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लोकसभा चुनाव 2019: तन कर चलने वाली बीजेपी बिहार में नीतीश के सामने क्यों झुकी- नज़रिया
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपने सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) से क़दम-क़दम पर समझौता करने को विवश दिख रही है.
आगामी लोकसभा चुनाव में राज्य की कुल 40 सीटों में से जिन सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के ये तीनों घटक चुनाव लड़ेंगे, उनकी सूची से भी बीजेपी की मजबूरी झलक उठती है.
यानी राज्य के मुख्यमंत्री और जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने सीटों के चयन में अपने दलीय हित के अनुकूल बीजेपी नेतृत्व को जैसे चाहा वैसे झुका लिया.
बिहार में बराबर-बराबर (17-17) सीटों की हिस्सेदारी क़बूल कर बीजेपी ने अपनी जीती हुई पांच सीटें जेडीयू के लिए पहले ही छोड़ दी थी. अब यह सामने आया है कि संसदीय क्षेत्र चुनने में भी जेडीयू को तरजीह देने के लिए बीजेपी ने अपने हक़ या दावे बिल्कुल ढीले कर दिए.
ज़ाहिर है कि चुनावी राजनीति में ऐसा वही करता है, जिसे अपने कमज़ोर या घटते जनसमर्थन का अहसास हो जाय और वैसी सूरत में सहयोगी दल के आगे झुकना उसे ज़रूरी लगने लगे.
बीजेपी के प्रभाव वाले भागलपुर संसदीय क्षेत्र का उदाहरण सामने है. वहां पूर्व सांसद शाहनवाज़ हुसैन की उम्मीदवारी को दरकिनार कर दिया गया और जेडीयू के लिए यह सीट छोड़ दी गई.
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इसी तरह गिरिराज सिंह की जीती हुई नवादा लोकसभा सीट उनसे छीनकर एलजेपी के हिस्से में डाल दी गई.
वाल्मीकि नगर, सिवान, गोपालगंज, झंझारपुर और गया लोकसभा सीटों पर पिछले चुनाव में जीत हासिल करने वाली बीजेपी इस बार वहां से हट गई और उसने जेडीयू को इन पांचों सीटों की उम्मीदवारी सौंप दी.
इस उदारता को मजबूरी मानने वालों के मुताबिक़, वर्ष 2014 जैसा जनसमर्थन नामुमकिन समझ कर बीजेपी ने गठबंधन में तन कर नहीं, झुक कर काम चलाने की रणनीति अपनाई. लेकिन, इस रणनीति का जोखिम भी अब नज़र आने लगा है.
पार्टी के जो नेता इससे प्रभावित हुए हैं, उनकी नाराज़गी अब विद्रोह या भीतरघात की शक्ल में कई सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है.
वैसे, चुनावी टिकट के लिए दलबदल कोई नई बात या बड़ी बात नहीं समझी जाती है, फिर भी बिहार में इस बार बीजेपी के सामने यह समस्या विकट हो सकती है.
ऐसा इसलिए क्योंकि जेडीयू के लिए बीजेपी ने अपने प्रभाव वाले कई ऐसे संसदीय क्षेत्र छोड़ दिए हैं जहाँ प्रतिक्रियावश एनडीए-विरोधी दलों को इसका फ़ायदा मिल सकता है.
एक दलील यह भी दी जाती है कि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से खार खाए हुए सामाजिक तबक़े में सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं जेडीयू समर्थकों की भी अच्छी-ख़ासी तादाद है. इसलिए दोनों के मेल से बनी ताक़त ही आरजेडी को कड़ी चुनौती दे सकती है.
बिहार में एनडीए की चुनावी-तैयारी और हलचल पर ग़ौर करें तो यह साफ़ दिखता है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू आगे-आगे और बीजेपी पीछे-पीछे चल रही है.
यहाँ एनडीए के लिए सीटों के चयन में जेडीयू को बड़े भाई की भूमिका निभाते देखा गया और इस बाबत सूची भी जेडीयू दफ़्तर से ही जारी हुई.
सबसे ख़ास बात यह कि मुखर जेडीयू अपने लिए मनचाहे क्षेत्रों के चयन में बीजेपी को मौन कर देने में कामयाब रहा.
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सीटों के बँटवारे में अपनी पार्टी को यहाँ बीजेपी के समकक्ष पहुँचा कर अब नीतीश कुमार चुनावी सफलता में भी बढ़त बनाने को बेहद तत्पर दिखते हैं. इसलिए कुछ लोग इसमें बीजेपी के लिए आगे ख़तरे का संकेत सूँघने लगे हैं.
उधर आरजेडी और कांग्रेस समेत छह पार्टियों के महागठबंधन में 'सीट शेयरिंग' को लेकर उत्पन्न गतिरोध और वामपंथी मोर्चे का महागठबंधन से अब तक सामंजस्य नहीं हो पाना एनडीए-ख़ेमे को उत्साहित कर रहा है.
हालाँकि यह सवाल भी उठने लगा है कि पुलवामा के आतंकी हमले और बालाकोट एयर-स्ट्राइक के बाद सिर्फ़ अपने पक्ष में जनउभार महसूस करने वाली बीजेपी अभी भी अपने सहयोगी दलों की इतनी तलबगार क्यों दिखती है?
वैसे, ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है, त्यों-त्यों इन दोनों घटनाओं का जनमानस पर छाया हुआ गहरा असर धीरे-धीरे मलिन होने लगा है.
अब तो चुनावी स्वार्थ जनित गठबंधनों के अंतर्कलह को सतह पर ला देने वाले विवाद भी उभरने शुरू हो गए हैं.
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