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आख़िर कब और कैसे अस्तित्व में आई विशाखा गाइडलाइन्स?
ट्विटर के ट्रेंड से निकलकर #MeToo अब आम लोगों की बातचीत का हिस्सा बन चुका है.
महिलाएं बेबाक तरीक़े से सामने आ रही हैं और अपने खिलाफ़ हुए उत्पीड़न के बारे में बता रही हैं लेकिन अगर किसी के साथ ऑफ़िस में यौन उत्पीड़न हो तो उसे क्या करना चाहिए?
क्या पुलिस के पास जाना और सोशल मीडिया में लिखना ही एकमात्र विकल्प है?
नहीं... ये अंतिम विकल्प तो नहीं है.
हर वो दफ़्तर जहां दस या उससे अधिक लोग काम करते हैं वहां एक अंदरुनी शिकायत समिति (इन्टर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी या ICC) होती है. जिसकी अध्यक्ष महिला ही होती है.
'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट' के तहत ऑफ़िस में इस समिति की स्थापना की जाती है. इस समिति में नामित सदस्यों में से आधी महिला होनी चाहिए. साथ ही इसमें एक सदस्य यौन-हिंसा के मामलों पर काम करने वाली किसी एनजीओ की सदस्य होनी चाहिए.
ऐसे में अगर आपके साथ कार्यस्थल पर ऐसा कुछ भी हो रहा है या हुआ है तो आप सबसे पहले अपने ऑफ़िस में बनी इस समिति में जा सकती/सकते हैं. यहां एक बात स्पष्ट करना ज़रूरी है कि इस समिति के दिशानिर्देश दफ़्तर में काम करने वाले सभी कर्मचारियों पर लागू होते हैं.
ये एक्ट साल 2013 में बना लेकिन इससे पहले दफ़्तरों में यौन-उत्पीड़न के मामलों को देखने के लिए विशाखा गाइडलाइन्स का पालन किया जाता था.
विशाखा गाइडलाइन्स
कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश जारी किए थे. सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को ही 'विशाखा गाइडलाइन्स' के रूप में जाना जाता है.
इसे विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार और भारत सरकार मामले के तौर पर भी जाना जाता है.
इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यौन-उत्पीड़न, संविधान में निहित मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15 और 21) का उल्लंघन हैं. इसके साथ ही इसके कुछ मामले स्वतंत्रता के अधिकार (19)(1)(g) के उल्लंघन के तहत भी आते हैं.
लेकिन ये अस्तित्व में कैसे आया?
राजस्थान में जयपुर के पास भातेरी गांव में रहने वाली सोशल वर्कर भंवरी देवी इस पूरे मामले की केंद्र-बिंदु रहीं.
भंवरी देवी राज्य सरकार की महिला विकास कार्यक्रम के तहत काम करती थीं. एक बाल-विवाह को रोकने की कोशिश के दौरान उनकी बड़ी जाति के कुछ लोगों से दुश्मनी हो गई. जिसके बाद बड़ी जाति के लोगों ने उनके साथ गैंगरेप किया. इसमें कुछ ऐसे लोग भी थे जो बड़े पदों पर थे.
न्याय पाने के लिए भंवरी देवी ने इन लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कराया लेकिन सेशन कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया क्योंकि गांव पंचायत से लेकर पुलिस, डॉक्टर सभी ने भंवरी देवी की बात को सिरे से ख़ारिज कर दिया.
भंवरी देवी के ख़िलाफ हुए इस अन्याय ने बहुत से महिला समूहों और गैर-सरकारी संस्थाओं को आगे आने के लिए विवश कर दिया.
कुछ ग़ैर-सरकारी संस्थाओं ने मिलकर साल 1997 में 'विशाखा' नाम से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. जिसे विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार और भारत सरकार के नाम से भी जाना जाता है.
इस याचिका में भंवरी देवी के लिए न्याय और कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ होने वाले यौन-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की गई.
उस वक़्त सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी करते हुए यौन उत्पीड़न को कुछ इस तरह परिभाषित किया. इसके तहत...
किसी भी तरह के ग़लत इशारे करना
ग़लत व्यवहार या टिप्पणी करना
शारीरिक संबंध बनाने/करने के लिए कहना,
1997 से पहले महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न की शिकायत आईपीसी की धारा 354 (महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले ) और 509 (किसी औरत के सम्मान को चोट पहुंचाने वाली बात या हरकत) के तहत दर्ज करवाती थीं.
सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइन्स के तहत कार्यस्थल के मालिक के लिए ये ज़िम्मेदारी सुनिश्चित की थी कि किसी भी महिला को कार्यस्थल पर बंधक जैसा महसूस न हो, उसे कोई धमकाए नहीं. साल 1997 से लेकर 2013 तक दफ़्तरों में विशाखा गाइडलाइन्स के आधार पर ही इन मामलों को देखा जाता रहा लेकिन 2013 में 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट' आया.
जिसमें विशाखा गाइडलाइन्स के अनुरूप ही कार्यस्थल में महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात कही गई. इसके साथ ही इसमें समानता, यौन उत्पीड़न से मुक्त कार्यस्थल बनाने का प्रावधान भी शामिल किया गया.
इस एक्ट के तहत किसी भी महिला को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सिविल और क्रिमिनल दोनों ही तरह की कार्रवाई का सहारा लेने का अधिकार है.
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