हरिवंश, जिन्हें आप जानते हैं और जिन्हें आप नहीं जानते

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
रविवार 20 सितंबर का दिन राज्यसभा के इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा. कोरोना काल में चल रही राज्यसभा की बैठक में सारी पाबंदियाँ ताक पर रख दी गईं. ख़ूब हो हल्ला हुआ. विधेयक की प्रतियाँ फाड़ी गई और उप सभापति की सीट तक सांसद पहुँच गए.
एक दूसरे को रोकने की कोशिश हुई और आख़िरकार ध्वनि मत से कृषि सुधारों से संबंधित विधेयक पारित हो गए. कई विपक्षी सांसदों ने इस पर ऐतराज़ जताया और इसे लोकतंत्र की हत्या की संज्ञा दी. इन सब विवादों के बीच जिनकी सबसे अधिक चर्चा हुई, वो हैं राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह.
जनता दल यू के राज्यसभा सांसद हरिवंश को हाल ही में दोबारा राज्यसभा का उपसभापति चुना गया है. हरिवंश के व्यवहार से नाराज़ कई विपक्षी पार्टियों ने उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया, लेकिन इसे ख़ारिज कर दिया गया है.
इस मामले में आठ सांसदों को उप राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने निलंबित किया है, उनमें तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन और आम आदमी पार्टी के संजय सिंह भी शामिल हैं.
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लेकिन सोमवार को आठ सांसदों ने इसे मानने से इनकार कर दिया और रात भर धरना प्रदर्शन पर बैठे रहे. लेकिन इन निलंबित सांसदों को मंगलवार की सुबह उस समय आश्चर्य हुआ, जब हरिवंश उनके लिए चाय लेकर धरना स्थल पर पहुँच गए.
लेकिन साथ ही उन्होंने विपक्षी सांसदों के व्यवहार के ख़िलाफ़ एक दिन का उपवास रखने का भी ऐलान किया है.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निलंबित सांसदों को चाय पिलाने पहुँचे हरिवंश की ख़ूब सराहना की.
लेकिन इन सबके बीच हरिवंश की राजनीति में आने की कहानी भी कम रोचक नहीं. पहले बैंक अधिकारी और फिर पत्रकारिता को करियर बनाने वाले हरिवंश एक समय पत्रकारिता के आदर्श माने जाते थे, लेकिन समय के साथ उन पर कई सवाल भी उठे.
आचार संहिता

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वह 21वीं सदी के पहले दशक का कोई साल था. झारखंड के प्रतिष्ठित हिन्दी अख़बार प्रभात ख़बर ने अपने सभी संस्करणों में एक आचार संहिता छापी.
उसमें कई दूसरी बातों के साथ यह उल्लेख भी था कि हमारे पत्रकार कोई गिफ़्ट नहीं लेंगे. हाँ, नए साल की शुरुआत और कुछ दूसरे विशेष अवसरों पर डायरी या कलम जैसी चीज़ें लेने की छूट थी.
वह आचार संहिता अख़बार के तत्कालीन प्रधान संपादक हरिवंश ने तैयार कराई थी. उन्होंने ही उसे प्रकाशित करने का भी आदेश दिया था.
तब मैं प्रभात ख़बर के देवघर संस्करण का स्थानीय संपादक हुआ करता था. हमने वह कतरन नोटिस बोर्ड पर टंगवा दी, ताकि हमारे साथियों को इसका हर वक़्त भान रहे. वे अपनी आचार संहिता का पालन करते हुए समाज के समक्ष आदर्श पत्रकारिता का उदाहरण पेश करें. उस पर किसी ने कोई आपत्ति भी नहीं की.
कुछ साल बाद प्रभात ख़बर के राँची संस्करण के स्थानीय संपादक बैजनाथ मिश्र झारखंड के नवगठित सूचना आयोग के आयुक्त बना दिए गए. कानाफूसी शुरू हुई कि यह तो आचार संहिता का उल्लंघन है. अब हरिवंश उन्हें कोई जगह नहीं देंगे. लेकिन, हरिवंश जी ने उन्हें कुछ नहीं बोला.
प्रभात ख़बर के दफ़्तर में वे जिस केबिन में बैठते थे. वह केबिन उन्हीं के लिए आरक्षित रखी. वे सूचना आयुक्त होते हुए भी प्रभात ख़बर के दफ़्तर आते रहे. वहाँ बैठते रहे और अपने हिसाब से संपादकीय निर्देश भी देते रहे.

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बाद के सालों में हरिवंश ख़ुद राज्यसभा चले गए. उन्हें उस जनता दल (यू) ने टिकट दिया, जिसके सबसे बड़े नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन की तुलना हरिवंश जी के संपादन वाले अख़बार ने चंद्रगुप्त मौर्य के शासन से की थी.
लोगों ने तब भी कहा कि यह तो हरिवंश जी की आचार संहिता का उल्लंघन है. वे कैसे उपकृत (गिफ़्ट लेना) हो सकते हैं. लेकिन, हरिवंश जी राज्यसभा सांसद बनने के बाद भी प्रभात ख़बर के संपादकीय को नियंत्रित करते रहे. दफ़्तर आकर बैठते रहे.
पहली बार सांसद बनते समय उन्होंने अपने अख़बार में लंबा लेख लिखा. यह बताया कि उन्होंने किस तरह मेहनत करके पैसे कमाए हैं. तब उन्होंने जो संपत्ति (करोड़ों में) घोषित की थी, पाँच साल बाद अब वही संपत्ति लगभग चौगुनी (चुनाव आयोग के शपथ पत्र के मुताबिक़) हो चुकी है.
हाल ही में दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति निर्वाचित किए गए हैं. भारतीय संसद के इस ऊपरी सदन में लोग उन्हें हरिवंश नारायण सिंह के नाम से जानते हैं. उनकी छवि ईमानदार राजनेता और संवेदनशील पत्रकार की रही है.
हालांकि, 20 सितंबर को कृषि से संबंधित विधेयकों पर चर्चा के दौरान जिस तरीक़े से उन्होंने राज्यसभा की कार्यवाही चलाई, उसे लेकर उनकी आलोचना भी की जा रही है.
सोशल मीडिया पर उनको लेकर कई तरह की चर्चाएँ हैं. लोग कह रहे हैं जब किसी एक सांसद की मांग पर भी संसद में वोटिंग (मत विभाजन) की परंपरा रही है, तो राज्यसभा के उपसभापति के बतौर हरिवंश जी ने कृषि विधेयकों पर मत विभाजन क्यों नहीं कराया.
पत्रकार हरिवंश

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अब बात उस हरिवंश की, जिनका नाम हिन्दी पत्रकारिता में बड़े अदब और शान से लिया जाता रहा है. उन्होंने कभी फालतू बातें नहीं की. न केवल अपनी पत्रकारिता का लोहा मनवाया बल्कि अपने व्यवहार में भी वे दूसरों से काफ़ी अलग रहे. ईमानदार रहे. मज़बूत रहे.
वे हमारे सामान्य ज्ञान के इकलौते वैसे संपादक रहे, जिनसे मिलने के लिए प्रबंधन के लोगों को भी इंतज़ार करना पड़े. वे हमेशा जनता के मुद्दों के साथ खड़े रहे. उन्होंने एक ऐसा आवरण तैयार कर लिया, जिसमें लोग उन्हें महान पत्रकार के तौर पर देखें. शायद उनका यही आवरण राज्यसभा में उनके आचरण पर सवाल खड़े करवा रहा है.
64 साल के हरिवंश ने बैंक में भी नौकरी की. दक्षिण भारत के एक ख़ूबसूरत शहर में बैंक अधिकारी की वह नौकरी उन्हें नहीं भाई और वे पत्रकारिता में वापस आ गए.
उन्होंने अपने ज़माने के मशहूर संपादक धर्मवीर भारती के साथ 'धर्मयुग' में काम किया. तब वे बंबई (अब मुंबई) शिफ़्ट हो गए. पत्रकारिता का वह उनका पहला बड़ा असाइनमेंट था. उन्होंने मन से पत्रकारिता की. अपनी पहचान बनाई. बाद के सालों में वे कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए.
उन्हें फिर से बड़ा मौक़ा मिला और उन्होंने चर्चित पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह के संपादन में निकलने वाली हिन्दी पत्रिका 'रविवार' के लिए काम करना शुरू कर दिया. वे इस पत्रिका के सहायक संपादक भी रहे. इस दौरान उनके लिखे कई लेख और उनकी रिपोर्टें भी काफ़ी चर्चित रही.

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ऐसी ही एक रिपोर्ट थी - 'जेपी का गाँव मेरा गाँव'
वे सिताब दियारा के रहने वाले हैं. उस रिपोर्ट में उन्होंने उन्हीं बातों का ज़िक्र किया. अपने गाँव और जयप्रकाश नारायण के बारे में लिखा. तब युवा तुर्क के नाम से चर्चित और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर की भी जेपी के प्रति अगाध श्रद्धा थी.
सिताब दियारा का कुछ इलाक़ा बिहार के सारण ज़िले का हिस्सा था, तो कुछ उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले का. चंद्रशेखर भी बलिया ज़िले के इब्राहिमपट्टी गाँव के रहने वाले थे. ये सब संयोग जुड़ते चले गए. हरिवंश और चंद्रशेखर इन इत्तेफ़ाकों के कारण एक-दूसरे के नज़दीक होते गए. बाद के दिनों में रविवार पत्रिका बंद हो गई.
हरिवंश जी अपने कुछ साथियों के साथ कलकत्ता से राँची आ गए. साल 1989 में उन्होंने राँची में प्रभात ख़बर अख़बार का संपादन संभाला. यह चुनौतीपूर्ण निर्णय था क्योंकि प्रभात ख़बर तब बमुश्किल 400 प्रतियों की बिक्री क्षमता वाला अख़बार था. उसका मालिकाना कांग्रेस के नेता रहे ज्ञानरंजन से उषा मार्टिन को ट्रांसफ़र हुआ.

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हरिवंश जी ने अपनी मेहनत और प्रबंधकीय क्षमता से इस मृतप्राय अख़बार को दक्षिण बिहार (अब झारखंड) का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अख़बार बना दिया. इसी बीच एक वक़्त ऐसा आया, जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के पतन के बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली. वे प्रधानमंत्री बन गए.
तब उन्हें एक प्रेस सलाहकार की ज़रूरत थी. हरिवंश तलब किए गए. प्रभात खबर के प्रबंधन ने हरिवंश को वह पद संभालने के लिए विशेष छुट्टी दी. वे दिल्ली चले गए और प्रधानमंत्री कार्यालय में अतिरिक्त सूचना सलाहकार नियुक्त कर दिए गए. बाद के दिनों में चंद्रशेखर राँची आकर प्रभात ख़बर के दफ़्तर भी गए.
उस अख़बार के कार्यालय में किसी प्रधानमंत्री के आने की वह पहली और अब तक के हिसाब से आख़िरी घटना है. चंद्रशेखर की सरकार के पतन के बाद हरिवंश फिर से राँची आ गए और प्रभात ख़बर की संपादकी संभाल ली.
स्पष्ट है कि पत्रकारों की आचार संहिता बनाने वाले हरिवंश को लाभ का पहला पद (अतिरिक्त सूचना सलाहकार, प्रधानमंत्री कार्यालय) भी संपादक रहते हुए मिला था. राज्यसभा पहुँचने की कहानी भी सर्वविदित है कि उन्होंने नीतीश कुमार का प्रस्ताव संपादक रहते हुए स्वीकार किया था.
फिर अलग क्यों हैं हरिवंश

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उनके इकलौते बेटे की शादी थी. उन्होंने प्रभात ख़बर के कर्मियों को चिट्ठी लिखी. लिखा कि सब लोग उनके परिवार का हिस्सा हैं. लेकिन सिर्फ़ इस रिसेप्शन के लिए राँची न आएँ. अगर किसी वजह से राँची मे हैं और शादी में शामिल होना चाहते हों, तो कृपया कोई उपहार लेकर न आएँ.
नतीजतन, हमलोग उस रिसेप्शन में ख़ाली हाथ गए. मंच पर उनकी बहू-बेटे द्वारा अभिवादन किए जाने समय हमारे पास कोई गिफ़्ट नहीं था. थोड़ा ख़राब लगा. ख़ाली हाथ गए, खाए और वापस आ गए. उनकी इस चिट्ठी की चर्चा काफ़ी समय तक हुई. हालाँकि, उसी शादी में कई राजनेता, सिविल सर्वेंट और व्यापारी भी शामिल हुए थे.
साल 2006-07 के दौरान एक वक्त प्रभात खब़र अख़बार के बिकने की स्थिति बन गई. तब संपादकीय के वरिष्ठतम लोगों की बैठक (जिसमें मैं भी मौजूद था) में हरिवंश जी ने बताया कि उन्होंने पहली बार फ़्रिज ख़रीदने के लिए कैसे अपनी सेलरी स्लिप गिरवी रखी और किस्तों पर फ़्रिज ख़रीदी.
हरिवंश ने संपादक रहते हुए भी किसी से अपनी फ़ाइलें तक नहीं उठवाईं और किसी का एक पैसा बकाया नहीं रखा. ऐसे कई उदाहरण हैं, जब उन्होंने लोगों को पैसों की मदद की और उनसे वापस भी नहीं लिया. बहुत सालों तक उनके घर में कोई नौकरानी भी काम नहीं करती थी. उनका जीवन हमेशा सादगीपूर्ण रहा.
पहली बार राज्यसभा के उपसभापति बनने के बाद वे राँची लिटररी फ़ेस्टिवल में महात्मा गांधी पर बोलने आए. बग़ैर किसी तामझाम के. सादे कपड़ों में बिना बॉडीगार्ड के.
उनकी ये बातें आकर्षित करती रही हैं. राँची के आड्रे हाउस में उस फ़ेस्टिवल में अपने वक्तव्य के दौरान हरिवंश जी ने कहा कि एनरॉन जैसी कंपनी इसलिए दिवालिया हो गई, क्योंकि उनके कर्मचारियों के पास मोरल वैल्यूज़ (नैतिक आदर्श) नहीं थे.
इसलिए गांधी और उनके विचार ज़रूरी हैं. अब बात 20 सितंबर की. राज्यसभा में उनकी भूमिका को लोग नैतिकता के पैमाने पर सही नहीं ठहरा रहे. संभव है हरिवंश भी इससे चिंतित होंगे.
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