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संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में सीखने के लिए मातहत रहना ज़रूरी है?
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भोपाल के प्रतिष्ठित ध्रुपद संस्थान से जुड़े प्रसिद्ध ध्रुपद संगीतकार रमाकान्त और अखिलेश गुंदेजा पर हाल ही में लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों ने गुरु शिष्य परंपरा पर एक नई बहस को जन्म दिया है.
ध्रुपद संस्थान के वर्तमान और पूर्व छात्रों की ओर से, दो सितंबर को पहली बार सार्वजनिक तौर पर लगाए गए इन आरोपों की जाँच फ़िलहाल संस्थान द्वारा गठित एक इंटर्नल कम्प्लेंट कमेटी द्वारा की जा रही है. अपने आरोपों में कम से कम दस शिकायतकर्ता छात्राओं ने गुंदेजा बंधुओं पर अलग-अलग समय में यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया हैं, गुंदेजा परिवार ने सभी आरोपों का सिरे से खंडन किया है.
लेकिन इस घटना के बाद शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत में सदियों से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा के औचित्य पर संगीत की दुनिया में ही भीतर से सवाल उठने लगे हैं.
संगीत के आगे 'शास्त्रीय' शब्द
भोपाल स्थित ध्रुपद संस्थान में लम्बे समय तक ध्रुपद सीख चुके एक छात्र नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि शास्त्रीय संगीत में गुरुओं की ईश्वरीय छवि उन्हें शिष्यों के ऊपर ताक़त प्रदान करती हैं.
"शास्त्रीय शब्द जुड़ जाने की वजह से शिक्षा लेने वाले के दिमाग़ में संगीत को लेकर एक धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था का भाव आ जाता है. इसलिए अपने आप ही संगीत शिक्षक 'गुरु' के स्तर पर उठ जाता है. और गुरु-शिष्य परंपरा में पहली चीज़ जो हमें बताई जाती है वह गुरु के प्रति पूरी तरह समर्पण. आप गुरु से सवाल नहीं कर सकते, सिर्फ़ उनकी बातों को मानना होता है."
लेकिन ध्रुपद के प्रतिष्ठित संगीतकार उदय भवलकर गुरु-शिष्य परंपरा को दोषमुक्त बताते हुए कहते हैं कि इस संस्कार के शीर्ष पर बैठे लोगों द्वारा अपनी जगह का दुरुपयोग किए जाने की वजह से पूरी परंपरा पर सवाल उठाना ग़लत है.
बीबीसी से बातचीत में वह जोड़ते हैं, "पीड़िताओं को न्याय मिलना ही चाहिए. लेकिन कुछ लोगों द्वारा शक्ति के दुरुपयोग की वजह से गुरु-शिष्य परंपरा पर सवाल उठाना ग़लत है. मैं ख़ुद इस संस्कार से आया हूँ और इसी में सिखाता हूँ. यह परंपरा संगीत सीखने के परे जाती एक ऐसी दृष्टि है जो कला को जीवन जीने के तरीक़े में तब्दील करने की शिक्षा देती है."
डागर घराने से आने वाले ध्रुपद संगीतकार वासिफ़ुद्दीन डागर भी गुरु शिष्य परंपरा का बचाव करते हुए कहते हैं कि इसमें सिर्फ़ बुराइयां ही नहीं हैं.
"डागर घराने में सभी शिष्यों को हमेशा सुरक्षा और सम्मान भी मिला है. जो बातें भोपाल के ध्रुपद संस्थान के बारे में सामने आ रही हैं वह दुखद हैं और मैं दुआ करता हूँ कि इस मामले में न्याय हो. लेकिन इसकी वजह से यह नहीं माना जाना चाहिए कि गुरु शिष्य परंपरा में सब कुछ बुरा और नकारात्मक ही है."
क्यों चुप रह जाते हैं छात्र
लेकिन छात्रों का मानना है कि ध्रुपद जैसी विधाओं में गुरु के हाथों में नए सीखने वालों को सिखाने के साथ साथ संगीत में उनके भविष्य को प्रभावित करने की भी ताक़त होती है.
दो साल से ध्रुपद सीख रहे एक छात्र ने बताया,"जो बात छात्रों को चुप रहने या किसी तरह के अन्याय के ख़िलाफ़ खुल कर आवाज़ उठाने से रोकती है वह है गुरुओं के हाथ में मौजूद ताक़त. उदाहरण के लिए ध्रुपद जैसी विधा में सवाई गंधर्व, डोवर लेन, शंकरलाल, हरिवल्लभ और सप्तक जैसे गिनती के राष्ट्रीय स्तर के प्रस्तुति समारोह या फ़ेस्टिवल होते हैं. सभी की इच्छा होती है कि इन कार्यक्रमों में प्रस्तुति देने का मौक़ा मिले. और यह सब आपके गुरु के हाथों में होता है. अगर उन्होंने सिर्फ़ फ़ोन उठाकर चार जगह कह दिया कि फ़लां गायक ठीक नहीं है तो कोई भी आपको कभी गाने का मौक़ा नहीं देगा. इसलिए भी छात्र गुरु के ख़िलाफ़ बोलने से डरते हैं."
शक्ति का असंतुलन
शक्ति के इसी स्वरूप पर सवाल उठाते हुए कर्नाटक के संगीतकर और लेखक टी एम कृष्णा कहते हैं, "समर्पण के नाम पर गुरु शिष्य परंपरा को लेकर एक सांस्कृतिक भावना हमारे दिमाग़ों में बैठा दी गयी है. लेकिन थोड़ा गहरे में जाकर सोचें तो हम पाएँगे कि कुछ हिस्से तो हर सम्बंध के अच्छे होते हैं. यहां जो सवाल हम उठा रहे हैं वह यह है कि क्या गुरु-शिष्या परम्परा के ढाँचे के शक्ति समीकरण में कोई संरचनात्मक समस्या है?"
"मुझे लगता है कि इस सिस्टम में एक मूलभूत संरचनात्मक समस्या है कि सीखने के लिए आपको किसी के मातहत रहना होगा. अब यह ज़रूरी नहीं कि किसी के मातहत रहने की वजह से आपके साथ कुछ बुरा हो जाए लेकिन सीखने के लिए मातहत रहना ज़रूरी है, यह एक संरचनात्मक समस्या है. और कहीं-कहीं गुरु शिष्य परम्परा के वर्तमान स्वरूप में हम यही बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इस संरचनात्मक समस्या के महिमामंडन से ही आप सीख सकते हैं."
सीना-ब-सीना सीखने का ज़माना
डागर घराने से आने वाले ध्रुपद के एक अन्य वरिष्ठ संगीतकार बहाउद्दीन डागर कहते हैं कि गुरु-शिष्य परम्परा में समस्या तब आती है जब गुरु किसी शिष्य पर नियंत्रण करने की कोशिश करे.
बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "यह बहुत अच्छी बात है कि कुछ छात्रों ने इस मामले में अपनी आवाज़ उठाई है. हम उनके साथ हैं. हमें यह समझना चाहिए कि महिलाओं के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदला नहीं है इसलिए किसी के लिए भी इस तरह आकर आवाज़ उठाना आसान नहीं है. लेकिन गुरु शिष्य परम्परा में यह समस्या तब शुरू होती है जब आप अपने गुरु पर सवाल नहीं उठा सकते. हमने भी इसी संस्कार में संगीत सीखा लेकिन हमारी अपने गुरुओं के साथ एकदम सीना-ब-सीना ट्रेनिंग हुई. हम संगीत की बारीकियों को छोड़कर हर बात पर उनसे सवाल जवाब कर सकते थे और ख़ूब करते भी थे".
बहाउद्दीन डागर की ही बात को आगे बढ़ाते हुए टी एम कृष्णा जोड़ते हैं कि यदि किसी परम्परा में हम गुरु को चुनौती नहीं दे सकते तो उस परम्परा में मूलभूत रूप से कुछ समस्या है. "हमें इस पूरी परम्परा के ख़ूबसूरत हिस्सों को अपने पास रखना चाहिए लेकिन उसके लिए पहले इस पूरे सेप्स की परिकल्पना को दोबारा गढ़ना ज़रूरी है. यहां सवाल सिर्फ़ यौन उत्पीड़न का ही नहीं है...बल्कि सिखाने के बदले शिष्यों से किसी भी तरह की अपेक्षा न रखने का भी है."
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