महाराष्ट्र: फ्लोर टेस्ट कैसे होता है और क्रॉस वोटिंग होने पर राजनीतिक पार्टियां क्या कर सकती हैं?

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महाराष्ट्र में किसकी बनेगी सरकार? इस सवाल का स्पष्ट जवाब 27 नवंबर यानी कल पाँच बजे मिल जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है कि देंवेंद्र फडणवीस को कल बहुमत साबित करना होगा.
फ़्लोर टेस्ट भारतीय राजनीति के लिए नया नहीं है. लेकिन क्या आप जानते हैं फ़्लोर टेस्ट की पूरी प्रक्रिया क्या है और इसकी शुरुआत कहाँ हुई थी?
इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी ने वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन से बात की.
आगे पढ़िए राधिका रामाशेषन ने क्या कुछ कहा-

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महाराष्ट्र: एक ही विकल्प...फ़्लोर टेस्ट
महाराष्ट्र जैसी स्थिति में जहां किसी भी पार्टी के पास अकेले और गठबंधन में स्पष्ट बहुमत नहीं है तो फ़्लोर टेस्ट करना ही एक मात्र तरीक़ा है.
ताकि ये पता किया जा सके कि कितने विधायक किस पार्टी के साथ हैं.
जैसे बीजेपी ने 105 सीट जीती हैं तो ये देखना होगा कि वो सभी विधायक वाकई बीजेपी के साथ हैं या क्रॉस वोटिंग भी कर सकते हैं. इसी तरह से दूसरी पार्टियों के लिए भी यही बात फ़्लोर टेस्ट से साबित होगी.
बहुमत सिद्ध करने के लिए ही फ़्लोर टेस्ट की प्रक्रिया अपनाई जाती है. बोम्मई जजमेंट के बाद ये प्रक्रिया अपनाई गई थी. उससे पहले विधायक और सांसद अपनी मर्ज़ी से दल बदलते थे.
पता नहीं लगता था कि कौन किसके साथ है. स्पीकर के सामने परेड होती थी या समर्थन की चिट्ठियां दी जाती थीं. बहुमत सिद्ध करने के लिए हर तरह की मनमानी की जाती थी.
एसआर बोम्मई जनता पार्टी के बहुत वरिष्ठ नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी थे. 1988 में वो मुख्यमंत्री बने थे और तत्कालीन राज्यपाल ने 1989 में उनकी सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था. उस वक़्त केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. उसके लिए कारण दिया गया कि उनकी सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है.
हालांकि, एसआर बोम्मई ने दावा किया था कि उनके पास पूरा बहुमत है.
उन्होंने राज्यपाल के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने कहा कि स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद उनकी सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया. इस पर कई सालों तक सुनवाई चली. उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ये फ़ैसला सुनाया कि फ़्लोर टेस्ट ही एकमात्र ऐसा तरीक़ा है जिससे आप बहुमत सिद्ध कर पाएंगे.
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फ़्लोर टेस्ट में होता क्या है?
फ़्लोर टेस्ट में बैलेट के ज़रिए ही वोट डाले जाते हैं. ये वोट सत्यापित किए जाते हैं. ये ध्वनि मत से बिल्कुल नहीं हो सकता. इसके बाद फ़ैसला होता है कि किसके पास बहुमत है. ये संसद में कई बार हो चुका है.
मान लीजिए गठबंधन सरकार में कोई एक पार्टी अपना समर्थन वापस ले लेती है तो फिर फ़्लोर टेस्ट ही होता है.
इसमें विधानसभा या संसद का कॉरिडोर ख़ाली किया जाता है. किसी हंगामे से निपटने के लिए मार्शल तैयार रहते हैं. मान लीजीए अगर कोई कुछ फाड़ दे, स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर पर हमला कर दे तो मार्शल संभालने के लिए मौजूद रहते हैं.
वोटिंग के दौरान सदन बिल्कुल व्यवस्थित रहना चाहिए. थोड़ा भी अगर हंगामा होता है तो प्रक्रिया को थोड़ी देर के लिए स्थगित करते हैं. फिर से जब सब कुछ व्यवस्थित हो जाता है तो तब वोटिंग कराई जाती है.
वैसे फ़्लोर टेस्ट स्पीकर की अध्यक्षता में होता है लेकिन महाराष्ट्र में फिलहाल कोई स्पीकर नहीं है और न ही विधानसभा के सदस्यों ने शपथ ग्रहण की है.
ऐसे में विधायकों को शपथ लेनी पड़ेगी. उसके लिए एक प्रोटेम स्पीकर को नियुक्त किया जाता है. सदन में सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है.
उनके पास ज़्यादा शक्तियां नहीं होतीं. वो बस चुने हुए विधायकों को शपथ ग्रहण कराते हैं.
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फ़्लोर टेस्ट की प्रक्रिया
विधायकों के शपथ लेने के बाद स्पीकर का चुनाव होता है और एक तरह से स्पीकर का चुनाव ही ये साबित कर देता है कि किस पार्टी के पास बहुमत है.
हर पक्ष अपनी पार्टी के सदस्य को स्पीकर बनाना चाहेगा और जिसके पास बहुमत होगा उसके ही उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलेंगे.
स्पीकर के चुनाव के बाद फ़्लोर टेस्ट की प्रक्रिया शुरू होती है. फ़्लोर टेस्ट में भी क्रॉस वोटिंग होती है.
हर एक पार्टी अपने विधायकों को एक व्हिप जारी करती हैं कि उन्हें किस पक्ष में वोट करना है. अगर कोई एमएलए इससे अलग वोट करता है तो वो अयोग्य हो सकता है.
सीक्रेट बैलेट है तो तुरंत पता नहीं लगेगा कि किसने किसको वोट किया लेकिन पार्टियां आंतरिक तौर पर जांच करती ही हैं. अगर जांच में साबित होता है कि उनकी पार्टी के किसी विधायक ने क्रॉस वोट किया है तो उनकी दल-बदल क़ानून के तहत अयोग्यता के लिए स्पीकर को सिफ़ारिश की जा सकती है.
एक बार विधायक अयोग्य हो जाए तो उन्हे दोबारा चुनाव लड़ना पड़ता है.
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