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उत्तराखंड: दलित भोजनमाता को चंपावत के सरकारी स्कूल में मिली नौकरी
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
उत्तराखंड के सीमांत ज़िले चंपावत के सूखीढांग जीआईसी में भोजन माता के पद पर दलित महिला सुनीता देवी की नियुक्ति तय हो गई है, प्रशासनिक औपचारिकता भर बाकी है.
प्रशासनिक कवायद का नतीजा यह नज़र आ रहा है कि स्कूल में पढ़ने वाले सवर्ण बच्चों के अभिभावक भी इस बात के लिए तैयार हो गए हैं कि दलित भोजनमाता के हाथ का बना खाना सभी बच्चे खाएंगे.
और सुनीता देवी भी तैयार हैं कि वह एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज केस वापस ले लेंगीं, लेकिन तुरंत नहीं.
सुनीता देवी अभी फूंक-फूंककर कदम रख रही हैं और स्कूल खुलने के बाद जब तक बच्चे उनके हाथ का बना खाना नहीं खा लेते, तब तक मामले को ख़त्म मानने को तैयार नहीं हैं.
भोजनमाता की नियुक्ति और विवाद
ग़ौरतलब है कि जीआईसी सूखीढांग में भोजनमाता का एक पद रिक्त होने के बाद दिसंबर, 2021 में इसके लिए नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गई थी.
पहले इस पद पर एक सवर्ण महिला पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव किया गया था. इसे नियम के विरुद्ध बताते हुए दलित समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया था.
इसके बाद एक दलित महिला सुनीता देवी के नाम का प्रस्ताव पारित किया गया, लेकिन सवर्ण समुदाय ने बैठक का बहिष्कार किया था.
बहरहाल एसएमसी (विद्यालय प्रबंधन समिति) ने यह प्रस्ताव पारित कर दिया था और जीआईसी के प्रिंसिपल ने सुनीता देवी को मौखिक रूप से ही काम शुरू करने को कह दिया था.
सुनीता देवी ने 13 दिसंबर से स्कूल में मिड-डे मील बनाना शुरू भी कर दिया था लेकिन सवर्ण वर्ग के बच्चों ने उनके हाथ का बना खाना खाने से इनकार कर दिया.
सवर्ण अभिभावकों के विरोध के बाद 21 दिसंबर से सुनीता देवी की छुट्टी कर दी गई.
इस मामले ने तूल दोबारा तब पकड़ा जब क्रिसमस की छुट्टियों से पहले दलित समुदाय के बच्चों ने सवर्ण भोजनमाता के हाथ का बना खाने से इनकार कर दिया.
इस मामले के मीडिया की सुर्खियां बनने के बाद प्रशासन ने समझौते की कई कोशिशें कीं. इस मामले की दो बार जांच की गई, जिनमें भोजनमाता की नियुक्ति प्रक्रिया का गलत बताते हुए दोबारा नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के आदेश भी दिए गए थे.
सर्वसम्मति से भोजनमाता बनीं सुनीता देवी
शुक्रवार, 31 दिसंबर, को सूखीढांग इंटर कॉलेज में एसएमसी की फिर एक बैठक हुई जिसमें भोजनमाता के चयन पर विचार किया गया. बैठक में पहले पीटीए अध्यक्ष नरेंद्र जोशी ने पुष्पा भट्ट के नाम का प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन पाई.
इसके बाद विद्यालय की आंतरिक समिति की संस्तुति के आधार पर सुनीता देवी के नाम का प्रस्ताव रखा गया जिस पर सर्वसम्मति से मुहर लगा दी गई.
जीआईसी के प्रिंसिपल प्रेम सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा कि इस प्रस्ताव को दो-एक दिन में उप-शिक्षा अधिकारी के पास अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा. वहां से हरी झंडी मिलने के बाद सुनीता देवी को नियुक्ति पत्र जारी किया जाएगा. उसके बाद ही वह काम करना शुरू करेंगी ताकि पिछली बार की तरह कोई विवाद न हो.
वह यह भी कहते हैं कि वहां अब माहौल काफ़ी बेहतर है. सभी ने सौहार्दपूर्ण तरीके से बैठक में अपनी बात रखी और सर्वसम्मति से सुनीता देवी के नाम पर मुहर लगी.
वैसे इस मामले की असली परीक्षा 15 जनवरी को होगी, जब सुनीता देवी बतौर भोजनमाता बच्चों के लिए मिड-डे मील बनाएंगी और बच्चे उसे खाने के लिए बैठेंगे.
संशय
सूखीढांग जीआईसी में पीटीए के अध्यक्ष नरेंद्र जोशी ने इस बैठक में भाग लेने से पहले शुक्रवार को एक लिखित बयान जारी किया ताकि 'मामले में वाद-विवाद की स्थिति न पैदा हो'.
बयान में उन्होंने कहा कि हालांकि सुनीता देवी के चयन के लिए हुई एमएमसी की बैठक में वह शामिल नहीं थे लेकिन इस पर उन्हें कोई आपत्ति भी नहीं है.
नरेंद्र जोशी ने कहा कि एसएमसी में जो भी सहमति बनेगी, वह उसका समर्थन करेंगे. सुनीता देवी का चयन होता है तो उस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी.
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सुनीता देवी ने उन पर जो व्यक्तिगत आरोप लगाए हैं, उन्हें वह वापस लें या सिद्ध करें. उन्होंने मीडिया (समाचार-पत्रों) के माध्यम से उनपर लगाए गए आरोप भी वापस लेने को कहा है ताकि 'विद्यालय में पहले सी शांति का वातावरण बन सके'.
साथ ही सोशल मीडिया में सुनीता देवी का एक वीडियो क्लिप भी जारी किया गया जिसमें वह कहती दिख रही हैं कि वह एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज अपनी शिकायत वापस ले लेंगी.
बता दें कि भोजनमाता के रूप में काम कर रही सुनीता देवी ने काम से हटाए जाने के बाद पुलिस को लिखित शिकायत कर कुछ लोगों पर उन पर जातिसूचक टिप्पणियां करने और अपमानजनक बर्ताव करने का आरोप लगाया था.
30 दिसंबर को पुलिस ने इसके आधार पर बीडीसी सदस्य दीपा जोशी, पीटीए अध्यक्ष नरेंद्र जोशी समेत 6 लोगों और कुछ अज्ञात के ख़िलाफ़ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में सुनीता देवी ने कहा कि सोशल मीडिया में प्रसारित वीडियो में उनकी बात को पूरा नहीं दिखाया गया है. वह कहती हैं, "जो मैंने बोला वह तो पूरा दिखाया ही नहीं, बस कहा कि बोल-दो, बोल-दो... तब मैंने बोला."
सुनीता कहती हैं कि वह इसी शर्त पर केस वापस लेंगी कि वह लोग (सवर्ण) यह लिखकर दें कि वो आगे ऐसा नहीं करेंगे और छुआछूत नहीं मानेंगे.
सुनीता यह भी कहती हैं कि स्कूल खुला होता तो पता चलता कि उनका बना खाना सबने खा लिया और सब ठीक हो जाता.
वह दोहराती हैं कि उनका अपमान हुआ है और वह तभी अपना सम्मान वापस मान सकती हैं जब सब बच्चे उनके हाथ का बना खाना खा लें.
उम्मीद
बीबीसी हिंदी के साथ बातचीत में पीटीए अध्यक्ष नरेंद्र जोशी ने आशा जताई है कि अब आगे कोई विवाद नहीं होगा.
वह कहते हैं, "माहौल बहुत अच्छा है और सभी गांववाले इस बात पर राज़ी हो गए हैं कि सभी के बच्चे सुनीता देवी के हाथ से बना मिड-डे मील खाएंगे."
इस पर बीबीसी ने सवाल किया कि जो लोग मानते हैं कि दलित के हाथ का खाने से देवता रुष्ट हो जाते हैं, आने वाले वक्त में उनका क्या रवैया होगा?
जोशी कहते हैं, "उम्मीद पर दुनिया कायम है. प्रशासन ने बार-बार यह समझाया है कि छुआछूत से कोई फ़ायदा नहीं है. यह भी कहा गया कि जब आप बाहर जाते हैं तो क्या पता चलता है कि खाना किसने बनाया है? बच्चों को भी समझाया गया है कि बड़े होकर बाहर जाओगे तो छुआछूत के साथ आगे नहीं बढ़ पाओगे. यह पुराने ज़माने की बातें हैं, इन्हें अब छोड़ना होगा."
जोशी कहते हैं कि वो मानते हैं कि 15 जनवरी को स्कूल खुलेगा तो स्कूल के सभी बच्चे सुनीता देवी के हाथ का बना मिड-डे मील खाएंगे. वह यह भी उम्मीद करते हैं कि सुनीता देवी अपनी शिकायत वापस ले लेंगी.
वहीं सुनीता देवी कहती हैं कि वह भी नहीं चाहतीं कि किसी को पुलिस के हाथों पकड़वाएं. वो कहती हैं, "अपने ही गांव का मामला है, शिकायत वापस ले लूंगी, लेकिन पहले सब बच्चे मेरे हाथ का खाना खा लें."
वो शक़ जताती हैं कि शिकायत वापस लेने के बाद अगर दोबारा पहले जैसी स्थिति हो गई तो कोई उनकी बात नहीं सुनेगा.
कुछ आशंकाएं कायम हैं, कुछ संशय बाकी हैं, लेकिन कहा जा सकता है कि सूखीढांग जीआईसी भोजनमाता प्रकरण सुलझता नज़र आ रहा है. शायद इस बार मामले के पटापेक्ष की स्थानीय मीडिया की घोषणा सही हो.
हालांकि, इस मामले में 15 जनवरी के बाद ही कुछ भी अंतिम रूप से कहना सही होगा. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में जातिवाद से जंग के इतिहास में जीआईसी सूखीढांग और सुनीता देवी का नाम भी दर्ज हो गया है.
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