जम्मू-कश्मीर में परिसीमन से होने वाले बदलाव और असर को जानिए

जम्मू-कश्मीर

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चुनाव आयोग ने जम्मू और कश्मीर को लेकर गठित परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के बाद विधानसभा और लोकसभा सीटों को लेकर नोटिफ़िकेशन जारी कर दिया है.

मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने बताया है कि जम्मू और कश्मीर में 90 विधानसभा सीटें और पाँच संसदीय सीटें होंगी. विधानसभा सीटों में से 43 जम्मू क्षेत्र में और 47 सीटें कश्मीर घाटी में होंगी.

90 विधानसभा सीटों में से सात सीटें अनुसूचित जाति और नौ सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होंगी. पाँच संसदीय सीटें होंगी- बारामूला, श्रीनगर, अनंतनाग-रजौरी, उधमपुर और जम्मू.

उन्होंने बताया, ''हमने ये सुनिश्चित किया है कि विधानसभा क्षेत्र एक ज़िले तक सीमित रहें क्योंकि पहले ये होता था कि विधानसभा क्षेत्र कई ज़िलों में बँट जाते थे. सरकार ने इस आयोग का गठन मार्च 2020 में किया था.

जम्मू-कश्मीर की कुछ पार्टियाँ इसका विरोध कर रही हैं और अब उन्होंने आयोग की सिफ़ारिशों को लेकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने इसे राज्य के लोगों को शक्तिहीन करने की कोशिश और संविधान का उल्लघंन कहा है.

आयोग ने सीटों में बदलाव को लेकर क्या-क्या सिफ़ारिशें की हैं और उससे क्या बदलने वाला है, आपको बताते हैं. सबसे पहले जानते हैं कि परिसीमन आयोग की ज़रूरत क्यों पड़ी और ये विवादित क्यों है?

परिसीमन आयोग के सदस्य

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इमेज कैप्शन, सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग में देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्र और देश के उप चुनाव आयुक्त चंद्र भूषण कुमार सदस्य हैं

क्यों बना परिसीमन आयोग?

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 में विधानसभा सीटें बढ़ाने के बाद परिसीमन ज़रूरी हो गया था. इससे पहले जम्मू-कश्मीर में 111 सीटें थीं- 46 कश्मीर में, 37 जम्मू में और चार लद्दाख में. इसके अलावा 24 सीटें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (पीएके) में थीं.

जब लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया गया तब यहाँ सिर्फ़ 107 सीटें रह गईं. पुनर्गठन अधिनियम में इन सीटों को बढ़ाकर 114 कर दिया गया है. इनमें 90 सीटें जम्मू-कश्मीर के लिए और 24 पीएके के लिए हैं.

परिसीमन आयोग का गठन 6 मार्च 2020 को किया गया. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग में देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्र और देश के उप चुनाव आयुक्त चंद्र भूषण कुमार सदस्य हैं.

इस आयोग को शुरुआत में एक साल का समय दिया गया था लेकिन बाद में कई बार समय बढ़ाया गया. नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद शुरुआती दौर में आयोग की बैठकों में शामिल नहीं हुए थे.

20 जनवरी को आए पहले मसौदे में जम्मू में छह विधानसभा सीटें और कश्मीर में एक विधानसभा सीट बढ़ाने की सिफ़ारिश की गई थी. छह फ़रवरी को दूसरा मसौदा किया गया था.

फारुख अब्दुल्ला और गुलाम नबी आज़ाद

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परिसीमन क्यों है विवादित

विपक्ष का कहना है कि सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर में परिसीमन किया जा रहा है जबकि पूरे देश के लिए ये 2026 तक स्थगित है. 2019 में धारा 370 हटने से पहले केंद्र सरकार राज्य की संसदीय सीटों का परिसीमन करती थी और राज्य सरकार विधानसभा सीटों का परिसीमन करती थी. लेकिन, अब जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद दोनों ही ज़िम्मेदारियां केंद्र सरकार के पास हैं.

जम्मू-कश्मीर में आख़िरी बार 1995 में परिसीमन किया गया था. इसके बाद राज्य सरकार ने इसे 2026 के लिए स्थगित कर दिया था. इसे जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन दोनों ने स्थगन को बरकरार रखा.

जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों का कहना है कि परिसीमन पुनर्गठन अधिनियम के तहत किया जाता है जो कि अभी विचाराधीन है.

आयोग का कहना है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर को दो अलग-अलग क्षेत्र की तरह लेने की बजाए एक क्षेत्र के तौर पर लिया है. उसने कुछ विधानसभाओं के नाम या क्षेत्रीय बदलाव को भी मंज़ूरी दी है. जैसे तंगमर्ग को गुलमर्ग के नाम से, ज़ूनीमार को ज़ैदीबाल के नाम से, सोनार को लाल चौक और कठुआ उत्तर को जसरोटा के नाम से जाना जाएगा.

आयोग ने दो बार जम्मू-कश्मीर का दौरा किया और रिपोर्ट तैयार करने से पहले 242 प्रतिनिधिमंडलों से बातचीत की.

जम्मू-कश्मीर

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क्या बदला है?

परिसीमन आयोग ने सात सीटें बढ़ाने की सिफ़ारिश की है. इसके साथ ही जम्मू में 37 से 43 और कश्मीर में 46 से 47 सीटें हो गई हैं.

इसके अलावा पहली बार नौ विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए भी आरक्षित की गई हैं. इमें राजौरी, बुधल, थाना मंडी, सुरनकोटे, पुंछ हवेली, मेंधर, कोकरनाग, गुरेज़ और गुलबर्ग शामिल हैं. केंद्र शासित प्रदेश बनने से पहले इस तरह का कोई प्रावधान नहीं था. ख़ासतौर पर प्रवासी गुर्जर और बकरवाल के लिए.

लोकसभा सीटों की बात करें तो आयोग ने अनंतनाग और जम्मू की सीटों की सीमाओं में बदलाव किया है. जम्मू के पीर पंजाल क्षेत्र को कश्मीर की अनंतनाग सीट से जोड़ दिया गया है. पीर पंजाल में पुंछ और राजौरी ज़िले आते हैं. साथ ही, श्रीनगर संसदीय क्षेत्र के एक शिया बहुल क्षेत्र को भी घाटी में बारामूला निर्वाचन क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया है.

कश्मीरी पंडित

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कश्मीरी पंडितों की सीटें

आयोग ने विधानसभा में कश्मीरी प्रवासियों (कश्मीरी हिंदुओं) के समुदाय से कम से कम दो सदस्यों के प्रावधान की सिफ़ारिश की है. ये सिफ़ारिश उनके साथ हुए उत्पीड़न को लेकर मिले प्रतिनिधित्व और उन्हें राजनीतिक अधिकार सुनिश्चित करने में मदद के लिए की गई है.

आयोग ने यह भी सिफ़ारिश की है कि केंद्र को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से विस्थापित लोगों को प्रतिनिधित्व देने पर विचार करना चाहिए, जो विभाजन के बाद जम्मू चले गए थे. ये नॉमिनेशन करके किया जा सकता है.

अगर कश्मीरी पंडितों को चुनाव की जगह नॉमिनेट किया जाता है तो उनमें एक महिला होनी चाहिए. उन्हें संसद में मतदान का अधिकार दिया जा सकता है.

आयोग के पास कश्मीरी पंडितों या पीएके से विस्थापित हुए लोगों के लिए सीट आरक्षित करने का अधिकार नहीं है. हालांकि, पुनगर्ठन अधिनियम, 2019 अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करने का अधिकार परिसीमन आयोग को देता है.

लेकिन, आयोग की सिफ़ारिश ने कश्मीरी पंडितों के लिए एक उम्मीद जगा दी है. ये समुदाय इस मामले को गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय भी लेकर गया था. वो पुनर्गठन अधिनियम में बदलाव चाहते थे.

अंग्रेज़ी अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स में बीजेपी के कश्मीरी पंडित नेता अश्वनी चुरंगू ने इन सिफ़ारिशों को एतिहासिक बताया है. उन्होंने कश्मीरी सिखों को भी नामित करने की मांग की है.

जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव में वोट डालने जुटीं महिलाएं

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विधानसभा सीटों में बदलाव के मायने

इन बदलावों के बाद जम्मू की 44% आबादी 48% सीटों पर मतदान करेगी, जबकि कश्मीर में रहने वाले 56% लोग बची हुईं 52% सीटों पर मतदान करेंगे. पहले की व्यवस्था में कश्मीर के 56% लोग 55.4% सीटों पर और जम्मू के 43.8% में 44.5% सीटों पर मतदान करते थे.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जम्मू की छह नई सीटों में से चार हिंदू बहुल हैं. चिनाब क्षेत्र की दो नई सीटों में, जिसमें डोडा और किश्तवाड़ ज़िले शामिल हैं, पाडर सीट पर मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं. कश्मीर में एक नई सीट पीपल्स कॉन्फ्रेंस के गढ़ कुपवाड़ा में है, जिसे बीजेपी के क़रीबी के तौर पर देखा जाता है.

कहा जा रहा है कि कश्मीरी पंडितों और पीएके से विस्थापित लोगों के लिए सीटों के आरक्षण से भी भाजपा को मदद मिलेगी. आयोग ने यह निर्दिष्ट नहीं किया कि कश्मीरी पंडितों के लिए मौजूदा सीटों में से ही सीटें आरक्षित की जानी चाहिए या उन्हें अतिरिक्त सीटें दी जानी चाहिए.

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संसदीय सीटों में बदलाव के मायने

अनंतनाग और जम्मू के पुनर्गठन से इन सीटों पर अलग-अलग समूह की आबादी का प्रभाव बदल जाएगा.

लिखता है कि आयोग ने अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ विधानसभा सीटें आरक्षित की हैं. इनमें से छह, पुनर्गठित अनंतनाग संसदीय सीट में शामिल हैं. इनमें पुंछ और राजौरी भी शामिल हैं, जहाँ अनुसूचित जनजाति की सबसे ज़्यादा जनसंख्या है. विपक्षी दलों को आशंका है कि इस संसदीय सीट को भी एसटी के लिए आरक्षित किया जाएगा.

पहले की अनंतनाग सीट पर एसटी की आबादी कम थी, लेकिन इन बदलावों के बाद इस सीट पर चुनावी नतीजे पुंछ और राजौरी पर निर्भर करेंगे. घाटी में राजनीतिक दल इसे कश्मीरी भाषी मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव को कम करने के रूप में देखते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि अगर पुंछ और राजौरी जम्मू लोकसभा सीट में बने रहते हैं तो इसे एसटी आरक्षित लोकसभा सीट घोषित करना पड़ सकता है. इससे भाजपा को यहां हिंदू वोट मजबूत करने में मदद मिल सकती है.

घाटी में पार्टियों का कहना है कि बारामूला के पुनर्गठन से शिया वोट मज़बूत होंगे. इससे सज्जाद लोन के पीपल्स कॉन्फ्रेंस में शिया नेता इमरान रजा अंसारी को मदद मिल सकती है.

महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्लाह

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किसने क्या कहा

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ''हम इसे पूरी तरह ख़ारिज करते हैं. परिसीमन आयोग ने जनसंख्या के आधार को नज़रअंदाज़ किया है और उनकी मर्ज़ी के अनुसार काम किया है. उनकी सिफ़ारिशें आर्टिकल 370 हटाने का ही एक हिस्सा हैं... कि जम्मू-कश्मीर को लोगों को कैसे शक्तिहीन किया जाए.''

उन्होंने कहा, ''पीडीपी पहले दिन से कह रही है कि परिसीमन आयोग बीजेपी के ख़ास समुदाय और क्षेत्र के लोगों को अशक्त करने के एजेंडे पर काम कर रहा है. भारत सरकार ने चुनावी बहुमत को अल्पमत में बदलकर एक बार फिर इस देश के संविधान को रौंदा है.''

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नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक़ ने अख़बार से कहा, ''हमने परिसीमन आयोग की अंतिम सिफ़ारिशें देखी हैं. हम एक-एक विधानसभा क्षेत्र के अनुसार इन सिफ़ारिशों का अध्ययन कर रहे हैं. किसी तरह की जालसाजी इस ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं बदल सकती कि जब भी चुनाव होंगे तो मतदाता बीजेपी और उनके साथियों को पिछले चार साल में उन्होंने जो किया है उसके लिए सज़ा देंगे.''

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गुपकार गठबंधन के प्रवक्ता मोहम्मद युसुफ तरीगामी ने इकोनॉमिक्स टाइम्स ने कहा, ''ये बदलाव जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत किए गए हैं जो अभी विचारधीन है. हमें से कभी बात नहीं की गई और हमारी अनुपस्थिति में लिया गया कोई भी फ़ैसला कभी सही नहीं हो सकता और हम इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे.''

गुपकार

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नेशनल कॉन्फ्रेंस के इमरान डार ने कहा, ''उम्मीद के मुताबिक़ बदलाव नहीं किए गए हैं. इससे सिर्फ़ बीजेपी और उससे जुड़े दलों को फ़ायदा होगा. ये राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने की कवायद है. हमें लगता है कि जब भी चुनाव होंगे तो मतदाता बीजेपी और उससे जुड़े दलों को निर्णायक जवाब देंगे.''

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता सैफ़ूद्दीन सोज़ ने इकोनॉमिक्स टाइम्स से कहा कि इन बदलावों पर निराशा जताई है और कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे. वहीं, पैंथर्स पार्टी ने इस नाख़ुशी जाहिर की है.

अपनी पार्टी के मुनताज़िर मोहियुद्दीन ने इसे निराशाजनक और एक राजनीतिक पार्टी के एजेंडे को पूरा करने वाला बताया है. ''वो जम्मू-कश्मीर के लोगों को बाँटना चाहते हैं. उन्होंने हमारी सिफ़ारिशों पर ध्यान ही नहीं दिया और इसे पूरे प्रयास का मज़ाक बना दिया.''

बीजेपी के राज्य अध्यक्ष रविंदर रैना का कहना है कि इन बदलावों को बेहतरीन कहा है. उन्होंने आयोग को समय पर प्रक्रिया ख़त्म करने के लिए बधाई दी.

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