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राहुल का नए साल में सामना करने उतरे मोदी 2.0
- Author, नवीन नेगी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
सीन-1 ''गुजरात बनाने का मतलब क्या होता है पता है नेताजी... गुजरात बनाने का मतलब होता है 24 घंटे बिजली... हर गांव में बिजली...नेताजी जी आपकी हैसियत नहीं है... गुजरात बनाने के लिए 56 इंच का सीना चाहिए.''
वक्ताः बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी
तारीख़: जनवरी 2014
लोकेशनः उत्तर प्रदेश में एक चुनावी रैली
सीन-2 ''कांग्रेस पार्टी को सत्ता का नशा हो गया है. कांग्रेस का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच चुका है. ऐसी कांग्रेस को सज़ा मिलनी चाहिए या नहीं मिलनी चाहिए… कांग्रेस को छोटी-मोटी सज़ा नहीं, देश बचाने के लिए हमें कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए...''
वक्ताः बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी
तारीख़: फ़रवरी 2014
लोकेशनः कर्नाटक में एक चुनावी रैली
यह एक सुपरहिट फ़िल्म के कुछ बेहतरीन डायलॉग लगते हैं. जिसे देश की जनता ने साल 2014 में जमकर पसंद किया और दिल खोलकर अपना प्यार लुटाया.
इस फ़िल्म के नायक थे नरेंद्र मोदी. जिन्होंने अपने भाषणों से ऐसा समां बांधा कि लोग उनके दीवाने हो गए. लगने लगा कि भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और महंगाई से त्रस्त जनता को बचाने के लिए 'मोदी' नाम का मसीहा आ गया है.
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में हिंदुस्तान की जनता ने मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को 282 सीटें दीं. मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए.
इसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी एक के बाद एक जीत दर्ज करती चली गई. जीत के रथ पर सवार यह मोदी पार्ट-1 था.
नए साल में नरम मोदी
''कांग्रेस मुक्त भारत से मेरा मतलब किसी पार्टी को देश में समाप्त करना नहीं है. कांग्रेस एक सोच है, एक विचारधारा है, जिसमें परिवारवाद, भाई-भतीजावाद भरा है. मैं इस सोच को ख़त्म करने की बात करता हूं. मैं चाहता हूं कि कांग्रेस पार्टी के भीतर से भी यह कांग्रेस ख़त्म हो जाए.''
वक्ताः देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
तारीख़: 1 जनवरी 2019
लोकेशनः नई दिल्ली में एक साक्षात्कार
वक़्त का पहिया चलता गया और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के तौर पर पांचवे साल में प्रवेश कर गए. यानी साल 2019, जब वे एक बार फिर जनता के सामने खड़ें होंगे. लेकिन इस बार किसी उम्मीदवार के तौर पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के तौर पर.
साल के पहले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने क़रीब 95 मिनट लंबा एक साक्षात्कार दिया. वाक् कौशल में ठीक समझे जाने वाले मोदी आमतौर पर मीडिया या प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी बनाने के लिए भी जाने जाते हैं.
फिर ऐसा क्या हुआ कि वे साल के पहले दिन मीडिया के सामने हाज़िर हुए और उन तमाम मुद्दों पर बोलने लगे जो उनके कार्यकाल के दौरान उठते रहे हैं.
इसके जवाब में वरिष्ठ पत्रकार और बीजेपी की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले प्रदीप सिंह कहते हैं कि यह साक्षात्कार असल में मोदी का एक नया वर्जन जनता के सामने लेकर आता है.
वे कहते हैं, ''देश में किन मुद्दों पर चर्चा होगी आमतौर पर इसे बीजेपी या ख़ुद मोदी तय करते थे और फिर कांग्रेस उसे पीछे से लपकने की कोशिश करती थी लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद से ही मोदी को लगने लगा था कि देश का माहौल और मुद्दा उनके हाथों से छिटकने लगा है.''
प्रदीप सिंह कहते हैं, ''पिछले महीने तीन बड़े राज्य हारने के बाद मोदी को यह एहसास हो गया कि अब कांग्रेस देश का नैरेटिव सेट कर रही है और बीजेपी उसके अनुसार रणनीतियां बना रही है. यही वजह है कि नए साल के पहले दिन वे हाज़िर हो गए. यह बताने के लिए कि इस चुनावी साल में देश का मूड मोदी ही तय करेंगे.''
राहुल 'प्रेम' से नरम पड़े मोदी
संसद भवन के भीतर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का वह भाषण शायद अभी तक देश की स्मृति से मिटा नहीं होगा, जिसमें उन्होंने अपने लिए ख़ुद 'पप्पू' शब्द का इस्तेमाल किया था.
राहुल ने कहा था, ''वे मुझे पप्पू कहते हैं लेकिन मुझे उनसे नफ़रत नहीं.'' इतना ही नहीं राहुल अपने भाषण के बाद सीट से उठे थे और संसद भवन के भीतर ही मोदी को गले लगा लिया था.
छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में जीत के बाद भी राहुल गांधी ने यही कहा था कि वे बीजेपी मुक्त भारत नहीं चाहते.
एक तरह से राहुल गांधी यह बताने में लगे थे कि वे प्रेम की राजनीति कर रहे हैं जबकि मोदी और बीजेपी नफ़रत की राजनीति में लगे हैं.
सवाल उठता है कि क्या नए साल में मोदी के इस नए स्वरूप के पीछे राहुल की यह 'प्रेम राजनीति' एक बड़ी वजह है.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई इस संबंध में कहते हैं, ''बीते पांच सालों में बीजेपी के कई नेताओं या ख़ुद मोदी की तरफ़ से भी कांग्रेस और विपक्षी दलों पर नफ़रती शब्दों का इस्तेमाल हुआ. इसके अलावा मॉब लिंचिंग के कई मामले सामने आए. जिसे आम जनता पसंद नहीं करती. इन्हीं सबके बीच राहुल गांधी ने यह संदेश दिया कि वे पीड़ितों के पक्ष में खड़े हैं. यही वजह है कि मोदी इस चुनावी साल में अपने व्यवहार को बदलते हुए दिख रहे हैं.''
इसके अलावा रशीद किदवई एक बात की तरफ़ और ध्यान ले जाते हैं. वे कहते हैं कि अभी तक बीजेपी यही कहती रहती थी कि राहुल गांधी राजनीति के लिए तैयार नहीं है. वे जहां जाते हैं वहां कांग्रेस हार जाती है. अक्सर राहुल गांधी के भाषणों का मज़ाक़ बनाया जाता था.
रशीद कहते हैं, ''बीते कुछ वक़्त से राहुल गांधी ने एक परिपक्व राजनेता के तौर पर ख़ुद को पेश किया है. वे बेहतर तर्कों के साथ बीजेपी पर मुखर हुए हैं. लोकसभा में भले ही उनके 50 से कम सांसद हैं लेकिन वे एक मज़बूत विपक्ष बनाने में कामयाब रहे हैं. यही वजह है कि मोदी भी प्रधानमंत्री के तौर पर परिपक्वता दर्शा रहे हैं.''
नीतियों पर सवाल
मोदी के कार्यकाल को उनके कुछ बड़े फ़ैसलों के लिए याद किया जाएगा. इसमें नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक अहम रहेंगे.
अपने साक्षात्कार में मोदी ने नोटबंदी को कोई झटका नहीं माना, उन्होंने कहा कि वे साल भर पहले से जनता को इसके लिए आगाह कर रहे थे. उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के राजनीतिकरण को बुरा माना.
इसके अलावा राहुल गांधी और कांग्रेस रफ़ाल सौदे में हुई कथित गड़बड़ियों के मुद्दे को अक्सर उठाते रहे. मोदी ने इस पर कहा कि इस मामले में कोई उनके ऊपर उंगली नहीं उठा रहा.
मोदी की नीतियों पर उठने वाले सवालों पर प्रदीप सिंह कहते हैं, ''विपक्ष हमेशा यही कहता है कि मोदी अहम मुद्दों पर चुप रहते हैं. इसीलिए अपने साक्षात्कार में वे सभी मसलों पर बोले. मोदी जानते हैं कि जनता का विश्वास उन पर अब भी है इसीलिए नोटबंदी के बाद वे उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य जीतने में कामयाब रहे. मोदी इसी भरोसे को क़ायम रखने की कोशिश कर रहे हैं.''
दूसरी तरफ़ रशीद किदवई कहते हैं कि बीते साढ़े चार साल में मोदी जनता की उम्मीदों पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए. वे कहते हैं, ''मोदी ख़ुद जानते हैं कि नोटबंदी की वजह से लोगों को दिक्क़तें आई थीं. साल 2014 में उन्होंने जिन उम्मीदों के साथ मोदी को चुना था वे पूरी नहीं हो पाईं, यही वजह है मोदी अपने साक्षात्कार में अपने फ़ैसलों को विस्तार से समझा रहे थे.''
गठबंधन की चिंता
साल 2014 में बीजेपी ने अकेले ही बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया था, लेकिन मौजूदा वक़्त में लोकसभा में बीजेपी के 268 सांसद हैं.
मोदी ने अपने साक्षात्कार में भले ही कहा हो इस बार का चुनाव जनता बनाम महागठबंधन होगा. फिर भी उनके जवाब के भीतर कहीं न कहीं एनडीए गठबंधन में पड़ रही टूट का असर भी दिखा.
इस बारे में रशीद किदवई कहते हैं, ''लोकसभा चुनाव देश की 543 जगहों पर होंगे. यानी हर राज्य में पार्टी की पकड़ मज़बूत होना ज़रूरी है. मोदी को पता है कि दक्षिण भारत में वे कमज़ोर हैं. वहां के क्षेत्रीय दलों के साथ उनका तालमेल नहीं बैठ पा रहा. ऐसे में मोदी की अपनी छवि कितनी ही अच्छी हो शायद उन्हें पर्याप्त बहुमत न मिल पाए.''
हालांकि प्रदीप सिंह इस बारे में कुछ जुदा राय रखते हैं. वे कहते हैं, ''अपने साक्षात्कार में मोदी भले ही विनम्र दिखे हों लेकिन वे आत्मविश्वास से भरे दिख रहे थे. जहां तक एनडीए की बात करें तो महज़ दो पार्टियां ही गठबंधन से अलग हुई हैं, एक चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी और दूसरी उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी. वैसे भी ये दोनों पार्टियां काफ़ी छोटी हैं. रही शिवसेना के तेवरों की बात तो वह साल 2014 से ऐसे ही रही है लेकिन कभी अलग नहीं हुई.''
क्या अब रैलियों में आक्रामक मोदी नहीं दिखेंगे?
नरेंद्र मोदी को जनता उनके आक्रामक भाषणों और तेवरों के लिए जानती है. वे अक्सर ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं जो सामने वाली पार्टी पर सीधा निशाना होते हैं.
सवाल उठता है कि क्या इस साक्षात्कार से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अब मोदी अपनी आक्रामक छवि नहीं अपनाएंगे. वे दबंग अंदाज़ में दूसरी पार्टियों को आढ़े हाथों नहीं लेंगे.
इस पर प्रदीप सिंह कहते हैं, ''जब आप विपक्ष के नेता होते हैं तो आपके तेवर, शैली और अंदाज़ अलग होते हैं. तब आप सत्तारूढ़ दल पर हमला कर रहे होते हैं. लेकिन जब आप ख़ुद सत्ता में रहते हुए जनता के सामने जाते हैं तो आपको अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करना होता है. यही वजह है कि मोदी का अंदाज़-ए-बयां भी थोड़ा बदला है.''
मोदी के नए रूप से कांग्रेस कैसे निपटेगी?
राहुल गांधी ने कांग्रेस की कमान संभालने के एक साल के भीतर पार्टी में अपनी उपयोगिता साबित की है. उनके नेतृत्व में कांग्रेस तीन बड़े राज्यों में चुनाव जीतने में कामयाब रही.
इसके अलावा राहुल गांधी ने मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों के दर्शन किए. कभी अपना जनेऊ दिखाया तो कभी गोत्र की बात सामने रखी.
बुधवार को भी लोकसभा में उन्होंने मोदी के साक्षात्कार और रफ़ाल सौदे पर जमकर हमला किया. उन्होंने कहा कि रफ़ाल सौदे में गड़बड़ियां हुई हैं. उन्होंने इससे जुड़ी एक टेप संसद में चलाने की इजाज़त भी मांगी.
राहुल ने मोदी के बारे में कहा कि वे पूरे साक्षात्कार में बेहद थके हुए और निराश लग रहे थे.
कहा जा सकता है कि पिछले चार सालों में राहुल ने 'आक्रामक मोदी' की काट खोजने की कोशिशें कीं. लेकिन अब सामने खड़े 'विनम्र मोदी' से राहुल किस तरह निपटेंगे.
इस पर रशीद किदवई कहते हैं, ''राहुल गांधी जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं उन्हें वैसे ही करते रहना होगा. वे मुद्दों को उठाते रहें. तर्कों के साथ सत्तापक्ष पर सवाल उठाएं, देश का मूड ख़ुद तय करें.''
कुल मिलाकर नए साल की शुरुआत में देश के सर्द मौसम में गरमागरम राजनीति शुरू हो चुकी है. जनवरी के पहले दो दिन देश की जनता को यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि आने वाले दिन कैसे होंगे.
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