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भारतीय कॉरपोरेट घराने देसी कपड़ों पर लगा रहे बड़े दांव
- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी व्यापार संवाददाता, मुंबई
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
भारत के सबसे बड़े व्यापार घराने घरेलू डिज़ाइनर ब्रांडों को बढ़ाने और उन्हें वैश्विक बाज़ारों में फैलाने के लिए इन ब्रांडों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं.
जानकारों के मुताबिक़, यह प्रवृत्ति लक्ज़री रिटेल मार्केट के परिपक्व होने के मुहाने पर खड़े होने का इशारा कर रही है.
अक्टूबर में, दिग्गज रिलायंस समूह की सहायक कंपनी 'रिलायंस ब्रांड्स लिमिटेड' (आरबीएल) ने सेलिब्रिटी फ़ैशन डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा के नाम वाले लेबल में 40 फ़ीसदी हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की. इसके एक हफ़्ते बाद आरबीएल ने भारत के सबसे पुराने फ़ैशन हाउसों में से एक 'रितु कुमार' में 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी खरीद ली.
पिछले 30 साल से बॉलीवुड के स्टार कलाकारों को अपनी ड्रेस पहना रहे मल्होत्रा ने क़रीब 15 साल पहले अपने लेबल को लॉन्च किया था. फोर्ब्स के अनुसार, इस समय उनकी सालाना आय 3 करोड़ डॉलर की है.
मल्होत्रा ने बताया कि रिलायंस जैसे कॉरपोरेट घराने के साथ साझेदारी करने के फ़ैसले की एक वज़ह आने वाले वक़्त में उनका फ़िल्म निर्देशन में उतरने का निर्णय है. हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की उनकी महत्वाकांक्षा का भी नतीजा है.
मुंबई के सांताक्रूज इलाक़े में अपनी डिजाइन वर्कशॉप में उन्होंने बीबीसी को बताया, "मेरे पास व्यावहारिक ज्ञान है पर मैं फ़ैशन के बिज़नेस को ज़्यादा नहीं जानता. दुनिया में फैलने के लिए मेरे सपनों और ज़िंदगी को इस तरह की मदद की ज़रूरत है. मेरे लेबल को और अधिक व्यवस्थित करने की आवश्यकता है. अभी इसे पूरी तरह परिवार चला रहा है."
कारोबार को संस्थागत करने का चलन
टेक्नोपैक रिटेल कंसल्टेंसी के सीनियर पार्टनर अंकुर बिसेन ने बताया कि यह कदम उचित और अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्तियों से मेल खाने वाला है. उन्होंने ऐसा करने वाले कई फ़ैशन दिग्गज ब्रांडों जैसे- डायर, चैनल, ह्यूगो बॉस, सेंट लॉरेंट (वाईएसएल) का नाम लिया.
उनके अनुसार, इन ब्रांडों ने अपने संस्थापक पर निर्भर रहने के बजाय ख़ुद को आगे बढ़ाकर "संस्थागत" किया. बिसेन बताते हैं कि भारत के कई डिजाइनर अब क़रीब 50—60 साल के हैं.
रिलायंस समूह मल्होत्रा के और फ्लैगशिप स्टोर खोलने ई-कॉमर्स कारोबार को भी फैलाने का इच्छुक है.
अब आरबीएल के फ़ैशन हाउस के मौजूदा पोर्टफ़ोलियो में अरमानी एक्सचेंज, बोट्टेगा वेनेटा, जिमी चू, केट स्पेड न्यूयॉर्क, माइकल कोर्स, टिफ़नी एंड कंपनी जैसे मशहूर वैश्विक ब्रांड शामिल हैं.
लेकिन ऐसा नहीं है कि आरबीएल, घरेलू लेबल में निवेश करने वाली पहली या अकेली कंपनी है. भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनी आदित्य बिड़ला समूह की सहयोगी कंपनी आदित्य बिड़ला फ़ैशन ने भी ऐसा किया है.
आदित्य बिड़ला फ़ैशन ने पिछले कुछ सालों में सब्यसाची, तरुण तहलियानी और शांतनु और निखिल जैसे प्रमुख डिज़ाइनरों के लेबल में हिस्सेदारी खरीदी है. जानकारों का मानना है कि घरेलू डिज़ाइनर ब्रांडों की ओर बड़ी कंपनियों के आने का लंबे समय से इंतज़ार किया जा रहा था.
भारत का बाज़ार दुनिया से अलग
टाटा क्लिक लक्ज़री की प्रधान संपादक नोनीता कालरा का कहना है, "अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भारत के लोगों को आकर्षित नहीं कर पाएंगे. उन्होंने कोशिश भी की. यहां के परिधानों पर भारत की ख़ासियतें हावी रहीं हैं. यदि आपको फ़ैशन बाज़ार में आगे बढ़ना है तो भारत की ख़ासियतों का बहुत ध्यान रखना होगा."
नोनीता कालरा ने बताया कि चूंकि भारत में कपड़ों की ज्यादातर खरीदारी शादी और त्योहारों के चलते होती है. इसलिए घरेलू लेबल के आकर्षण की मुख्य वजह उनका शादी और समाज में प्रचलित फ़ैशन पर ज़ोर देना रहा है.
कालरा कहती हैं कि कॉरपोरेट के साथ साझेदारी करके डिज़ाइनर अपने उत्पाद और बेहतर बना सकते हैं और किफ़ायती लक्ज़री कपड़े बड़े बाजार तक पहुंच सकें.
इस साल की शुरुआत में डिज़ाइनर सब्यसाची ने स्वीडन की फ़ैशन दिग्गज एचएंडएम के साथ साझेदारी करके अपना कलेक्शन लॉन्च किया था. और ऐसा करने वाले वे भारत के पहले डिजाइनर बन गए.
वहीं तेज़ी से उभर रहे फ़ैशन डिजाइनर राहुल मिश्रा ने त्योहारों के इस सीज़न से पहले अपना कलेक्शन लॉन्च किया. इसके लिए उन्होंने देश के लोकप्रिय किफ़ायती लेबल 'डब्ल्यू' के साथ साझेदारी की.
भारत में विकास की असीम संभावना
मैकिन्सी के मुताबिक़, 2022 में भारत का परिधान बाज़ार 60 अरब डॉलर का हो जाएगा. इस तरह उसका बाज़ार ब्रिटेन और जर्मनी के जैसा और दुनिया में छठा सबसे बड़ा बाज़ार बन जाएगा.
अभी भी भारत के परिधान बाज़ार में डिज़ाइनरों के लेबल का काफ़ी कम दख़ल है. दुनिया के बाक़ी देशों की तुलना में इनका आकार अभी भी मामूली है. अंग्रेज़ी दैनिक इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, भारत के टॉप 10 डिज़ाइनरों का सालाना कारोबार केवल 2.5 से 10 करोड़ डॉलर के बीच है.
इस बारे में बिसेन कहती हैं कि इन डिज़ाइनरों में दिलचस्पी "इस चलते नहीं है कि वे आज क्या हैं बल्कि इसलिए है कि कल वे क्या हो सकते हैं.''
वो बताती हैं कि लेबल डेवलपमेंट और डिज़ाइन टैलेंट तैयार करने के साथ ब्रांड रिकॉल बनाने में बहुत खर्च और समय लगता है. इसलिए ऐसे लेबल में निवेश करना आसान है, जहां पहले से ये सब मौजूद हो. हालांकि पारंपरिक परिधानों के साथ दुनिया में छा जाना ज्यादा आसान है, क्योंकि इसकी मांग और आपूर्ति दोनों चुनौती बनी हुई है.
अभी भी अधिकांश फ़ैशन ट्रेंड यूरोप और अमेरिका में बनते हैं, जबकि चीन और मध्य पूर्व के उपभोक्ता बाज़ार को चलाते हैं. अब ऐसी दुनिया में भारत के पारंपरिक परिधानों को वैश्विक रूप देना आसान नहीं है.
भारत के फ़ैशन उद्योग के लिए दुनिया के औद्योगिक मॉडल के अनुसार सप्लाई चेन शुरू करना भी कठिन है. ऐसा इसलिए कि यहां का उद्योग अभी भी बुनकरों और हस्तशिल्पियों निर्भर है और इसमें बड़े पैमाने पर लोग अनौपचारिक ढंग से काम कर रहे हैं.
कोरोना महामारी ने इसे झटका दिया लेकिन जानकारों की राय में ई-कॉमर्स के चलते इस क्षेत्र ने तुरंत वापसी कर ली. इस चीज़ ने यहां के डिजाइनरों के लिए भारत के अमीर और विदेश में रह रहे क़रीब दो करोड़ भारतवंशियों तक पहुंचना भी आसान कर दिया है.
कोरोना के बाद दुनिया में फैलने की बेचैनी
कोरोना के बाद दुनिया के खुलने के साथ भारतीय डिजाइनर विदेशों में भी फैलना चाहते हैं. अभी तक पैसा हासिल करना इनके लिए बड़ी समस्या थी, लेकिन अब ये कोई बाधा नहीं रह गई है.
आदित्य बिड़ला फ़ैशन से निवेश मिलने के बाद डिज़ाइनर सब्यसाची ने 2022 में न्यूयॉर्क में 60,000 वर्ग फ़ुट (5,574 वर्गमीटर) में स्टोर खोलने का एलान किया है. इस साल फ़रवरी में, उन्होंने वहां के लक्ज़री डिपार्टमेंट स्टोर बर्गडॉर्फ गुडमैन में अपने सामानों की प्रदर्शनी लगाई.
तेज़ी से हो रही एलान को देखते हुए कई जानकारों का मानना है कि अब इस क्षेत्र में आशा की नई लहर दौड़ रही है.
इस बारे में कालरा कहती हैं, ''मुझे लगता है कि हम अधिग्रहण, परिवर्तन और विकास की एक बहुत तेज़ लहर देखने जा रहे हैं. हालांकि ये हमेशा आसान नहीं रहने वाला और कई बार नाटकीय अलगाव और गिरावट भी देखने को मिल सकते हैं. लेकिन मुझे लगता है कि अब कई चीज़ें हमेशा के लिए बदलने वाली हैं."
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