अमेरिका ने दिया झटका, भारत बोला यूएस का रुख़ समझ से परे

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अमेरिका ने भारत को 'करेंसी मैनिपुलेटर्स' (मुद्रा से छेड़छाड़ करने वाले) की निगरानी सूची में डाल दिया है.
इस पर भारत सरकार ने मंगलवार को प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इसका कोई तर्क समझ में नहीं आता है.
भारत के वाणिज्य सचिव अनूप वधावन ने संवाददाताओं से कहा, "मैं इसका कोई आर्थिक तर्क नहीं समझ पाया हूँ."
उन्होंने कहा कि केंद्रीय रिज़र्व बैंक मार्केट फ़ोर्सेज़ के अनुरूप ही मुद्रा का संग्रह करता है.

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10 देशों को निगरानी सूची में डाला
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, पिछले सप्ताह अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने भारत, सिंगापुर, थाईलैंड और मेक्सिको समेत 10 अर्थव्यवस्थाओं को 'निगरानी सूची' में डाल दिया था.
इसमें कहा गया था कि इन देशों के मुद्रा संग्रहण और अन्य तरीक़ों पर क़रीबी नज़र बनाए रखने की ज़रूरत है.
वाणिज्य सचिव ने बताया कि भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष (किसी राष्ट्र का निर्यात जब उसके आयात से आगे निकल जाता है) 2020-21 में तक़रीबन पाँच अरब डॉलर तक बढ़ गया था.
अमेरिकी रिपोर्ट का कहना है कि अमेरिका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार अधिशेष 2020 में वस्तुओं के मामले में 24 अरब डॉलर था, इसमें सेवाओं का वित्तीय अधिशेष 8 अरब डॉलर था.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय प्राधिकरण को चाहिए कि वह अव्यवस्थित बाज़ार की स्थिति और अधिक रिज़र्व को जमा किए बिना विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप को सीमित करे.
कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अमेरिका का भारत को लेकर उठाया गया नया क़दम केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा बाज़ार में आक्रामक हस्तक्षेप करने से रोकेगा.
अमेरिका ने भारत को दूसरी बार इस सूची में डाला है. भारत को पहले इस सूची से हटा दिया गया था.
'करेंसी मैनिपुलेटर्स' का अर्थ

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अमेरिका समय-समय पर विभिन्न देशों को 'करेंसी मैनिपुलेटर्स' की सूची में डालता रहा है और इसमें कई बार चीन का नाम देखा जाता रहा है.
अमेरिका उन देशों को इस सूची में शामिल करता रहा है जो जानबूझकर 'अनुचित मुद्रा व्यवहार' को अपनाते हुए डॉलर के मुक़ाबले अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करते हैं.
यह चलन कोई देश इसलिए अपनाना चाहता है ताकि वह इसके ज़रिए कृत्रिम रूप से अपनी मुद्रा को घटाकर वह दूसरों से अनुचित लाभ ले सके.
मुद्रा के अवमूल्यन से उस देश से निर्यात की लागत कम होगी और परिणामस्वरूप व्यापार घाटे में कृत्रिम रूप से कमी दिखाई देती है.
भारत को शामिल क्यों किया गया?

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अमेरिका विभिन्न पैरामीटर्स पर किसी देश को इस सूची में डालता है. इसमें एक वित्त वर्ष में व्यापार अधिशेष का 'महत्वपूर्ण' तरीक़े से बढ़ना और 12 महीनों के दौरान देश की कुल जीडीपी का दो फ़ीसदी मुद्रा भंडार की ख़रीद करने जैसे पैरामीटर्स शामिल हैं.
केंद्रीय रिज़र्व बैंक द्वारा डॉलर की अधिक ख़रीद और व्यापार अधिशेष बढ़ने के कारण ही भारत को इस निगरानी सूची में डाले जाने का हवाला दिया जा रहा है.
हालिया रिपोर्ट में भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष 20 अरब डॉलर से अधिक हो गया है.
वहीं, केंद्रीय बैंक के आँकड़ों के अनुसार, भारत ने 2019 के आख़िर तक विदेशी मुद्रा ख़रीदने में विशेष रूप से तेज़ी दिखाई थी.
जून 2020 तक चार तिमाहियों में भारत ने 64 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा ख़रीदी थी जो जीडीपी का 2.4 फ़ीसदी था.

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चीन भी इस बार शामिल
अमेरिका अंतरराष्ट्रीय मामलों के राज्य कोष विभाग ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में भारत, ताइवान और थाईलैंड को निगरानी सूची में डाला है और इन्हें अपना बड़ा व्यापारिक साझेदार बताते हुए इनके मुद्रा के तरीक़ों और इनकी मैक्रो इकोनॉमिक नीतियों पर 'क़रीबी नज़र' रखने को कहा है.
वहीं, इस सूची में एक बार फिर चीन का नाम शामिल है. उस पर बार-बार अपनी मुद्रा के अवमूल्यन के आरोप लगते रहे हैं. उसके साथ जापान, कोरिया, जर्मनी, इटली, सिंगापुर, मलेशिया भी इसमें शामिल हैं.
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भारत को पहली बार अक्तूबर 2018 को इस सूची में डाला गया था लेकिन मई 2019 में इस सूची से हटा दिया गया था.
करेंसी मैनिपुलेटर के तौर किसी देश पर तुरंत कोई जुर्माना नहीं लगाया जाता है लेकिन इसके कारण किसी देश की वैश्विक वित्त बाज़ार में साख़ ज़रूर गिरती है.
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