बिहार से राज्य सभा जा रहे अनजान चेहरे कौन हैं

    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

भारतीय संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा का अपना कार्यकाल खत्म कर रहे सदस्यों की जगह नए सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

बिहार में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राज्यसभा के ये चुनाव भी राजनीतिक रूप से अहम माने जा रहे हैं.

बिहार से इस बार पांच राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो रहा है. इन पांच सीटों के लिए उम्मीदवारों ने गुरुवार को नामांकन कर दिया.

विधानसभा की सीटों के लिहाज से पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों की संख्या तय की है. लेकिन नाम तय करने की कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं दिखती.

बिहार में प्रमुख विपक्षी पार्टी की भूमिका निभा रही राजद के पास 79 विधायक हैं. उसने दो उम्मीदवार उतारे हैं.

वहीं 71 विधायकों वाली सत्ताधारी पार्टी जदयू के भी दो उम्मीदवार मैदान में हैं जबकि भाजपा का सिर्फ़ एक उम्मीदवार है क्योंकि उनके पास 52 विधायक हैं.

कई चेहरों पर हुई चर्चा

पांचों नामों के तय होने से पहले बिहार के राजनीतिक गलियारे में पिछले कुछ दिनों से गतिविधियाँ बढ़ गई थीं. अलग-अलग नामों और चेहरों को लेकर कयास लगाए जा रहे थे. जदयू और भाजपा ने अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा बुधवार को ही कर दी थी.

जदयू की तरफ से पुराने सदस्यों हरिवंश नारायण सिंह और रामनाथ ठाकुर को ही दोबारा मैदान में उतारा गया है. जबकि भाजपा ने नए उम्मीदवार विवेक ठाकुर के नाम का ऐलान किया. हरिवंश नारायण सिंह फिलहाल राज्य सभा के उप सभापति हैं.

जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा, "रामनाथ ठाकुर का नाम भी बिहार की राजनीति में नया नहीं है. वे बिहार सरकार के सूचना और जनसंपर्क मंत्री रह चुके हैं और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कहे जाने वाले कर्पूरी ठाकुर के बेटे भी हैं. उनका रिकॉर्ड देखा जाए तो राज्य सभा में भी बहुत सक्रिय रहते हैं."

हालांकि भाजपा की तरफ़ से विवेक ठाकुर के नाम का एलान ज़रूर चौंकाने वाला रहा. क्योंकि उनके नाम की चर्चा नहीं थी जबकि पहले बहुत से प्रमुख नामों को लेकर कयास लग रहे थे. उनमें से एक नाम वर्तमान राज्य सभा सांसद आरके सिन्हा का भी था जिनका कार्यकाल इस साल ख़त्म हो रहा है.

सीपी ठाकुर की जगह पर...

लेकिन विवेक ठाकुर का नाम राजनीति के लिए नया नहीं कहा जाएगा. विवेक का सबसे पहला राजनीतिक जुड़ाव उनके पिता वरिष्ठ भाजपा नेता सीपी ठाकुर के कारण है. सीपी ठाकुर पूर्व में केंद्रीय मंत्री रहे हैं. वर्तमान में राज्य सभा के सदस्य भी हैं. इनका भी कार्यकाल इसी साल ख़त्म हो रहा है.

इस तरह भाजपा ने पिता की जगह पुत्र को राज्य सभा भेजने का फ़ैसला किया. वंशवाद की राजनीति के दौर में इसे भी नया नहीं माना जाएगा. विवेक ठाकुर के मुताबिक़ वे पिछले 24 सालों से भाजपा के कार्यकर्ता हैं. भारतीय जनता युवा मोर्चा में रहते हुए कई प्रदेशों के प्रभारी की भूमिका भी निभाई है.

उन्होंने भाजपा के टिकट पर 2015 में बिहार के ब्रह्मपुर विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा है, हालांकि हार का सामना करना पड़ा. उससे पहले 2014 में थोड़े समय के लिए विधानसभा परिषद के सदस्य भी रहे हैं.

पांच में से बाकी बची दो सीटों पर राजद ने जिन नामों की घोषणा की है उनमें एक नाम प्रेमचंद गुप्ता का है. प्रेमचंद गुप्ता लालू प्रसाद यादव के करीबी नेताओं में से एक रहे हैं. वो यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में कंपनी मामलों के कैबिनेट मंत्री का पदभार संभाल चुके हैं. वर्तमान में राज्य सभा के सदस्य भी हैं.

राजद के अमरेंद्र धारी

बिहार से राज्य सभा जा रहे उम्मीदवार जिनके नाम की घोषणा सबसे आखिर में हुई मगर सबसे अधिक चर्चा में रही, वे हैं अमरेंद्र धारी सिंह.

अमरेंद्र धारी राजनीति के लिहाज़ से एकदम नया नाम हैं. राजद की तरफ़ से उनके नाम की घोषणा करते हुए पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने उनका परिचय समाजसेवी के रूप में दिया. लेकिन मूल रूप से व्यवसायी अमरेंद्र पटना ज़िले के दुल्हन बाजार के पास स्थित एनखां गांव के निवासी हैं.

केमिकल, फर्टिलाइजर और रियल एस्टेट की आधा दर्जन से अधिक कंपनियों के मालिक हैं. भारत के अलावा भी कई देशों में उनका कारोबार फैला है. नामांकन के वक़्त शपथ-पत्र में उन्होंने अपनी चल-अचल संपत्ति की कीमत 2.38 अरब रुपये बतायी है.

अमरेंद्र धारी सिंह का जुड़ाव कुछ सामाजिक संगठनों से भी है. बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद के मार्गदर्शन में चल रहे "अभयानंद सुपर 30" के ट्रस्टी अमरेंद्र धारी ही हैं. अमरेंद्र धारी सिंह के नाम की घोषणा के साथ ही पहली हरकत अभयानंद की तरफ़ से ही हुई.

अभयानंद ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर बताया कि अमरेंद्र धारी के राजद से जुड़ने के कारण वे खुद को सुपर 30 से अलग कर रहे हैं. लेकिन अमरेंद्र धारी के नाम पर स्थानीय मीडिया और राजनीतिक गलियारे में चर्चा सबसे अधिक है.

'भूमिहारों को तवज्जों'

स्थानीय टीवी चैनलों की रिपोर्टों के मुताबिक अमरेंद्र धारी राजनीति की नज़र से इतने अनजान हैं कि जब पार्टी प्रदेश कार्यालय में उनके नाम की घोषणा हो रही थी उसके पहले तक वहां मौजूद राजद के नेताओं और कार्यकर्ताओं को पता ही नहीं था कि उन्हीं के बीच मौजूद एक शख्स राज्य सभा का उम्मीदवार भी है.

अमरेंद्र धारी की उम्मीदवारी से चर्चा उनकी जाति पर भी छिड़ी है. वे भूमिहार जाति से हैं. पहले यह कयास लगाए जा रहे थे कि राजद की तरफ से फैसल अली को टिकट मिलेगा जो शिवहर लोकसभा सीट से राजद के उम्मीदवार भी थे.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "राजद अमरेंद्र धारी को राज्य सभा केवल इसलिए नहीं भेज रही है क्योंकि वे बेहद अमीर हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि बीजेपी की तरफ़ से पहले ही सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर के नाम की घोषणा हो चुकी थी. वे भी भूमिहार ही हैं."

मणिकांत आगे कहते हैं, "यह सब विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है. ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टियां इस बार सवर्ण कार्ड खेलना चाहती हैं. उनमें भी भूमिहार जाति को खास तवज्जो इसलिए भी दी जा रही है क्योंकि बीते कुछ समय से बिहार की राजनीति में इस जाति के लोग हाशिए पर जाते दिख रहे थे."

मुस्लिम-यादव समीकरण

जहां तक बात भूमिहार जाति के राजनीति की है तो सीपी ठाकुर इससे पहले भी कई मौकों पर ये बात कह चुके हैं कि उनके समाज के लोगों को स्थान नहीं मिल रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बीबीसी के साथ बातचीत के दौरान भी उन्होंने ये बात कही थी.

देखा जाए तो भाजपा में सीपी ठाकुर के अलावा गिरिराज सिंह भी हैं जो भूमिहार जाति के कद्दावर नेता माने जाते हैं, लेकिन राजद में भूमिहार नेता नगण्य हैं.

अमरेंद्र धारी सिंह कहते हैं, "बीजेपी और जदयू ने भूमिहार समाज के लोगों का केवल इस्तेमाल किया है. आप ही बताइए क्या किया उन्होंने भूमिहारों के लिए! लालू जी शुरू से सब जातियों को साथ लेकर चलने की बात करते हैं. आप देखिए कि राजद में जितना प्रतिनिधित्व अगड़ों का है, उतना ही पिछड़ों का भी. मैं तो भूमिहार समाज के लोगों से यही कहूंगा कि वे भाजपा और जदयू की नफ़रत वाली राजनीति में नहीं फंसे. लालू जी पर यकीन करें क्योंकि लालू जी सब पर यकीन करते हैं."

अमरेंद्र धारी राजनीति से अपने जुड़ाव पर बताते हैं कि वे बहुत समय से राजनीति से भले न जुड़े हों मगर लालू प्रसाद यादव के साथ काफी समय से उनका जुड़ाव है. वे बताते हैं कि उनको राज्यसभा भेजने की बात भी उन्हें सबसे पहले लालू प्रसाद ने ही बतायी.

अमरेंद्र धारी सिंह को राज्यसभा का टिकट मिलने पर कुछ राजनीति विश्लेषक ये भी लिखते हैं कि राजद की राजनीति से न केवल "मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण" का ख़ात्मा हो रहा है बल्कि "भूरा बाल साफ करो" की नीति भी बहुत पीछे छूट गई है.

विधानसभा चुनाव

जहां तक बात भूमिहार जाति की राजनीति की है तो हाल ही में "भूमिहार-ब्राह्मण एकता मंच" नाम के एक संगठन ने पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी रैली की थी और विधानसभा चुनाव में अपनी जाति के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाने की घोषणा भी की थी.

अब तक बने राजनीतिक संगठन दलितों और पिछड़ों के नाम पर देखने, सुनने को मिलते हैं. शायद ऐसा पहली बार हो रहा है कि भूमिहार जाति के नाम पर बना एक राजनीतिक संगठन चुनाव लड़ने की बात कर रहा है.

ऐसा लगता है कि आने वाले विधानसभा सभा चुनाव में बिहार के अंदर जातिगत राजनीति की प्रधानता तो देखने को मिलेगी ही, उसमें भी सवर्ण जातियों की गोलबंदी के प्रयास अभी से ही शुरू कर दिए गए हैं.

बहरहाल राज्यसभा के लिए घोषित पांच में से दोनों नए चेहरों में एक कॉमन बात यह भी है कि दोनों ने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक किया है.

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