कोरोना वायरस: गुजरात में ज़्यादा लोग क्यों मर रहे हैं?
इमेज कैप्शन, परवीन बानो के बेटे का कहना है कि अगर उनकी माँ को एक दिन पहले अस्पताल में बेड मिल जाता तो शायद उनकी माँ की जान बच सकती थी (तस्वीर में परवीन बानो)....में
Author, नितिन श्रीवास्तव
पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पढ़ने का समय: 7 मिनट
बीती 20 मई को परवीन बानो को सांस लेने में दिक्कत होना शुरू हुई.
जब ये बात उन्होंने अपने बेटे अमीर पठान को बताई तो वह अपनी माँ को लेकर अस्पताल भागे.
अमीर काफ़ी चिंतित थे क्योंकि उनकी 54 वर्षीय माँ डायबिटीज़ और दिल से जुड़ीं बीमारियां की भी शिकार थीं.
यही नहीं, अहमदाबाद के गोमतीपुर इलाके में कोविड 19 से जुड़े कई मामले सामने आए हैं. इसके बाद अगले 30 घंटे पूरे परिवार के लिए काफ़ी डराने वाले थे.
पठान कहते हैं कि वह तीन अस्पतालों में गए. दो सरकारी और एक निजी अस्पताल. लेकिन उन्हें कहीं भी एक बेड नहीं मिला. ऐसे में पठान अपनी माँ को घर लेकर आए गए.
पठान बताते हैं कि उस दिन और रात उनकी माँ को दिक्कत बढ़ गई. इस वजह से उनका परिवार अगले दिन उन्हें लेकर अहमदाबाद के सिविल अस्पताल लेकर गया.
जब माँ ने ली आख़िरी साँस
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अस्पताल में कोविड 19 के टेस्ट के लिए उनके सैंपल लिए गए और ऑक्सीजन सपोर्ट दिया गया.
लेकिन डॉक्टरों को पता चला कि उनका ब्लड ऑक्सीजन लेवल काफ़ी कम है. पठान बताते हैं ब्लड ऑक्सीजन लेवल दिन भर काफ़ी अजीब रहा.
इस वजह से डॉक्टरों ने उन्हें एक वैंटीलेटर से जोड़ दिया. इसके कुछ घंटों बाद 22 मई को एक बजकर उन्तीस मिनट को परवीन बानो ने आख़िरी साँस ली.
इसके अगली सुबह उनके टेस्ट की रिपोर्ट आई जिसमें पता चला कि वह कोरोना वायरस से संक्रमित थीं.
अस्पताल ने बीबीसी के सवालों के जवाब नहीं दिए.
लेकिन पठान कहते हैं कि अगर उनकी माँ को एक दिन पहले अस्पताल में बेड मिल जाता तो शायद उनकी माँ की जान बच सकती थी.
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कोविड 19 को ठीक से संभाल नहीं पाने की वजह से अहमदाबाद का ये अस्पताल लगातार चर्चा में बना हुआ है.
हाई कोर्ट ने इस अस्पताल में अब तक मर चुके 490 लोगों की संख्या का ज़िक्र करते अस्पताल को एक 'डंजन' यानी काली कोठरी की संज्ञा दी है.
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को भी इस महामारी को ठीक से नहीं संभाल पाने के लिए खरीखोटी सुनाई है.
लेकिन सरकार ने अपनी ओर से किसी भी तरह की ढील देने से इनकार किया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि गुजरात में कोरोना वायरस से इतने ज़्यादा लोग क्यों मर रहे हैं.
अहमदाबाद में इतने लोग क्यों मर रहे हैं?
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अहमदाबाद गुजरात का सबसे बड़ा शहर है जिसमें सत्तर लाख लोग रहते हैं.
ये शहर कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित है क्योंकि गुजरात के कुल मामलों में से 75 फीसदी मामले अहमदाबाद में हैं. और लगभग सारी मौतें अहमदाबाद में ही हुई हैं.
कोरोना वायरस संक्रमित लोगों की संख्या के आधार पर गुजरात 22527 मामलों के साथ चौथा राज्य है जहां पर ये महामारी अपना कहर ढा रही है.
लेकिन इस राज्य की फेटलिटी रेट 6.2 है जो कि भारत में सबसे ज़्यादा है. इसका मतलब ये है कि संक्रमित होने वाले कुल लोगों में से 6.2 फीसदी लोगों की मौत हो रही है.
ये नेशनल फेटलिटी रेट 2.8 फीसदी से भी दुगना है.
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जब गुजरात हाई कोर्ट ने अहमदाबाद में होने वाली इतनी ज़्यादा मौतों को लेकर चिंता जताई तो राज्य सरकार ने कहा कि इनमें से 80 फीसदी मौतें को-मॉर्बिडिटी वाले मरीज़ों की हुई है.
इसका मतलब ये मरीज़ पहले से बीमार थे और इसी वजह से वे कोविड19 इनके लिए ख़तरनाक साबित हुआ.
लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य पर शोध करने वाले कहते हैं कि मृत्यु दर की कोई एक वजह बताना मुश्किल है.
कुछ विशेषज्ञ इसके लिए गुजरात में बीमार लोगों की अधिकता को ज़िम्मेदार बताते हैं.
लेकिन कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि बीमारियों का भार कोई एक कारण नहीं हो सकता है. क्योंकि तमिलनाडु में किसी भी राज्य की अपेक्षा ज़्यादा डायबिटीज़ रोगी रहते हैं. लेकिन मृत्यु दर काफ़ी कम है.
क्या ज़िम्मेदार है?
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इस पहलू पर सवाल उठाए गए हैं कि क्या भारत कोविड 19 की मौतों की संख्या कम करके बता रहा है.
क्योंकि अगर ऐसा होता तो ऐसे कोई सबूत नहीं हैं जो कि ये बता सकें की गुजरात इस मामले में एक अपवाद है.
गुजरात के उप मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने बार बार इंटरनेशनल ट्रेवल और दिल्ली के धार्मिक आयोजन में शामिल होने वालों को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं. दिल्ली का धार्मिक आयोजन भारत में कोरोना वायरस का अब तक का सबसे बड़ा क्लस्टर है.
लेकिन ये भी ऐसे कारक नहीं हैं जिनका असर सिर्फ गुजरात पर पड़ा हो.
केरल में भी गुजरात से ज़्यादा लोग विदेश से वापस आए. वहीं, तमिलनाडु ने कोरोना वायरस संक्रमित लोगों की कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग में ये पाया गया है कि बहुत सारे संक्रमित लोग किसी न किसी तरह दिल्ली के धार्मिक आयोजन में शामिल होने वाले लोगों से मिले थे.
ऐसे में ये सभी कारक संक्रमितों की संख्या में वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार ठहराए जा सकते हैं.
लेकिन ये मरने वालों की इतनी बड़ी संख्या की वजह नहीं बताते हैं.
कम टेस्टिंग, अविश्वास, और शर्म
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अहमदाबाद हॉस्पिटल एंड नर्सिंग होम एसोशिएसन के अध्यक्ष भारत गढ़वी कहते हैं, "इसकी एक वजह ये हो सकती है कि लोग अस्पताल तक काफ़ी देर से पहुंच रहे हैं."
डॉक्टर कहते हैं कि निजी अस्पताल मरीज़ों को लेने से मना कर रहे हैं या ऐसा करने में असमर्थ हैं, इस वजह से लोग सरकारी अस्पताल में इलाज़ कराने से बच रहे हैं.
इसकी वजह सरकारी अस्पतालों की बुरी हालत और लोगों का अविश्वास भी है.
डॉक्टर कहते हैं कि इसकी वजह शर्म भी हो सकती है.
भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक अस्पताल एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने मई में अहमदाबाद सिविल अस्पताल के डॉक्टरों से मुलाकात के बाद इसी ओर संकेत दिया था.
उन्होंने कहा था, "एक बहुत बड़ा मसला जिस पर बात हुई वो कोविड 19 के मरीज़ों के साथ जुड़ा शर्म का अहसास थी. लोग अभी भी टेस्टिंग के लिए अस्पताल आने में डर रहे हैं."
मई में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई. ये संभवतः इसलिए हुआ क्योंकि स्क्रीनिंग और टेस्टिंग बढ़ गई जिसकी वजह से डॉक्टर और अधिकारी वायरस को तेजी से फैलाने वालो संभावित तत्वों (जैसे सब्जी और फल वाले) की पहचान करने में सफल हो सके.
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लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि अहमदाबाद में टेस्टिंग अभी भी काफ़ी कम है.
ख़ासकर अहमदाबाद का वो पुराना हिस्सा जिसके सामने दीवार खड़ी कर दी गई है.
अर्थशास्त्र के प्रोफेसर कार्तिकेय भट कहते हैं, "सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए ध्यान नहीं लगाया. ख़ासकर कंटेनमेंट ज़ोन में."
वह कहते हैं कि अहमदाबाद के पुराने शहर में 10-11 कंटेनमेंट ज़ोन हैं. और इन सभी जगहों पर घनी आबादी है.
वह कहते हैं कि इन इलाकों को शहर से काट दिया गया था. लेकिन अधिकारियों ने इन इलाकों में वायरस के प्रसार की रोकथाम के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए."
समाजशास्त्री गौरांग जानी कहते हैं, "इन जगहों पर शारीरिक या सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करना मुश्किल है क्योंकि ये वो इलाके हैं जहां लोग घर के कपड़े और बर्तन भी घर से बाहर धोते हैं."
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की एक रिपोर्ट कहती है, "विशेषज्ञ मानते हैं कि इन इलाकों में वायरस बेहद तेजी से फैला और जानकारी के अभाव एवं शर्म की वजह से लोगों ने अस्पताल जाना उचित नहीं समझा."
एक बड़ा शहर
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लेकिन इस वायरस से संक्रमित होकर बचने वाले भी कहते हैं कि शहर के अस्पताल इस संकट को संभालने के लिए तैयार नहीं हैं.
दस दिनों तक कोविड 19 वार्ड में इलाज़ कराकर ठीक होने वालीं 67 वर्षीय लक्ष्मी परमार कहती हैं, "मुझे कई घंटों बाद बेड मिला था.
वे कहती हैं, "शुरुआत में किसी तरह का नाश्ता नहीं था. मुझे एक स्थानीय राजनेता से इसकी शिकायत करनी पड़ी. वहां पर चालीस से पचास मरीज़ों पर दो बाथरूम थे."
विशेषज्ञ कहते हैं कि इस महामारी ने गुजरात के ख़राब स्वास्थ्य तंत्र को उजागर कर दिया है.
प्रोफेसर भट कहते हैं, "ये सब नहीं होता तो कोई भी ये जानने में रुचि नहीं लेता कि गुजरात के अस्पताल किस हालत में हैं. अब डॉक्टरों की कमी और पैरामेडिक्स की संख्या में कमी सबके सामने आ गई है. हम ये देख रहे हैं कि लॉकडाउन के दौर में भी जल्दबाजी में लोगों को नौकरी पर रखा जा रहा है."
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि गुजरात में प्रति एक हज़ार लोगों के लिए 0.3 बेड हैं जो कि राष्ट्रीय औसत 0.5 से भी कम है. यानी गुजरात में प्रति दस हज़ार लोगों पर सिर्फ तीन बेड उपलब्ध हैं.
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कोरोना वायरस के मामले बढ़ने की वजह से बेड, पीपीई किट और क्वारंटीन केंद्रों की कमी हो गई है.
बीते कुछ हफ़्तों में गुजरात ने कुल संक्रमित लोगों की संख्या तमिलनाडु से भी ज़्यादा हो गई है. लेकिन हालात अभी भी काफ़ी ख़राब हैं क्योंकि मृत्यु दर काफ़ी ज़्यादा है.
गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री नितिनभाई पटेल कहते हैं, "मैं इससे असहमत हूँ कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने में सफल नहीं रहे हैं. हमारे पास इस समय 23000 बिस्तर उपलब्ध हैं. हमारे स्वास्थ्य कर्मी लगातार काम कर रहे हैं. हम उन्हें बेहतरीन मेडिकल उपकरण दे रहे हैं ताकि वे स्थिति को संभाल सकें. और स्थिति अब धीरे धीरे नियंत्रण में आ रही है."
लेकिन गुजरात सरकार की आलोचना की वजह ये भी है कि गुजरात में पहला मामला लॉकडाउन लगने से कुछ दिन पहले 19 मार्च को सामने आया था. और वह इसे समय रहते रोकने में नाकामयाब रही.
गड़वी कहते हैं, "सरकारी नीतियां थोड़ी बेहतर हो सकती थीं. टेस्टिंग और क्वारंटीन केंद्र दिखने में मजबूत थे. लेकिन समय के साथ कमजोर होते चले गए, जैसे जैसे प्रशासन थकता नज़र आने लगा."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
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पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
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अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.