मोदी सरकार और ममता बनर्जी के बीच बढ़ती तकरार, नड्डा के काफ़िले पर हमले का मामला

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीति तो गरमा ही चुकी है, पर अब बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफ़िले पर हुए हमले के बाद केंद्र और राज्य सरकार के बीच संवैधानिक और प्रशासनिक संकट पैदा होने के भी आसार बढ़ गए हैं.

नड्डा के काफ़िले पर हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उन तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को अचानक डेपुटेशन पर दिल्ली आने का निर्देश दिया है जिनके नेतृत्व में दक्षिण 24-परगना ज़िले में नड्डा की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी. लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन तीनों अधिकारियों को रिलीज़ करने से इनक़ार कर दिया है.

तृणमूल कांग्रेस सांसद और एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह सचिव को एक कड़ा पत्र भेज कर इसे बदले की भावना से की गई कर्रवाई करार दिया है.

दूसरी ओर, इस बढ़ती तनातनी के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 19 दिसंबर को दो-दिवसीय दौरे पर कोलकाता पहुंचना है. इससे टकराव और तेज़ होने का अंदेशा है.

क्या है पूरा मामला

बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा पार्टी के एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बीते गुरुवार को दक्षिण 24-परगना जिले के डायमंड हार्बर की ओर जा रहे थे. उसी समय तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनके काफ़िले पर पथराव किया. उसके बाद राजनीति और विवाद अचानक तूल पकड़ने लगा है.

उसके अगले दिन ही केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में राज्य के मुख्य सचिव आलापन बनर्जी और पुलिस महानिदेशक वीरेंद्र को समन भेज कर 14 दिसंबर को दिल्ली हाज़िर होने का निर्देश दिया. लेकिन राज्य सरकार ने इन दोनों अधिकारियों को दिल्ली भेजने से इनक़ार कर दिया.

उसके एक दिन बाद गृह मंत्रालय ने इलाक़े के तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को अचानक डेपुटेशन पर दिल्ली पहुंचने का निर्देश जारी कर दिया. लेकिन राज्य सरकार इन तीनों को रिलीज नहीं करने पर अड़ी है. उसकी दलील है कि राज्य में पहले से ही आईपीएस अफ़सरों की भारी कमी है. ऐसे में तीन अधिकारियों को केंद्रीय डेपुटेशन पर भेजना संभव नहीं होगा.

एक शीर्ष सरकारी अधिकारी कहते हैं, "हमने केंद्रीय गृह मंत्रालय को बता दिया है कि तीनों अफ़सरों को दिल्ली भेजना संभव नहीं है."

केंद्र सरकार ने जिन तीन आईपीएस अफ़सरों को दिल्ली बुलाया है उनमें डायमंड हार्बर के एसपी भोलानाथ पांडे (2011 बैच) के अलावा प्रेसीडेंसी रेंज के डीआईजी प्रवीण कुमार त्रिपाठी (2004 बैच) और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (दक्षिण बंगाल) राजीव मिश्र (1996 बैच) शामिल हैं.

कुछ साल पहले पूर्व मेदिनीपुर के समुद्र तटीय शहर दीघा में पुलिस की वर्दी में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पैर छूने की वजह से राजीव मिश्र विवादों में आए थे.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद और प्रवक्ता सौगत राय कहते हैं, "केंद्र सरकार डेपुटेशन पर भेजने के लिए अफ़सरों के नाम मांग सकती है. लेकिन उनको भेजने या नहीं भेजने का फैसला राज्य सरकार के हाथों में है. यह साफ़ है कि केंद्र ने बदले की भावना से ऐसा निर्देश दिया है."

पार्टी के सांसद और लोकसभा में मुख्य सचेतक एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने इस मुद्दे पर केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को एक पत्र भेजा है.

बनर्जी कहते हैं, "केंद्र परोक्ष रूप से आपातकाल लागू करने और आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है."

उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा वाले व्यक्ति के काफ़िले के आगे-पीछे पुलिस की पायलट कार और टेल कार होती है. काफ़िले में शामिल होने वाले दूसरे वाहनों को स्थानीय पुलिस से अनुमति लेनी पड़ती है. लेकिन इस मामले में न तो कोई अनुमति ली गई थी और न ही कोई सूचना दी गई थी. नड्डा के काफ़िले में 50 मोटरसाइकिलें और इतनी ही कारें शामिल थीं.

दूसरी ओर, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा है, "कल्याण बनर्जी को इस मुद्दे पर केंद्र को पत्र लिखने का कोई अधिकार नहीं है. वे कोई मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव नहीं हैं."

आगे की राह

लेकिन क्या राज्य सरकार इन अफ़सरों को डेपुटेशन पर भेजने से इंकार कर सकती है?

जानकारों की राय में राज्य सरकार के समक्ष केंद्र के फ़ैसले को मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इंडियन पुलिस सर्विस (काडर) रूल्स, 1954 के मुताबिक़, किसी मुद्दे पर केंद्र के साथ असहमति की स्थिति में राज्य सरकार के लिए उसके फ़ैसले को स्वीकार करना अनिवार्य है.

बंगाल काडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी पी. रवि कहते हैं, "तमाम मतभेदों और विवादों के बावजूद अगर केंद्र सरकार केंद्रीय सेवा के किसी अफ़सर को डेपुटेशन पर भेजने या बुलाने का फैसला करती है तो राज्य सरकार के सामने उसे रिलीज़ करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है."

एक अन्य पूर्व पुलिस अधिकारी सोमेन दास कहते हैं, "मौजूदा नियमों के तहत ऐसे मामलो में केंद्र सरकार का फ़ैसला ही अंतिम होता है. राज्य सरकार कुछ दिनों तक टाल-मटोल भले करे, उसे केंद्र का निर्देश मानते हुए इन अफ़सरो को रिलीज़ करना ही होगा."

वैसे, केंद्र और राज्य सरकार के बीच आईपीएस अफ़सरों के मुद्दे पर टकराव का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले कोलकाता पुलिस के तत्कालीन आयुक्त राजीव कुमार को सीबीआई के समन भेजने के मुद्दे पर भी केंद्र और राज्य सरकार आमने-सामने आ गए थे.

ममता बनर्जी तो तब इसके विरोध में धरने पर भी बैठी थीं. हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की वजह से सीबीआई राजीव कुमार को गिरफ़्तार नहीं कर सकी थी.

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "बंगाल में चुनाव सिर पर हैं. यहां आईपीएस अफ़सरों की तादाद पहले ही ज़रूरत से कम है. राज्य सरकार यह कारण दिखाते हुए इन तीनों अफ़सरों को दिल्ली भेजने से इनकार कर सकती है."

एक सरकारी अधिकारी बताते हैं, "डेपुटेशन के लिए राज्य सरकार पहले केंद्र को अफ़सरों की एक सूची भेजती है जिसे ऑफ़र लिस्ट कहा जाता है. उसके बाद केंद्र तय करता है कि किस अफ़सर को डेपुटेशन पर भेजा जाएगा और किसे नहीं. फिलहाल बंगाल काडर के क़रीब एक दर्जन अधिकारी केंद्रीय डेपुटेशन पर हैं. अब जिन तीन अधिकारियों को डेपुटेशन पर जाने को कहा गया है उनके नाम राज्य सरकार की ओर से भेजे गए ऑफ़र लिस्ट में नहीं थे."

तृणणूल सांसद सौगत राय कहते हैं, "यह अधिकारी संविधान की धारा 312 के तहत काम करते हैं. केंद्र सरकार डेपुटेशन के लिए नाम तो मंगा सकती है. लेकिन उनको भेजना है नहीं, यह फ़ैसला राज्य सरकार ही करेगी."

कलकत्ता हाईकोर्ट के एडवोकेट धीरेन कुमार दास कहते हैं, "केंद्र और राज्य सरकार के बीच डेपुटेशन के मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाने की स्थिति में केंद्र का फ़ैसला बाध्यतामूलक होता है. तमिलनाडु सरकार और केंद्र के बीच ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार के अड़ियल रवैए को देखते हुए इस विवाद के भी अदालत तक पहुंचने के आसार हैं."

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