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ईरान के शासकों को सत्ता से हटाना क्यों बेहद मुश्किल है?
- Author, लुईस बारुको
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के चार दशक से ज़्यादा बीत चुके हैं.
लेकिन अब ईरान के शासकों को अपने सबसे कठिन दौर का सामना करना पड़ रहा है.
अमेरिका और इसराइल के संयुक्त हवाई हमलों में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और कई शीर्ष सैन्य कमांडर मारे गए हैं.
इन हमलों में अहम बुनियादी ढांचे को भी नुक़सान पहुंचा है.
अमेरिका और इसराइल दोनों ने संकेत दिया है कि वे ईरान में तख़्तापलट चाहते हैं.
उन्होंने ईरानियों से अपनी सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील भी की है.
हालांकि विशेषज्ञ कहते हैं कि ईरान की सत्ता का सिस्टम ऐसे बनाया गया है कि वह टिकाऊ रहे और उसे आसानी से गिराया न जा सके.
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सवाल उठता है कि इसकी मजबूती की वजह क्या है और यह मध्य पूर्व के दूसरे देशों से कैसे अलग है?
जटिल संरचना
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान की राजशाही को हटाने के बाद इस्लामी गणराज्य ने धीरे-धीरे ऐसा राजनीतिक ढांचा बनाया जो बड़े से बड़े झटकों को भी झेल सके.
इसमें कड़े नियंत्रण वाले संस्थान, वैचारिक प्रशिक्षण, अभिजात वर्ग की एकजुटता और विपक्षी ताकतों का बंटा होना शामिल हैं.
बेल्जियम के यूरोपियन जियोपॉलिटिकल इंस्टिट्यूट में मध्य पूर्व के शोधकर्ता सेबास्तियां बुस्वा कहते हैं, "यह हाइड्रा जैसी संरचना है. आप एक सिर काटते हैं तो नए सिर उग आते हैं."
रविवार को अली ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई को उनका उत्तराधिकारी चुना गया, जो उनके मारे जाने के दो हफ्ते से भी कम समय बाद हुआ.
माना जा रहा है कि वे अपने पिता की कट्टर नीतियों को ही आगे बढ़ाएंगे.
'पॉलीडिक्टेटरशिप'
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्यूनीशिया, मिस्र और सीरिया जैसे क्षेत्र के अन्य देशों के उलट, जहां नेताओं को सत्ता से हटा दिया गया, ईरान बाहरी झटकों को झेलने में ज़्यादा सक्षम रहा है.
इसकी वजह उसका वैचारिक आधार पर बना सुरक्षा ढांचा है.
एक व्यक्ति पर केंद्रित सामान्य तानाशाही के बजाय, ईरान में 'पॉलीडिक्टेटरशिप' (बहुस्तरीय-तानाशाही) है.
तेहरान स्थित फ्रेंच इंस्टिट्यूट फ़ॉर रिसर्च इन ईरान के पूर्व निदेशक बर्नार्ड आउरकाद के मुताबिक, यह "राजनीतिक इस्लाम और कट्टर ईरानी राष्ट्रवाद के समर्थकों बीच गठबंधन" है.
सत्ता कई केंद्रों में बंटी हुई है. इनमें धार्मिक निकाय, सशस्त्र बल और अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से शामिल हैं. इससे व्यवस्था को गिराना एक व्यक्ति की तानाशाही के मुकाबले कहीं ज़्यादा मुश्किल हो जाता है.
सत्ता रखने वाली दूसरी संस्थाओं में गार्जियन काउंसिल भी शामिल है, जो क़ानूनों को वीटो कर सकती है और चुनावों के लिए उम्मीदवारों की जांच परख करती है.
इससे किसी एक गुट के लिए राज्य को गंभीर चुनौती देना और भी मुश्किल हो जाता है.
ईरान को व्यापक रूप से एक निरंकुश व्यवस्था माना जाता है, लेकिन वहां लोगों को कुछ चुनावों में वोट देने का प्रतीकात्मक मौका मिलता है, जिसमें राष्ट्रपति का चुनाव भी शामिल है.
हालांकि यह प्रक्रिया कड़े नियंत्रण में रहती है. उम्मीदवारों की जांच गार्जियन काउंसिल करती है और इसमें इस्लामी गणराज्य के प्रति प्रतिबद्धता जैसे मानदंड शामिल होते हैं.
रिवोल्यूशनरी गॉर्ड्स की केंद्रीय भूमिका
अगर व्यवस्था का ढांचा संस्थान बनाते हैं, तो सुरक्षा बलों को उसकी ताक़त माना जाता है.
आउरकाद कहते हैं. "इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) नियमित सेना के साथ काम करता है और इसे अक्सर व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है."
सैन्य भूमिका से आगे बढ़कर यह एक राजनीतिक और आर्थिक ताक़त भी बन चुका है. इसके व्यापक कारोबारी हित हैं और बसीज मिलिशिया के ज़रिये इसका प्रभाव फैला हुआ है. बसीज एक वालंटियर पैरामिलिटरी फ़ोर्स है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि बार-बार होने वाली अशांति के दौरान भी सुरक्षा बल एकजुट रहे हैं. बुस्वा इसे विचारधारा से जुड़ी वफ़ादारी से जोड़कर देखते हैं.
वो कहते हैं, "शहीदी की यह संस्कृति, जो शिया समुदाय और हमास और हिज़्बुल्लाह जैसे संगठनों में दिखाई देती है, लगभग नौकरी का हिस्सा मानी जाती है."
ईरान के उप रक्षा मंत्री रज़ा तलाइनिक ने हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि हर आईआरजीसी कमांडर के लिए तीन स्तर नीचे तक उत्तराधिकारी तय किए जाते हैं ताकि व्यवस्था लगातार चलती रहे.
गार्ड्स एट यूनाइटेड अगेंस्ट न्यूक्लियर ईरान पर शोध के प्रमुख कसरा आराबी का मानना है कि अगर यह व्यवस्था बची रहती है तो "गार्ड्स की भूमिका और भी ज़्यादा अहम हो जाएगी."
पैट्रनेज सिस्टम और अभिजात वर्ग की एकजुटता
ईरान की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर राज्य से जुड़े संगठनों का नियंत्रण है. इनमें बोनयाड्स भी शामिल हैं.
ये चैरिटी ट्रस्ट हैं, जो समय के साथ विकसित होकर अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में हज़ारों कंपनियों के मालिक बन चुके हैं.
ये नेटवर्क व्यवस्था के प्रति वफ़ादार समूहों को नौकरियां और ठेके बांटते हैं.
आईआरजीसी का कारोबारी साम्राज्य, जिसमें ख़ातम अल-अनबिया कांग्लोमरेट भी शामिल है, व्यापार से जुड़े इस "पैट्रनज" सिस्टम को और मजबूत करता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी प्रतिबंधों ने ईरान की व्यापक अर्थव्यवस्था को काफ़ी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन ये नेटवर्क अहम अभिजात वर्ग को सुरक्षित रखते हैं और व्यवस्था के बने रहने में उनके हितों की रक्षा करते हैं.
बुस्वा के मुताबिक़, यह व्यवस्था "इतनी मजबूत है कि हमें लगभग कोई भी दलबदल दिखाई नहीं देता."
विचारधारा और क्रांति की विरासत
सत्ता बनाए रखने में धर्म भी अहम भूमिका निभाता है.
क्रांति के बाद धार्मिक, राजनीतिक और शैक्षणिक संस्थानों का एक मजबूत नेटवर्क बना, जो आज भी राज्य की सोच को प्रभावित करता है.
बुस्वा कहते हैं, "यह बहुत पुरानी और बहुत ताक़तवर संरचना है- वैचारिक, नौकरशाही और प्रशासनिक- जो व्यवस्था को मजबूत बनाती है."
उनका कहना है कि यह विचारधारा "एकजुटता, मक़सद और भर्ती का असली स्रोत" बनती है.
बंटा हुआ विपक्ष
ऐतिहासिक रूप से ईरान का विपक्ष बंटा हुआ रहा है.
इसमें सुधारवादी, राजतंत्र समर्थक, वामपंथी समूह, ईरान की नेशनल काउंसिल ऑफ रेज़िस्टेंस जैसे प्रवासी आंदोलन और कई कबायली संगठन शामिल हैं.
ब्रिटेन की थिंक टैंक यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस की वरिष्ठ नीति विशेषज्ञ एली गेरानमायेह कहती हैं कि यह बिखराव लंबे समय से चला आ रहा है.
उनके मुताबिक़, क्रांति के बाद राजनीतिक दल बनाने पर बहस को किनारे कर दिया गया. इसकी बड़ी वजह 1980 में ईरान का इराक़ के साथ जंग में प्रवेश करना था, जो क़रीब आठ साल चला.
गेरानमायेह कहती हैं कि अलग-अलग समय पर मध्यमार्गी गुटों को व्यवस्था और कट्टरपंथी गुटों की तरफ़ से "हाशिये पर धकेला गया, बदनाम किया गया या जेल में डाला गया".
पिछले सालों में व्यवस्था के ख़िलाफ़ कई बड़े विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जैसे 2009 का ग्रीन मूवमेंट और 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुए प्रदर्शन.
लेकिन इन प्रदर्शनों में केंद्रीय नेतृत्व की कमी रही और इन्हें राज्य के सख़्त दमन का सामना करना पड़ा.
हालांकि इस साल और पिछले साल विरोध की ताज़ा लहर देश के आख़िरी शाह के निर्वासित बेटे की अपील के बाद शुरू हुई.
ईरान की निगरानी व्यवस्था क्षेत्र की सबसे उन्नत निगरानी व्यवस्थाओं में से एक है.
इसमें लगातार इंटरनेट बंद करना, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी और विदेशों में कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने वाली साइबर इकाइयां शामिल हैं.
जनता में हिचक
गेरानमायेह कहती हैं कि कई सालों तक ईरानी लोग सत्ता परिवर्तन की मांग करने से हिचकते रहे. उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में अमेरिका के नेतृत्व वाले हस्तक्षेप के बाद की स्थिति देखी थी. अरब विद्रोहों के बाद के हालात ने भी यह सतर्कता और बढ़ा दी.
लेकिन अब यह सोच बदल रही है. कई ईरानियों को लगने लगा है कि राज्य नौकरियों से लेकर साफ़ पानी तक बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम नहीं रहा, जबकि विरोध को दबाने के लिए बल प्रयोग बढ़ता जा रहा है.
वह कहती हैं, "जनवरी में विरोध की नई लहर के ख़िलाफ़ की गई कड़ी कार्रवाई ने इस बदलाव को और तेज़ कर दिया. देश में अब तक के सबसे बड़े प्रदर्शनों में से कुछ में हज़ारों लोग मारे गए."
आउरकाद कहते हैं कि ईरानियों में व्यवस्था को लेकर पीढ़ियों के बीच सोच का अंतर है.
उनके मुताबिक़, युवा ईरानी, जिनमें से कई उच्च शिक्षित हैं, दुनिया से जुड़े हुए हैं और सोशल मीडिया से प्रभावित हैं, वो इस व्यवस्था को ख़ारिज़ करते हैं. वे इसे "भ्रष्ट, दमनकारी और अपनी आम जनता की आकांक्षाओं से अलग थलग" मानते हैं.
'हर सत्ता का अंत आता है'
विश्लेषकों का कहना है कि आम तौर पर सत्तावादी व्यवस्थाएं तब गिरती हैं जब तीन हालात एक साथ बनते हैं. बड़े पैमाने पर जन आंदोलन, सत्ता के भीतर विभाजन और सुरक्षा बलों का साथ छोड़ना.
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान में पहले वाला हालात कई बार बना है, लेकिन बाकी दो नहीं बने.
आउरकाद मानते हैं कि इस्लामी गणराज्य का अंत तय है, लेकिन अभी नहीं.
वे कहते हैं, "हर व्यवस्था का अंत होता है. असली सवाल समय का है. ख़ामेनेई की मौत व्यवस्था के लिए बड़ा झटका है. उनके जैसा दूसरा नहीं होगा. उनका उत्तराधिकारी कभी भी वैसी सत्ता नहीं रख पाएगा जैसी ख़ामेनेई के पास थी."
लेकिन बुस्वा कहते हैं कि इस्लामी गणराज्य का पतन अभी तय नहीं है.
अगर यह हुआ और इसके पीछे विदेशी सैन्य हस्तक्षेप रहा, तो आगे की स्थिति और ख़राब हो सकती है.
डोनाल्ड ट्रंप पहले न्यूयॉर्क टाइम्स से कह चुके हैं कि वेनेज़ुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलास मादुरो को पकड़ना ईरान के लिए "सबसे सही स्थिति" होगी.
लेकिन बुस्वा कहते हैं, "इसके उलट भी हो सकता है. जैसे उत्तर कोरिया या क्यूबा में हुआ, जहां रेडिकल धड़े की पकड़ और मजबूत हो गई."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.