चीन की अर्थव्यवस्था कोरोना संकट से उबरी, भारत क्यों रह गया पीछे

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- Author, अपूर्व कृष्ण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
2008 में 21वीं सदी का पहला आर्थिक संकट आया था, अमरीका में घर ख़रीदने के लिए सस्ते कर्ज़ या मॉर्टगेज देकर बैंक और वित्तीय संस्थान फँस गए.
संकट अपने चरम पर पहुँचा 15 सितंबर 2008 को, जब एक बड़ा अमरीकी बैंक लीमैन ब्रदर्स दिवालिया हो गया, फिर दुनिया की आर्थिक सेहत का प्रतीक समझे जानेवाला अमरीकी शेयर सूचकांक डाउ जोंस ने साढ़े चार फ़ीसदी का गोता लगाया, और वहाँ से उपजी लहर ने देखते-देखते सारी दुनिया के बाज़ारों में उथल-पुथल ला दी. सारी दुनिया वैश्विक मंदी की चपेट में आ गई.
लेकिन जैसे हर आपदा में एक अवसर की भी संभावना होती है, 2008 की मंदी भी एशिया के दो देशों के लिए एक अवसर साबित हुई, भारत और चीन की आर्थिक तरक्की की कहानी पहले से ही चर्चा में थी, मंदी ने उस कहानी पर विश्वसनीयता की मुहर लगा दी.
सारी दुनिया में भारत और चीन का नाम गूँज उठा, कहा जाने लगा कि दुनिया को अगर आर्थिक मंदी के दौर से कोई निकाल सकता है तो उनमें सबसे आगे चीन और भारत होंगे.
और उसकी वजह भी थी. मंदी के अगले साल, यानी 2009 में दुनिया की कुल जीडीपी में 75 फ़ीसदी से ज़्यादा का योगदान करने वाले 19 देशों में से केवल पाँच देशों की जीडीपी बढ़ी. उनमें सबसे ऊपर था चीन, दूसरे नंबर पर था भारत.
इस संकट ने दुनिया के आर्थिक क्लब में देशों की हैसियत को भी सदा के लिए बदल दिया. 2009 में जापान को पीछे छोड़ चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताक़त बन गया जहाँ वो अब भी डटा हुआ है, बल्कि वो अब अमरीका से होड़ लगाए हुए है.
वहीं भारत भी 2009 में रूस को पीछे छोड़ दुनिया की 10वें नंबर की अर्थव्यवस्था बन गया, और इसके बाद दसेक सालों के भीतर इटली, ब्राज़ील, फ़्रांस और ब्रिटेन जैसे दिग्गजों को छोड़ देखते-देखते दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया.
साल 2020 में दुनिया एक बार फिर आर्थिक मंदी में घिरी है, और इस बार संकट इंसान नहीं, कुदरत लेकर आई है.
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पर इस बार चीन की चर्चा तो हो रही है, भारत ख़बरों में नहीं है.
चीन ने सोमवार को ही अपनी विकास दर के ताज़ा आँकड़े जारी किए, चीन की अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही (जुलाई-सितंबर) में लगभग 5% की दर से बड़ी हुई.
वहीं भारत की अर्थव्यवस्था में विकास का अब तक का आँकड़ा इसके बिल्कुल उलट है, भारत की अर्थव्यवस्था में अप्रैल से जून के बीच लगभग 24% की नेगेटिव ग्रोथ हुई, यानी भारत की अर्थव्यवस्था इन महीनों में पिछले साल के मुक़ाबले लगभग एक चौथाई छोटी हो गई.
तो ऐसा क्या है जो चीन में भारत से अलग हो रहा है? क्यों इस बार दुनिया को मंदी से उबारने में एक बार फिर चीन का नाम लिया जा रहा है, मगर भारत का नहीं?

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चीन कैसे उबर गया
कोरोना महामारी से बाक़ी दुनिया की तरह शुरू में चीन का आर्थिक पहिया भी थम गया था, इस साल के पहले तीन महीनों में चीन की अर्थव्यवस्था लगभग सात प्रतिशत छोटी हो गई, ऐसा 1992 के बाद पहली बार हुआ जब उसने तिमाही नतीजों को रिकॉर्ड करना शुरू किया.
लेकिन उसके बाद की दोनों तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था में विकास हुआ. दूसरी तिमाही में 3% से ज़्यादा, और अब तीसरी तिमाही में लगभग 5%.
दरअसल, चीन सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था में जान डालने और रोज़गार में मदद के लिए कई आर्थिक उपाय किए.
हॉन्ग कॉन्ग में आईएनजी बैंक के चीफ़ चाइना इकोनॉमिस्ट आइरिस पैंग ने चीन के आँकड़ों पर संतोष जताते हुए समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "चीन में लगातार नई नौकरियाँ आ रही हैं जिससे खपत बढ़ रही है."
वहीं टोक्यो स्थित डाइची लाइफ़ रिसर्च इंस्टीच्यूट के चीफ़ इकोनॉमिस्ट योशिकियो शिमामिने ने रॉयटर्स से कहा, "चीन की अर्थव्यवस्था सुधार के रास्ते पर है, निर्यात बढ़ रहा है, हालाँकि अभी हम ये नहीं कह सकते कि वो कोरोना संकट के कारण आई सुस्ती से पूरी तरह उबर चुका है."
तो ऐसा क्यों है कि चीन में सुधार दिखाई दे रहा है और भारत में नहीं?
अर्थशास्त्री और दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर रीजनल ट्रेड के प्रमुख प्रोफ़ेसर राम उपेन्द्र दास कहते हैं कि इसे समझने के लिए टाइमलाइन पर ध्यान देना होगा.
प्रोफ़ेसर दास ने कहा, "उनके यहाँ समस्या पहले शुरू हुई तो समाधान भी पहले आ गया और उस समाधान का असर भी पहले दिखने लगा, भारत में समस्या देर से आई तो समाधान भी देर से आया और उसका असर भी देर से दिखेगा."

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यानी चीन ने जो भी उपाय किए उनका असर अब दिखाई दे रहा है. जानकार बताते हैं कि भारत में भी सरकार ने जो उपाय किए हैं और अक्तूबर-नवंबर-दिसंबर में जो खर्च होंगे, उसके आँकड़े अगले साल आएँगे और उसी समय सही तस्वीर साफ़ होगी.
वैसे चीन और भारत की आर्थिक तरक्की का जो रथ पिछले डेढ़ दो दशक में लगातार आगे बढ़ता जा रहा था उसकी रफ़्तार थोड़ी धीमी पहले से होती जा रही थी.
2016 में अमरीका की सत्ता पर डोनाल्ड ट्रंप के काबिज़ होने के बाद से ही चीन और अमरीका के बीच व्यापार युद्ध छिड़ा हुआ है और चीन को उसका भारी नुक़सान हुआ, इतना कि पिछले तीन-चार साल में विकास दर के मामले में चीन भारत से पिछड़ता गया.
अर्थशास्त्री आकाश जिंदल चीन की अर्थव्यवस्था के अभी बेहतर दिखाई देने को एक अस्थायी ट्रेंड मानते हैं.
आकाश जिंदल कहते हैं,"पिछले कुछ सालों से जो समीकरण दिख रहा था उसे कहीं ना कहीं कोरोना ने बदला है, मगर ये ट्रेंड ज़्यादा समय तक नहीं रहेगा, हमारा अनुमान है कि अगले साल 2021 तक भारत की अर्थव्यवस्था फिर ज़्यादा तरक्की करनी शुरू कर देगी."
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स्लोडाउन और कोरोना संकट
लेकिन जैसे चीन का विकास रथ अमरीका के साथ ट्रेड वॉर की वजह से अटकता जा रहा था, वैसी ही स्थिति तो पिछले साल भारत की भी थी जब आर्थिक सेहत को लेकर मोदी सरकार से सवाल पूछे जाने लगे थे.
तब सरकार अर्थशास्त्र की परिभाषाओं के सहारे शंकाओं को शांत करने की कोशिश कर रही थी, वो इस बात पर ज़ोर दे रही थी कि देश में मंदी नहीं है बल्कि ये स्लोडाउन है.
प्रोफ़ेसर दास कहते हैं कि सरकार ने उस दिशा में कोरोना महामारी के दौरान ही कुछ क़दम उठाए हैं जिनका असर आगे दिखाई देगा.
उन्होंने कहा, "सरकार ने इस समस्या के दौरान ही कृषि बिल, श्रम क़ानून जैसे कुछ बड़े महत्वपूर्ण ढाँचागत सुधार किए हैं जिनकी माँग काफ़ी पहले से ही हो रही थी, मगर चूँकि भारत एक संसदीय लोकतंत्र वाला देश है, इसलिए कई बार सुधार उस गति से लागू नहीं हो पाते."
भविष्य किसका सुनहरा - भारत या चीन?
भारत और चीन दोनों ही कोरोना महामारी से पहले ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे थे, ऐसे में आगे जाकर किसकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं और किसका रास्ता आसान हो सकता है.
आकाश जिंदल को लगता है चीन के मुक़ाबले भारत बेहतर स्थिति में है क्योंकि एक ओर चीन अभी भी व्यापार युद्ध में उलझा ही है और दूसरी बात ये कि चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात पर ज़्यादा निर्भर है, जबकि भारत अपने आप में एक बड़ा बाज़ार है.
वो कहते हैं, "कोरोना को लेकर चीन के ऊपर ट्रंप से लेकर और भी कई देशों ने सवाल खड़े किए हैं, इसका असर ये होगा कि आने वाले समय में चीन का निर्यात कम हो जाएगा, और ना ही वहाँ उस तरह से विदेशी निवेश आएगा, बल्कि उसके अब भारत में आने की काफ़ी संभावना है."
आकाश बताते हैं कि भारत में अभी कार और दोपहिया वाहनों का उत्पादन पिछले दो साल में सबसे चरम स्तर पर है, यानी उनकी माँग भी बढ़ रही है और खपत भी.

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लेकिन कोरोना महामारी के दौरान जब नौकरियों का संकट है तो बिना पैसे के ख़रीदारी कैसे होगी?
आकाश इसके जवाब में कहते हैं कि अब बाज़ार भी बदल रहे हैं और ग्राहकों की आदतें भी.
वो कहते हैं, "आज खपत और माँग केवल सैलरी से प्रभावित नहीं होती, आसान कर्ज़ पर भी निर्भर रहती है. आसान कर्ज़ माँग को बढ़ाता है."
यानी बाज़ार का अपना अलग मनोविज्ञान है, और ऐसा ही कुछ अर्थव्यवस्था के साथ भी है.
चीन-अमरीका ट्रेड वॉर और असलियत
अमरीका-चीन के बीच ट्रेड वॉर की बात ज़रूर हो रही है, मगर आँकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं.
दरअसल अमरीका और चीन के व्यापार युद्ध की बुनियाद है दोनों देशों के बीच व्यापार का असंतुलन, यानी आयात और निर्यात के अनुपात का अंतर.

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अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इसी को संतुलित करने के इरादे से चीन के सामानों पर कई तरह के टैक्स लगाने शुरू कर दिए, चीन ने भी बदले में अमरीकी उत्पादों के ख़िलाफ़ वैसे ही क़दम उठाए.
लेकिन इस साल अगस्त में अमरीका और चीन के बीच व्यापार के जो आँकड़े आए हैं उससे पता चलता है कि अमरीका और चीन के बीच व्यापार असंतुलन और बढ़ गया है, बल्कि पिछले 14 साल में सबसे ज़्यादा हो गया है.
यानी ट्रंप की इच्छा और कोशिशों के बावजूद अमरीका के लोग चीन का सामान ख़रीद रहे हैं, बल्कि टैक्स देकर भी ख़रीद रहे हैं.
वैसे ही अमरीका भी चीन को सोयाबीन जैसे सामान बेच रहा है, और चीन भी ना-नुकुर किए बिना उन्हें ख़रीद रहा है.
प्रोफ़ेसर राम उपेंद्र दास कहते हैं कि इस घटना से एक संदेश मिलता है कि सारे मुद्दों, सारे मसलों, सारे संघर्षों के बावजूद अर्थव्यवस्था अपने हिसाब से चलती है.
ऐसे में भारत की आत्मनिर्भरता की कोशिश का क्या होगा, क्योंकि भारत की कोशिश यही है कि वो अपना सामान ख़ुद बनाए, दूसरे पर निर्भर ना रहे, यानी दूसरे से सामान ना ख़रीदे.
प्रोफ़ेसर राम उपेंद्र दास कहते हैं,"आत्मनिर्भरता और दूसरे पर परस्पर निर्भरता में कोई टकराव नहीं है. आर्थिक व्यापार अपनी जगह चल रहे हैं, उसे और मज़बूत करना चाहिए, जिससे कि रोज़गार बढ़े, विदेशी निवेश आए. जो चल रहा है, उसे बाधित ना करें, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, सबको फ़ायदा होगा."
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