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दिल्ली हिंसाः बीजेपी नेताओं की वो 'स्पीच' जिसे दिल्ली पुलिस ने दी है क्लीनचिट
दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किए गए एक हलफ़नामे में कहा है कि अब तक उन्हें ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं जिनके आधार पर ये कहा जा सके कि बीजेपी नेता कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर ने किसी भी तरह लोगों को ‘भड़काया हो या दिल्ली में दंगे करने के लिए उकसाया हो.’
दिल्ली पुलिस ने ये हलफ़नामा एक याचिका के जवाब में पेश किया. इस याचिका में उन नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने की बात कही गई है, जिन्होंने जनवरी-फ़रवरी में विवादित भाषण दिया था.
हलफ़नामे को पेश करते हुए डिप्टी कमिश्नर (क़ानून विभाग) राजेश देव ने ये भी कहा कि अगर इन कथित भड़ाकाऊ भाषणों और दंगों के बीच कोई लिंक आगे मिलेगा तो उचित एफ़आईआर दर्ज़ की जाएगी.
उत्तरी पूर्वी दिल्ली में 23-26 फ़रवरी को दंगे हुए थे, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल और बेघर हो गए.
दिल्ली पुलिस की तरफ़ से दंगों को लेकर दर्ज कुल 751 अपराधिक मामलों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट में कहा गया कि शुरुआती जाँच में ये पता चला है कि ये दंगे ‘त्वरित हिंसा’ नहीं थे बल्कि बेहद सुनियोजित तरीक़े से सोच समझ कर ‘समाजिक सामंजस्य बिगाड़ा’ गया.
दिल्ली पुलिस ने जून में दंगों को लेकर एक क्रोनोलॉजी पेश की थी. इसमें समाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद के 16 दिसंबर और 22 जनवरी को दिए गए भाषणों का ज़िक्र किया गया है, लेकिन इसमें 27, 28 जनवरी को दिए गए केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और बीजेपी सांसद परवेश वर्मा के विवादित भाषणों का ज़िक्र नहीं है.
यहाँ तक कि 23 फ़रवरी को दिए गए कपिल मिश्रा के ‘अल्टीमेटम…’ वाले भाषण को भी दिल्ली पुलिस ने ‘क्रोनोल़जी’ में पूरी तरह नज़रअंदाज कर दिया था.
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क्या थे इन तीनों नेताओं के विवादित बयान
‘देश के गद्दारों को...’
तारीख 27 जनवरी, केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री और दिल्ली चुनाव में बीजेपी के स्टार प्रचारक रहे अनुराग ठाकुर ने रिठाला में आयोजित एक रैली के दौरान लोगों से नारे लगवाए- ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो ....को.’
रैली का वीडियो सोशल मीडिया और तमाम टीवी चैनलों पर दिखाया गया. वीडियों में साफ़ सुना जा सकता है कि इस नारे के शुरुआती बोल अनुराग ठाकुर ने बोले, और आधे बोल जनता की तरफ़ से पूरे किए गए.
उन्होंने लोगों से तेज़ आवाज़ में अपने साथ ये नारा लगाने को कहा था. इस पर चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर पर तीन दिन का प्रतिबंध लगाया था और बीजेपी ने उन्हें अपनी स्टार प्रचारक की लिस्ट से बाहर कर दिया था.
उन दिनों दिल्ली में सीएए और एनआरसी को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. तमाम प्रदर्शनों में से सबसे बड़ा प्रदर्शन शाहीन बाग़ में हो रहा था, जो सबसे लंबे वक़्त तक भी चला. इसलिए शाहीन बाग़ प्रदर्शन दिल्ली चुनाव में अहम मुद्दा भी बना.
‘शाहीन बाग के लोग मां- बहनों का रेप करेंगे...’
28 जनवरी को दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिमी दिल्ली से बीजेपी सांसद परवेश वर्मा ने भी एक विवादित बयान दिया.
समाचार एजेंसी को दिए बयान में उन्होंने कहा, "शाहीन बाग़ में लाखों लोग जमा हैं. दिल्ली की जनता को सोच-विचार कर ही फैसला लेना चाहिए. वे आपके घरों में घुस जाएँगे, आपकी माँ-बहनों से दुष्कर्म करेंगे और उन्हें मार देंगे. अगर भाजपा सरकार बनी तो सभी मस्जिदें हटवा दूँगा, शाहीन बाग़ भी एक घंटे में ख़ाली होगा.‘’
चुनाव आयोग ने उनके इस इंटरव्यू के कारण उनपर 4 दिन तक चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध लगाया था.
‘’...ट्रंप के जाने के बाद हम पुलिस की भी नहीं सुनेंगे’’
23 फ़रवरी, ये वो दिन था जब दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाके में देर शाम से हिंसा शुरू हुई थी.
इसी दिन मौजपुर में कपिल मिश्रा ने सीएए के समर्थन में एक रैली में कहा था, ‘’डीसीपी साहब हमारे सामने खड़े हैं. मैं आप सबके बिहाफ़ पर कह रहा हूँ, ट्रंप के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं, लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे अगर रास्ते ख़ाली नहीं हुए तो... ट्रंप के जाने तक आप (पुलिस) जाफ़राबाद और चांदबाग़ ख़ाली करवा लीजिए ऐसी आपसे विनती है, वरना उसके बाद हमें रोड पर आना पड़ेगा. ‘’
इसी दिन शाम में सीएए समर्थकों और एंटी सीएए प्रदर्शनकारियों के बीच पत्थरबाज़ी हुई, और यहीं से दिल्ली दंगों की शुरुआत हुई. देखते ही देखते ये हिंसा चांदबाग़, करावल नगर, शिवपुरी, भजनपुरा, गोकुलपुरी सहित उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाक़ों में आग की तरह फैल गई.
लेकिन दिल्ली पुलिस का कहना है कि अब तक इन भाषणों का दिल्ली में हुई हिंसा से कोई लिंक सामने नहीं आया है.
पुलिस ने इन नेताओं पर एफ़आईआर की मांग करने वाली याचिका को ख़ारिज करने की मांग करते हुए कोर्ट में कहा, ‘’याचिकाकर्ताओं ने अपने छिपे एजेंडे के तहत चुन कर कुछ ख़ास भाषणों और घटनाओं का ज़िक्र किया है. ये याचिकाकर्ता कुछ खास घटनाओं पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं लेकिन इन लोगों ने अन्य कई हिंसा की घटनाओं के नज़रअंदाज़ कर दिया है. ये दिखाता है ये याचिका उचित और निष्पक्ष नहीं बल्कि ख़ास सोच से प्रेरित हैं.‘’
बीबीसी ने जब दिल्ली पुलिस के हाईकोर्ट में दिए हलफ़नामे पर बात करने के लिए दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता मनदीप सिंह रंधावा से संपर्क किया तो उन्होंने सवाल सुनने के बाद कहा कि वह एक बैठक में हैं और उन्हें सवाल मेल के ज़रिए भेज दिए जाएँ.
बीबीसी ने सवालों की लिस्ट दिल्ली पुलिस को भेजी है, जिसका जवाब ख़बर लिखे जाने तक नहीं मिला है.
26 फ़रवरी को हाई कोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधरन की बेंच ने कोर्ट में कपिल मिश्रा के मौजपुर में दिए गए भाषण को देखा था और दिल्ली पुलिस को 24 घंटे के भीतर एफ़आईआर दर्ज करने पर फ़ैसला लेने को कहा था. इस याचिका को समाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने दायर किया था.
हालाँकि इसके एक दिन बाद 27 फरवरी को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस आदेश से असहमत होते हुए कहा था, ‘’अभी एफ़आईआर के लिए हालात ‘ठीक’ नहीं है. अब तक हिंसा से जुड़े 48 एफ़आईआर दर्ज हुए हैं और जब तक दिल्ली के हालात सामान्य नहीं हो जाते, तब तक का वक़्त मिलना चाहिए.’’
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