाने के आरोप में मारा गया.
घरों और चौराहों पर खड़े लोग भविष्य में हिंदुत्व के काल्पनिक खतरे के बारे में बात कर रहे हैं. सुस्त अर्थव्यवस्था के दौर में मुख्यधारा का मीडिया बहुत हद तक सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है, इसलिए वो भी चुप्पी साधे हुए है.
इन सब बातों ने भारत के लोकतंत्र को कमज़ोर करने का काम किया है. कई लोगों का मानना है कि मध्यम वर्ग की खामोशी, मीडिया की चुप्पी, असहमति को समर्थन देने की राजनीतिक दलों की नाकामी और बढ़ता राष्ट्रवाद, देश के मौजूदा हालात के लिए ज़िम्मेदार है.
पिछले साल नोबल विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने एक व्याख्यान में कहा था, "असहमति की आवाज़ को दबाने और लोगों के दिमाग में डर पैदा करने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है. इससे संवाद आधारित समाज की संभावना भी कम हो जाती है."
उन्होंने ये भी कहा था कि भारतीय असहिष्णु नहीं हो रहे हैं, बल्कि हम तो असहिष्णुता के प्रति भी बहुत सहिष्णु रहे हैं.
इससे साफ है कि देश को असहमति जताने वाली और ज़्यादा आवाज़ों की ज़रूरत है.
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