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पत्रों में निर्मल -साहित्यकार निर्मल वर्मा के 91वें जन्मदिवस पर बीबीसी विशेष
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हिंदी के प्रसिद्ध लेखक निर्मल वर्मा के पत्रों से जुड़ी मेरी पहली स्मृति 2005 के आख़िरी दिनों की है. स्कूल हाल ही में ख़त्म हुआ था और यूनिवर्सिटी के पहले साल के साथ-साथ निर्मल के पहले उपन्यास 'वे दिन' का भी जीवन में आगमन बस हुआ ही था.
तभी भोपाल में बड़ी झील के किनारे ऊँघती हुई सी एक सर्द दुपहरी को एक मित्र ने मुझे पारदर्शी कवर से झांकता हुआ एक पुराना पत्र दिखाया. बारीक काली स्याही से लिखे बड़े-बड़े फैले अक्षरों से बने कुछ 15 वाक्यों का यह पत्र, निर्मल जी ने लिखकर दिल्ली से भोपाल अपने एक पाठक को भेजा था.
दरअसल उनके पाठक और मेरे इस मित्र ने उनका उपन्यास 'अंतिम अरण्य' पढ़कर, उन्हें 15 पन्नों का एक लंबा पत्र लिखा था, जिसके जवाब में निर्मल जी का यह 15 वाक्य लंबा ख़त आया था.
ख़तों में दर्ज बातों की स्मृति अब धुंधला सी गई हैं लेकिन इतना याद है कि वह असाधारण उपन्यास पढ़ कर पाठक ने उनसे जीवन की जटिलताओं से जुड़े कुछ प्रश्न किए थे, जिसके जवाब में निर्मल जी ने नए सवालों का एक विस्तृत क्षितिज पाठक के सामने खोल दिया था.
वह पत्र लेखक और पाठक के बीच के स्पेस और संबंघ से मेरा पहला परिचय था. किताबें पढ़कर लेखक को ख़त लिखे जा सकते हैं और उनके जवाब भी आते हैं- यह बात मेरे लिए जितने विस्मय और कौतुहल का विषय थी उतनी ही खुशी की भी.
झील के किनारे पैर लटका कर बैठे हुए, मैंने चिट्ठी को प्लास्टिक के कवर से निकाल, उसे छू कर, सूंघ कर देखा और फिर देर तक यूं ही निहारती रही.
कौतुहल का एक कारण यह भी था कि तब तक मेरा पहला ईमेल आईडी बन चुका था, सबसे सस्ता मोबाइल फ़ोन भी हाथों में था और ख़त लिखना किसी दूसरे युग की बात लगती थी. लेकिन शायद इसी वजह से पत्रों का आकर्षण भी मन में बढ़ता ही रहा.
प्रिय राम:
उस एक पत्र से शुरू हुई लेखकों के पत्र पढ़ने की यह यात्रा, बाद में चेखव, जॉर्ज ऑरवेल, रिल्क़े और सिल्विया प्लाथ जैसे लेखकों के पत्रों से होते हुए अब वापस निर्मल के पत्रों तक आ पहुंची है.
बड़े भाई और भारत के महशहूर चित्रकार राम कुमार को लिखे निर्मल के पत्रों की प्रकाशित किताब 'प्रिय राम' में, इन दोनों कलाकार भाइयों के जीवन, पठन-पाठन और सृजन प्रक्रिया की बहुत निजी और दुर्लभ झलकियाँ पाठक को मिलती हैं.
लेखक और निर्मल की पत्नी गगन गिल द्वारा सम्पादित यह किताब, कला और लेखन के प्रति निर्मल की घोर निष्ठा और उन्माद का एक स्पंदित सबूत है.
निर्मल के पत्रों के महत्व को किताब की भूमिका में रेखांकित करते हुए गगन लिखती हैं, "ये पत्र अपनी ऐतिहासिकता में आज इसलिए महत्वपूर्ण हैं, कि इनमें (निर्मल) उनके मोहभंग के सूत्र हैं. वह एक दिन में न कम्युनिस्ट विरोधी हो गए थे और न एक दिन में भारत प्रेमी. उनकी प्रज्ञा मूलतः प्रश्नाकुल थी, आलोचक नहीं."
एक पाठक की तरह मुझे यह भी महसूस हुआ कि निर्मल में ज़िंदगी को अंतिम बूँद तक निचोड़ने की तीव्र इच्छा थी. राम को लिखी स्नेहिल लेकिन अत्यंत सुपठित चिट्ठियों में पढ़ने-लिखने का सतत ज़िक्र है.
कौन इस वक़्त क्या पढ़ रहा है, जो यात्रा पर है वह अपनी यात्रा से कौन सी किताब, फ़िल्में और रिकॉर्ड ला सकता है- सारी बातचीत जैसे इन बिंदुओं के आस पास सिमटी हुई है.
शुरुआती चिट्ठियों में एक छोटी बच्ची के नए-नए पिता बने और विदेश में गृहस्थी जमाने के प्रयासों के बीच लेखन के संघर्ष से जूझते एक युवा सृजनकार की तस्वीर उभरकर सामने आती है.
निर्मल की इन चिट्ठियों में दर्ज मासूम चिंताएँ ऐसी जैसे, "लंदन में नाटक देखना महंगा हो गया है, मैं कुछ काम तलाश रहा हूँ ताकि जब तक यहां हूं. कुछ फ़िल्में ख़रीद सकूँ और नाटक देख सकूं". या फिर तब न्यूयॉर्क में रह रहे भाई को भेजे गए एक पत्र में दर्ज यह आग्राहपूर्ण पंक्ति, "यदि रिकॉर्ड सस्ते मिलें, विशेषकर फ़ोक संगीत के तो अवश्य ख़रीद लेना".
और फिर बीच में कहीं अचानक से आईं गहरी टीस से भरी ऐसी पंक्तियां भी जो पढ़ने के बाद भी देर तक भीतर बजती रहती हैं. जैसे - "मुझे कभी-कभी यह सोचकर विस्मय होता है कि सुख के लम्हे तक पहुँचते-पहुँचते हम उन सब लोगों से जुदा हो जाते हैं जिनके साथ हमने दुख झेलकर सुख का स्वप्न देखा था."
हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक मलयज ने निर्मल वर्मा के सृजन पर लिखे अपने निबंध 'स्मृति में बंद रचना' में उनके लेखन को 'अंतराल में' मौजूद लेखन बताते हुए कहा है, "उनकी रचना का स्पष्ट अर्थ उनकी स्मृति की तरह ही एक जगह ठहरा हुआ है. जगह नहीं, अंतराल में."
मलयज और 'अंतराल में' निर्मल
निर्मल के पत्रों में प्रकृति का मार्मिक और तरल विवरण पढ़ते हुए न जाने क्यों मलयज की ऊपर लिखी बात-बार बार याद आती है. जैसे शिमला से राम को भेजे पत्र में दर्ज उनकी यह पंक्ति - "शाम होने से पहले कुछ देर के लिए जब बारिश बंद हो जाती है, चारों तरफ़ एक सुनहरा, धुला-धुला सा आलोक फैल जाता है. तब अचानक दिन भर का अकेलापन एक साथ उभर आता है. मैं, न जाने क्यों, अभी तक इस तरह की अजीब अकेली ज़िंदगी को कोई अर्थपूर्ण तरतीब नहीं दे सका हूं. सुबह होते ही कोई गाँठ खुल सी जाती है लेकिन अंधेरा गिरते-गिरते ख़ुद ब ख़ुद बंद हो जाती है. इन दिनों बारिश के बाद पहाड़ों की धुली चमक एकदम बहुत अपनी सी चीज़ जान पड़ती है. शाम को पहला तारा जितना धीरज से ऊपर उठता है, पहाड़ों से अपने को बचता हुआ, अपने एकांत में संपूर्ण, उसका अहसास कभी दिल्ली में नहीं होता था."
राम को लिखे इन पत्रों में निर्मल के अन्य साहित्यिक मित्रों का ज़िक्र परस्पर चर्चा के दौरान सतत आता रहता है. देश के सुदूर कोनों के साथ-साथ सात समंदर पार तक, इन पत्रों के ज़रिए जारी इस सघन सृजनात्मक मंथन को वर्तमान समय में पढ़ते हुए आप शुरुआत में चौंक सकते है.
"निर्मल के सारे संवेग हमारे अराजक समय में एक अर्थवान हस्तक्षेप करने में संलग्न हो चुके थे. यह विचार के प्रति उनकी गहरी आस्था थी, जिसके चलते हम उन्हें न रोक सकते थे, न बचा सकते थे, केवल लहूलुहान होते हुए देख सकते थे", गगन जब यह लिखती हैं, तब शायद वह निर्मल के उसी कलात्मक समर्पण की ओर इशारा करती हैं, जिसकी पुकार एक तड़पती लहर की तरह निर्मल के पत्रों से लगातार उठती रहती है.
निर्मल की ओर से गगन को पहला पत्र :
निर्मल-गगन की कहानी के पोर-पोर में प्रेम है लेकिन यह कहानी मात्र प्रेम तक कभी सीमित नहीं थी. मानवीय संवेदनाओं के तलघर में जन्मी इस कहनी की परिधि इतनी मिथकीय और विशाल है कि दशकों तक सृष्टि के फेरे लगाने के बाद भी, आज इसकी एक विलक्षण सी झलक गगन जी की गहरी आंखों में महसूस की जा सकती है.
1979 में निर्मल से पहली बार मिली गगन, उनके बीच के पत्राचार के बारे में बताते हुए कहती हैं कि उन दोनों के बीच साझा हुआ पहला पत्र निर्मल की ओर से आया था. "अपनी नांदेड़ यात्रा का ज़िक्र करते हुए मैंने उन्हें गुरु गोविंद सिंह की तीसरी पत्नी साहिब देवां के बारे में बताया. उनको 'कुंवारा डोला' भी कहते हैं."
सिख धर्मग्रंथों में 'माता साहिब देवां' के नाम से मशहूर साहिब देवां के पिता विवाह की इच्छा से उन्हें गुरु गोविंद सिंह के पास लेकर गए थे. उनके पिता का आग्रह देखकर, गुरु गोविंद सिंह ने उनसे विवाह कर उनके साथ रहने की इजाज़त तो दे दी लेकिन यह भी बता दिया कि पहले से शादी शुदा होने की वजह से वह कभी साहिब देवां के कोई शारीरिक संबंध नहीं रखेंगे.
मात्र 20 साल की उम्र में तब 50 पूरे कर चुके निर्मल को साहिब देवां का यह क़िस्सा सुनाने वाली गगन छोटी उम्र से ही इंटेंस, गंभीर और बेहद समझदार थीं.
सरदारनी गगन की साहिब देवां की याद निर्मल के पास भीतर तक रह गई. इस पहली मुलाक़ात के ठीक एक महीने बाद आयई पहली चिट्ठी में निर्मल ने गगन को लिखा, "मुझे यह सोच कर हैरानी होती है कि अगर उस दिन संयोग से मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी नहीं गया होता तो शायद मैं एक साहिब देवां से नहीं मिल पाता."
अनुपस्थिति में उपस्थित प्रेम:
उस वक़्त को याद करते हुए गगन कहती हैं, "मन में दुविधाएँ थी क्योंकि आप लगातार ख़ुद से ही सवाल कर रहे होते हैं. आपको लगता है कि आप तैयार नहीं हैं- कहाँ निर्मल जी और कहाँ मैं- कितनी अलग-अलग ज़िंदगी...उम्र का फ़ासला...पूरी यूनिवर्सिटी उनके लेखन की दीवानी थी...सब पढ़ते थे उन्हें और मुझे भी उनके लिखे वाक्य याद थे...परिस्थिति इतनी असंभव थी और जटिलताएँ भी थीं लेकिन दो महीने के भीतर ही हमें मालूम चल गया था कि हम प्रेमी होंगे."
इसके तुरंत बाद निर्मल निराला सृजन पीठ के आमंत्रण के तहत दो वर्षों के लिए भोपाल चले गए. और दोनों प्रेमियों के बीच पत्रों-तारों का सिलसिला शुरू हुआ.
"मुझे याद है, एक बार मैंने उन्हें तार में लिखा कि मुझे उनसे तुरंत मिलना है. निर्मल अगले दिन की ट्रेन से दिल्ली आ गए और आ कर पूछा कि क्या 'अर्जेंसी' थी यूं बुलाने की. अब प्रेम में कोई वजह थोड़ी न होती है...प्रेम में तो बस देखना होता है एक दूसरे को, मिलने की इच्छा होती है."
बाद में निर्मल के भोपाल से भेजे एक ख़त को याद करते हुए गगन कहती हैं, "उन्होंने लिखा कि अब मेरे दो-दो अस्तित्व हो गए हैं. एक वह जो दिल्ली में नौकरी कर रहा है और एक जो भोपाल में उनके साथ है. अब मुझे लगता है कि यह बात निर्मल के लिए भी उतनी ही सच होगी. वो भी एक वह थे जो भोपाल में लिख रहे थे और एक वह जो मेरे साथ-साथ यहां दिल्ली में यात्रा कर रहे थे. यह एकदम सच है. क्योंकि प्रेम में आदमी अपनी अनुपस्थिति में जितना ज़िंदा होता है, उतना तो शायद अपनी मौजूदगी में भी नहीं होता."
निर्मल ने सहेज कर रखे थे गगन के सारे पत्र:
निर्मल वर्मा को हर हफ़्ते देश-विदेश से पाठकों के दर्जनों पत्र आया करते थे और वह नियम से हर पत्र का जवाब दिया करते थे. पाठकों और मित्रों को दिए जाने वाले इन जवाबों के लिए पोस्टकार्ड, स्टैम्प और नीले रंग के अंतर्देशीय लाने का ज़िम्मा अक्सर गगन के पास रहता. "वो रोज़ शाम 4 बजे के आसपास चाय के साथ पत्रों का जवाब दिया करते. आज भी मेरे पास उनके लिए लाए गए कुछ ख़ाली नीले लिफ़ाफ़े रखे होंगे. उनको पत्र इतने आते थे कि हमारी सोसाइटी का डाकिया कहता कि पूरी कॉलोनी के पत्र एक तरफ़ और बाबूजी के पत्र एक तरफ़.
पत्रों के जवाब देने के प्रति उनमें एक धार्मिक सी निष्ठा थी - कहते कि लिखने वाला जवाब की प्रतीक्षा में होगा. छोटा ही सही, जवाब ज़रूर लिखते. और फिर शाम को टहलते हुए ख़ुद अपनी डाक पोस्टबॉक्स में डाल आते."
लेकिन बड़ी संख्या में आने वाले पाठकों और मित्रों के इन पत्रों को पढ़कर निर्मल स्वयं फाड़ देते थे. यहां तक कि उनके जाने के बाद उनके काग़ज़ों से बड़े भाई राम कुमार तक के पत्र नहीं मिले.
गगन बताती हैं, "किताब में सिर्फ़ निर्मल के पत्र इसलिए शामिल हैं क्योंकि राम ने तो उनके सारे पत्र संभाल कर रखे थे, लेकिन निर्मल ने उनके पत्र नहीं रखे. उनके जाने के बाद उनके काग़ज़ों से सिर्फ़ बैंक और विदेशी प्रकाशकों के कुछ ख़त निकले."
गगन ने निर्मल के सारे ख़त संभाल कर रखे हैं. बातचीत के दौरान वह शुरुआती महीनों से ही पत्रों को सहेजने की अपनी आदत को याद करते हुए सोच में डूब जाती हैं. "मैं बार-बार कई-कई बार पढ़ती थी उनके ख़तों को...बाद में जब ज़्यादा ख़त हो गए तो मैंने उन पर नंबर लिखकर उनको तारीख़ों के हिसाब से जमाना शुरू कर दिया. लेकिन मैं आज भी एक बात सोच कर हैरान होती हूँ. दरअसल उनके जाने के बाद उनके काग़ज़ों से एक लिफ़ाफा निकला जिसमें मेरे सारे ख़त क़रीने से लगे हुए मौजूद थे. जब मैंने पहली बार वो लिफ़ाफ़ा देखा तो मैं इतना रोई - क्योंकि यह इंसान तो ख़त संभाल कर रखने वाल था ही नहीं. लेकिन मेरे सारे ख़त तो मौजूद थे! इसका मतलब निर्मल भी शायद मेरे पत्रों को बार-बार पढ़ते रहे होंगे."
400 पत्रों से भी लंबा प्रेम
दिल्ली के एक दूरस्थ उपनगर में मौजूद गगन और निर्मल के वर्तमान घर की बैठक में अब मार्च की शाम जमा होने लगी थी.
हमारी बातचीत के ऊपर इन दोनों लेखकों के बीच साझा हुए लगभग 400 प्रेम-पत्रों का मीठा सा बोझ बिखर गया था.
बातचीत के आख़िरी पड़ाव के दौरान हम गगन के सुंदर बागीचे में आ बैठे. पत्रों के लिए निर्मल के ईमेल का इस्तेमाल करने के सवाल पर उनके अंतिम और बहुचर्चित उपन्यास 'अंतिम अरण्य' से जुड़े कुछ यादगार क़िस्सों के सिरे खुल आए.
ईमेल और निर्मल के नींबू वाले हाथ
निर्मल ईमल का इस्तेमाल नहीं सीख पाए थे इसलिए उनके ज़्यादातर विदेशी अनुवादकों और प्रकाशकों को जाने वाली उनकी चिट्ठियाँ गगन उनके लिए टाइप किया करती थीं.
उस वक्त को याद करते हुए गगन के चेहरे पर एक स्नेहिल मुस्कान तैर जाती है. वह मद्धम आवाज़ में कहती हैं, "उन दिनों कंप्यूटर बहुत महंगे हुआ करते थे और मैंने जो शुरुआती कंप्यूटर लिया, उसमें निर्मल ने भी काफ़ी पैसों की मदद की थी. तो जब उन्होंने मुझसे कहा कि क्या मैं उनकी भी कुछ चीज़ें इस कंप्यूटर पर टाइप कर दिया करूंगी तो मैंने बात मान ली. तो प्रकाशन से जुड़ी कुछ विदेशी चिट्ठियों के साथ-साथ मैंने अंतिम अरण्य के भी सभी ड्राफ़्ट टाइप किए."
अंतिम अरण्य के पहले ड्राफ़्ट में निर्मल ने मौजूदा प्रकाशित उपन्यास के अंत से आगे भी 40 पन्ने लिखे थे, जिन्हें पढ़ते हुए गगन को लगा कि वो उस पांडुलिपी से सीधे-सीधे नहीं जुड़ते. "मैं ख़ुद एक क्रिएटिव राइटर हूँ इसलिए टाइप करते हुए हमेशा लेखन पर अपनी राय साझा किया करती थी. लेकिन जब मैंने निर्मल से कहा कि ये आख़िरी के 40 पन्ने इस किताब को 'बिलॉन्ग' नहीं करते तो शुरू में वो नाराज़ हुए. बोले, अच्छा, अब लिखना भी मैं तुमसे सीखूँगा? मैं उनके लेखन का बहुत आदर करती हूँ इसलिए मैंने उनकी बात को बहुत गंभीरता से लिया और वो 40 पन्ने भी पूरे टाइप किए. मुझे लगा क्या पता, हो सकता है अंत में ये पन्ने मुख्य नैरेटिव से वापस जुड़ जाएँ! लेकिन कुछ दिन बाद जब मैं दोपहर को सो रही थी तो निर्मल कमरे में आए. मेरे लिए नींबू की चाय बानकर लाए थे. चाय में नींबू निचोड़कर उन्होंने कभी हाथ नहीं धोए ! वहीं नींबू वाले हाथ मेरे चेहरे पर लगाकर मुझको उठाया. उस पल वो प्यार से एकदम भरे हुए थे. बोले, तुम सही कह रहीं थीं, वो आख़िरी के 40 पन्ने इस किताब के नहीं हैं...तुम उनको डिलीट कर सकती हो !"
पत्रों में निर्मल के मित्र : कृष्ण बलदेव वैद और कृष्णा सोबती
निर्मल के सामाजिक और सृजनात्मक आकाश में बहुत सारे परिचित और मित्र थे. साहित्य, लेखन और जीवन पर तो वह सबसे सघन बातचीत किया करते थे लेकिन अपनी निजी भावनाएँ सिर्फ़ अपने लिए रखते थे.
निर्मल के सबसे सघन पत्राचार के बारे में पूछने पर गगन कहती हैं कि जिस तरह से निर्मल ने ख़ुद को उनके और राम के साथ बाँटा, उतनी सघनता से शायद किसी के साथ नहीं. हां, कृष्ण बलदेव वैद और कृष्णा सोबती से उनकी मित्रता बहुत गाढ़ी, जटिल, लंबी और ख़ास थी. इनका ज़िक्र अक्सर निर्मल के साथ-साथ उनके दूसरों को लिखे पत्रों में भी आता है.
"कृष्णा जी और केबी (वैद) से निर्मल बहुत प्रेम करते थे. जैसा कि हर मित्रता में होता है, इनकी मित्रता में भी बाद के सालों में दूरियाँ आईं. ख़ासकर केबी और निर्मल - क्योंकि आख़िर हम सब इंसान हैं. जिस दिल से प्यार निकलता है, उसी से ग़ुस्सा और जलन भी निकलता है. मैंने इन लोगों की बहुत कड़वी लड़ाइयां भी देखीं...लेकिन मुझे लगता है जो कभी इनका गहरा प्रेम रहा होगा, यह ग़ुस्सा भी उसी का एक सिक्का है."
कोर्डराय का वो भूरा जैकेट और पुराना प्यार!
अमरीका यात्रा पर गए भाई राम को लिखे अपने पत्रों में निर्मल लगातार उनसे वैद के बारे में पूछते और उनसे मिलने का आग्रह करते नज़र आते हैं.
निर्मल और वैद की जटिल मित्रता को स्नेह से याद करते हुए गगन कहती हैं, "निर्मल के पास कोर्डराय का एक भूरा जैकेट था जिसे पहनते ही वो कुछ और लगने लगते थे. मैं उनसे प्यार से कहती कि तुम्हें शर्म नहीं आती इतना सुंदर लगने में?- कितने हैंडसम लग रहे हो इस जैकेट में! तो निर्मल के चेहरे पर एक स्वप्निल सी मुस्कान तैर जाती. और कहते- यह जैकेट मुझे केबी ने गिफ़्ट किया है! वो उनका सबसे पसंदीदा जैकेट था. लड़ाइयां भी मैंने दोनों की बहुत कड़वी देखीं - लेकिन जब निर्मल का 75वां जन्मदिन आया तो अचानक शाम को 8 बजे दरवाज़े की घंटी बजी और सामने केबी खड़े थे. तब निर्मल बीमार ही थे. लेकिन दोनों इतने प्यार से मिले - उनकी वो भावुक मुलाक़ात मुझे हमेशा याद रहेगी. आप उनको देखकर ही कह सकते थे कि इनके बीच की सारी लड़ाइयाँ अब ख़त्म हो गईं हैं और सिर्फ़ पुराना प्यार बचा है! उसी पुराने प्यार में खिंचे केबी चले आए हैं और उसी प्यार में बंधकर निर्मल उनसे मिल रहे हैं."
टॉलस्टॉय की क़ब्र से भेजा गया पत्र
लियो टॉलस्टॉय को गहराई से मानने वाले निर्मल के जीवन में 'अन्ना कारेनिना' सिर्फ़ एक किताब ही नहीं, बल्कि एक सशक्त उपस्थिति थी. रूस यात्रा के दौरान टॉलस्टॉय की क़ब्र से भेजे गए निर्मल के एक पत्र को याद करते हुए गगन कहती हैं, "पाठक और लेखक के बीच की दुनिया सिर्फ़ एक भौगोलिक-राजनीतिक दुनिया नहीं है. हमारी दुनिया किताबों, लेखकों से साथ-साथ उन किताबों के पात्रों के आंतरिक जीवन और उन पात्रों की नियति से भी कितनी बनी है! टॉलस्टॉय की अन्ना निर्मल के लिए एक बड़ा फ़िगर थीं. टॉलस्टॉय की क़ब्र से उन्होंने मुझे एक बहुत मार्मिक ख़त लिखा था ...क़ब्र पर सूखे पत्ते पड़े थे और निर्मल अपने साथ एक सूखा पत्ता उठा ले आए थे. अब सोचें कि एक लेखक की क़ब्र पर जाकर हम क्यों विचलित हो जाते हैं? क्योंकि शायद एक ही लम्हे में हम उस लेखक का धड़कता हुए दिल भी अपने भीतर महसूस कर लेते और उसका सोया हुआ दिल भी. एक ही लम्हे में उस लेखक की मौजूदगी भी जी लेते हैं और उसकी नामौजूदगी को भी..यह एक साथ जीवन और मृत्यु को अनुभव करने जैसा है".
देहरी पर पत्र : निर्मल और जयशंकर
कहानीकार, लेखक और निर्मल के पुराने मित्र जयशंकर के साथ उनके तीन दशक लंबे चले पत्र-व्यवहार के चुनिंदा ख़त 'देहरी पर पत्र' नामक संकलन में प्रकाशित हुए हैं.
नागपुर में रहने वाले जयशंकर निर्मल के साथ अपने पत्र-व्यवहार को याद करते हुए कहते हैं कि उनके अपने जीवन के संदर्भ में निर्मल के पत्रों के योगदान को देखना किसी परिंदे को उसकी पूरी उड़ान में देखने की कोशिश करना है. "जैसे हम किसी परिंदे को उसकी पूरी उड़ान में कभी नहीं देख सकते उसी तरह मैं यह ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि निर्मल जी के पत्रों से मुझे क्या मिला है. इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि उनके पत्रों से मैंने बहुत कुछ सीखा है और उनके पत्रों ने मेरे जीने को बहुत सहनीय बनाया है. उनके पढ़ने लिखने की दुनिया ने मेरे पढ़ने लिखने की दुनिया का बहुत विस्तार किया है. मैं अगर उनकी दुनिया की जिज्ञासाओं, उनकी उत्सुकता और उनकी साहित्यक लालसाओं के क़रीब न जाता, तो शायद मेरी अपनी दुनिया आज भी बहुत छोटी होती."
लेखक का अच्छे लेखन के सिवा कुछ नहीं बचा सकता
शब्द के प्रति निर्मल की आस्था का ज़िक्र करते हुए जयशंकर जोड़ते हैं, "निर्मल के पत्र और उनका लेखन सिर्फ़ यही बताता है कि एक लेखक का अच्छे लेखन से सिवा कुछ भी नहीं बचा सकता. न ही उसे पुरस्कार बचा सकते हैं, न ही आलोचकों और समीक्षकों की प्रशंसा और न ही जनसंपर्क, उसे सिर्फ़ अच्छा लेखन ही बचा सकता है. शब्द के प्रति निर्मल जी की जो आस्था और निष्ठा है वो इस वर्तमान समय में हमारी सबसे दुर्लभ धरोहर है."
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