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अपने हक़ के लिए बेटी अदालत के दर पर खड़ी है? आप कैसे पिता हैं?-ब्लॉग
- Author, मनीषा पांडेय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कल दोपहर मैं यू-ट्यूब पर जानी-मानी फेमिनिस्ट लेखिका ग्लोरिया स्टाइनम का एक इंटरव्यू देख रही थी. उसमें एक जगह इंटरव्यू लेने वाली महिला जादा पिंकेट ग्लोरिया के संस्मरण का एक अंश पढ़ती हैं,"पिता मेरे साथ बहुत आदर से पेश आते. मुझसे हर विषय पर बात करते, मेरी राय पूछते, उसे महत्व देते. वो खुद से ज्यादा मुझे महत्व दिया करते थे."
इसके बाद इससे पहले कि वो सवाल पूछतीं, ग्लोरिया ने मुस्कुराकर कहा, "हां बिल्कुल. जीवन में मुझे जितने बेहतरीन प्रेमी मिले, उन सबके लिए मैं अपने पिता की शुक्रगुजार हूं. "
जिस वक्त ग्लोरिया अपने पिता के बारे में बात कर रही थीं, हिंदुस्तान की सबसे ऊंची अदालत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए इस देश के पिताओं से कह रही थी कि तुम्हारी संपत्ति में तुम्हारी बेटी का बराबर का हक़ है.
हालांकि ये कोई नई बात नहीं थी. हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में बदलाव तो 2005 में ही हो चुका था. जहां पुराना कानून पिता की सारी संपत्ति सिर्फ बेटों के नाम कर रहा था, वहीं 2005 के संशोधन के बाद लड़कियों को भाई के बराबर हिस्सा मिल गया था. मगर सिर्फ कानून की किताब में, ज़िंदगी में नहीं.
चूंकि कागज पर अधिकार देने से जिंदगी में अधिकार मिल नहीं गया था, इसलिए इस बीच कुछ औरतों ने कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया. कोर्ट की अब तक इस बारे में कोई साफ समझ नहीं थी कि अगर 2005 के पहले किसी हिंदू व्यक्ति की मृत्यु हो गई हो तो उसकी संपत्ति में बेटी के हिस्से का क्या होगा? 2005 के संशोधन से पहले ही बेटों के सुपुर्द कर दी गई संपत्ति में बेटी के हिस्से का क्या होगा?
2015 में प्रकाश बनाम फूलवती के ऐसे ही एक मुकदमे में फैसला सुनाते हुए दो जजों की बेंच ने कहा कि ये अधिकार पिता के जीवित रहने की स्थिति में ही मिल सकता है.
2018 में दोबारा ऐसे ही एक मुकदमे में दो जजों की बेंच ने कहा कि 2001 में पिता की मृत्यु हो जाने के बावजूद पिता की संपत्ति में बेटी का बराबर का हिस्सा है. उसी साल एक दूसरे प्रॉपर्टी के मुकदमे में जज ने दोबारा लड़की को अधिकार देने से मना कर दिया क्योंकि उसके पिता की मौत कानून में बदलाव होने से पहले ही हो चुकी थी.
इतनी सारी खचपच के बीच अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट को ये लगा कि इस कानून में और साफगोई की ज़रूरत है तो ठीक ही लगा. इसी साफगोई को अमल में लाते हुए बुधवार के फैसले में ये कहा गया कि जन्म से ही पिता की संपत्ति में बेटी का बराबर का अधिकार है. अब पिता चाहे जीवित हों या न हों, लड़की कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी तो आधा घर, आधी जमीन पाएगी.
लड़कियों को अदालत क्यों जाना पड़ेगा?
लेकिन असली सवाल तो ये है कि कितनी लड़कियां कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी? कितनी खटखटा रही हैं? उन्हें क्यों खटखटाना चाहिए? उन्हें क्यों कहना चाहिए कि आधा खेत, आधा घर, आधी जमीन, आधा पैसा मेरा है. पिता को क्यों कहना चाहिए सबकुछ आधा बेटी का है. बेटे और बेटी का हक बराबर है.
आज ये आर्टिकल लिखने से पहले मैंने एक प्रयोग किया. मैं जहां रहती हूं, उस 27 मंजिला इमारत के हर फ्लोर पर छह फ्लैट हैं. आज मैंने हर फ्लैट का दरवाजा खटखटाया और उस घर की महिला से एक ही सवाल पूछा,
"क्या आपको अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा मिला?"
सारी स्त्रियों का एक ही जवाब था, "ना."
हालांकि किसी ने ये नहीं कहा कि पिता ने दिया नहीं. सबने कहा कि उन्होंने मांगा नहीं, कि उन्हें चाहिए नहीं, कि उन्होंने इस बारे में सोचा ही नहीं.
बहुत साल पहले एक बार मैंने अपना एक फैमिली चार्ट बनाया था. अपने ननिहाल और ददिहाल की पिछली तीन पीढ़ियों का. उस चार्ट के मुताबिक हमारे खानदान में आज तक एक भी ऐसा केस नहीं हुआ है, जहां बेटी को बाप की संपत्ति में कोई भी हिस्सा मिला हो.
फिलहाल कानून चाहे जो कहे, बेटी को संपत्ति में हिस्सा देने का रिवाज हमारे यहां नहीं है. हमारे गांव के किसी घर में नहीं है. आसपास के गांव के किसी घर में नहीं है. 50 कोस से लेकर 5000 कोस पैदल या सवारी से नाप आओ तो भी किसी घर में नहीं है. मेरे गांव और आसपास के 1000 और गांवों, शहरों की सारी जमीन, सारी संपत्ति कचहरी के कागज पर मर्दों के नाम दर्ज है.
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अगर आपको इस बात पर कोई शुबहा हो तो एक फैमिली चार्ट आप भी बनाइए और पता करिए कि आपके आसपास की सारी जमीनें, सारे खेत, सारी संपत्ति किसके नाम है.
हमारे घर में जिन मर्दों का कोई बेटा न हुआ और जिनकी औरतें सिर्फ बेटियां जनने का ताना सुनते हुए दुनिया से रुखसत हुईं, उनकी संपत्ति भी उनकी बेटियों को नहीं, बल्कि जेठ-देवर के बेटों को दी गई. इस बीच दोनों परिवारों में कुल मिलाकर तीन बाल विधवा बहुएं, कुछ आधा दर्जन अनब्याही और विधवा होकर मायके रहने आ गई बुआएं रहीं, जो जिंदगी भर भाई के बच्चों और फिर उसके नाती-पोतों के पोतड़े धोती बुढ़ा गईं, लेकिन बाप के घर और जमीन का एक टुकड़ा भी उन्हें नसीब नहीं हुआ.
घर के एक बुजुर्ग से ये कहा तो जवाब मिला, "भाई रखा तो जिंदगी भर. खिलाया, ओढ़ाया, और क्या चाहिए. संपत्ति-पैसा लेकर क्या करती?" ये बोलने वाले खुद तीन बेटियों का पिता हैं.
ये हैं हमारे हिंदुस्तानी पिता, जो अपनी बेटियों से प्यार तो करते हैं, लेकिन अपनी संपत्ति से ज्यादा प्यार करते हैं. आदर-सम्मान की बात तो रहने ही दें क्योंकि वो उत्तर भारतीय गोबर पट्टी में आदर का आइडिया ही बहुत नया है. हम औरतों को पूजने वाले लोग हैं, उनका आदर करने और उन्हें संपत्ति में बराबर का हिस्सा देने वाले नहीं.
जैसे ग्लोरिया कहती हैं, कि जीवन में मिले बेहतरीन पुरुषों के लिए वो अपने पिता की शुक्रगुजार हैं, शायद उसका उलटा भी उतना ही सच है. औरतें अपनी जिंदगी की तमाम दुर्गति, दुख, पीड़ा, अपमान और अब्यूसिव रिश्तों के लिए भी अपने पिता की ही शुक्रगुज़ार हैं.
भारतीय परिवार बेटी को संपत्ति में बराबर का हिस्सा न देकर उसे ये बता रहे होते हैं कि वो भाई से कम है. उसका आदर कम है, उसका हक कम है, उसके हिस्से में सबकुछ घर के मर्दों से कम है. जो अपने पिता की नजरों में कम हो, वो पति की नजरों में भी कम ही होती है.
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आप किस तरह के पिता हैं?
पिताजी कहते हैं, बिटिया पराया धन है, पति का घर ही तुम्हारा घर है. पति का मिजाज बिगड़ जाए तो कहता है, जाओ अपने बाप के घर. चूंकि कचहरी के कागजों पर हर घर किसी मर्द के नाम दर्ज है, उसे पता ही नहीं कि उसका घर है कौन सा.
हालांकि प्यार का दावा तो करते हैं, लेकिन बेटी को संपत्ति में बराबर का हिस्सा न देकर पिता पहले ही उसके पैरों से ज़मीन खींच लेते हैं. ससुराल में सब सुख रहा तो ठीक, दुख रहा तो खिलाकर, ओढ़ाकर एहसान भी करते हैं.
जो औरत ये एहसान न चाहे, जो अपने हिस्से का खेत खुद जोतना चाहे, अपने हिस्से का पैसा खुद खर्च करना चाहे, अपने खाने-ओढ़ने की फिक्र खुद करना चाहे, उसके लिए पिता का प्यार छूमंतर होने में भी वक्त नहीं लगता.
ग्लोरिया का वो एक वाक्य कल से मेरे जेहन में अटक गया है. "जीवन में मुझे जितने बेहतरीन प्रेमी मिले, उन सबके लिए मैं अपने पिता की शुक्रगुजार हूं."
सिर्फ प्रेमी ही नहीं, मर्दों के आधिपत्य वाली इस दुनिया में अपने साथ हुई हर अच्छी और बुरी बात के लिए दरअसल हम आप के ही शुक्रगुजार हैं. कल सुप्रीम कोर्ट आपसे ही कह रहा था कि आपकी बेटी का हक़ बिलकुल बराबर है.
अगर आप एक अच्छे पिता हैं तो कोर्ट की बात आपको समझ में आएगी और अगर नहीं हैं, तो कोर्ट की बात समझाने के लिए खुद कोर्ट के दरवाजे तो खुले ही हैं.
तो आप किस तरह के पिता हैं?
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