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एक ट्रांसजेंडर पायलट जिसका हवाई जहाज़ उड़ाने का सपना नहीं हो रहा पूरा
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
जब वो पहली बार प्लेन पर चढ़े थे तो उनकी उम्र सिर्फ़ 11 साल थी. तभी से वो पायलट बनना चाहते थे. तब से ही हवा में उड़ना उनका सपना था.
इस सपने को पूरा करने के लिए उनके माता-पिता को लोन लेना पड़ा. दक्षिण अफ़्रीका से उस लड़के ने कोर्स किया और प्लेन उड़ाने का लाइसेंस लिया.
अब कमर्शियल फ़्लाइट उड़ाने के लिए उन्हें लाइसेंस नहीं मिल रहा लेकिन ऐसा नहीं है कि वो क़ाबिल नहीं हैं. लाइसेंस न मिलने का कारण है उनकी जेंडर आइडेंटिटी.
23 साल का ये युवक अब क़ानून का सहारा ले रहा है, ताकि वो और उनके जैसे दूसरे लोग, जो पायलट बनना चाहते हैं, वो अपने सपने पूरे कर सकें.
ये कहानी है केरल के तिरुवनंतपुरम के ट्रांसजेंडर पायलट एडम हैरी की.
बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "दुनिया भर में ऐसे कई पायलट हैं जो अपनी इस पहचान के साथ प्लेन उड़ा रहे हैं. मेरे पास दक्षिण अफ़्रीकी सिविल एविएशन का एक क्लास-2 सर्टिफ़िकेट भी है."
ट्रांसजेंडर के लिए नहीं हैं नियम
स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद दक्षिण अफ़्रीका से प्राइवेट पायलट का लाइसेंस लेने वाले हैरी का इंस्टिट्यूट ऑफ़ एरोस्पेस मेडिसिन और भारतीय वायुसेना ने क्साल-2 मेडिकल टेस्ट किया है.
इन संस्थानों ने एडम से कहा कि वो फ़िट नहीं हैं क्योंकि वो क्रॉस सेक्स हार्मोन थेरेपी ले रहे हैं. उन्हें कहा गया था कि उनका रिव्यू तभी होगा तब वो थेरेपी और दवाइयां लेना बंद कर देंगे.
लेकिन एडम हैरी का कहना है कि हार्मोन थेरेपी तो पूरे जीवन चलती है, "ये करियर और जेंडर के बीच चुनने जैसा है. मैं हार्मोन थेरेपी नहीं रोक सकता क्योंकि ये पूरी ज़िंदगी चलने वाली प्रक्रिया है."
वे कहते हैं, "भारत में डीजीसीए के पास ट्रांसजेंडर लोगों के लिए कोई नियम नहीं हैं. उनका कहना है कि इस पहचान के साथ क्लास-2 मेडिकल जांच के लिए आवेदन करने वाला मैं पहला व्यक्ति हूँ. यही दिक्कत है. उन्हें हर जेंडर के लिए गाइडलाइन बनानी चाहिए. अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए नियम हैं."
डीजीसीए ने हैरी से संपर्क किया
डीजीसीए ने बीबीसी के सवालों का जवाब अब तक नहीं दिया है. हालांकि गुरुवार को हैरी को भेजे गए एक मैसेज में डीजीसीए ने उन्हें 2020 में सेक्स चेंज हार्मोन थेरेपी रोकने के बाद और क्लास-2 मेडिकल टेस्ट के नतीजे जारी करने से पहले किए गए टेस्ट के सभी मेडिकल रिकॉर्ड जमा करने के लिए कहा है.
डीजीसीए ने उन्हें ये भी कहा है कि 'ट्रांस मैन के रूप में उनका पहला मूल्यांकन' बेंगलुरु स्थित भारतीय वायु सेना के इंस्टीट्यूट ऑफ़ एविएशन मेडिसिन में होगा.
उन्हें और भी मूल्यांकन और जांच के लिए तैयार रहने को भी कहा गया है जिसमें कम से कम एक हार्मोन की जांच, टेस्ट करने वाले एंडोक्राइनोलोजिस्ट, मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक की राय शामिल होगी.
मूल्यांकन की सीमा यूएस फेडरेशन ऑफ़ एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफ़एए) की मेंटल स्टेटस रिपोर्ट फॉर जेंडर डिस्फोरिया के अनुसार होगा. फिजिकल फिटनेस की भी जांच की जाएगी.
एक अलग मेल में डीजीसीए के एक अन्य अधिकारी ने हैरी से कहा है कि वे क्लास-2 के मेडिकल रिव्यू करने के लिए आवेदन देने से पहले क़ानूनी रूप से एक 'ट्रांसजेंडर' के रूप में अपना नाम रजिस्टर करवाएं.
डीजीसीए ने एक बयान में कहा, यदि आवेदक को कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया या लक्षण नहीं है तो हार्मोनल रिप्लेस्मेंट थेरेपी का उपयोग अयोग्य ठहराने का कारण नहीं बनेगा.
'पहले मुझे नहीं पता था...'
साल 2017 में जब उन्होंने कोर्स में दाखिला लिया, तभी उनकी परेशानियां शुरू हुई. केरल के राजीव गांधी एकेडेमी ऑफ़ एविएशन एंड टेक्नॉलॉजी में सोशल जस्टिस फॉर ट्रांसजेंडर डिपार्टमेंट से फंड मिला.
पहले थ्योरी की क्लास हुई फिर उन्हें फ्लाइट की क्लासेस लेनी थी, लेकिन उससे पहले उन्हें एक मेडिकल टेस्ट से गुज़ारना था. साल 2020 में यहीं से नियमों को लेकर उनकी परेशानियां शुरू हुईं.
लेकिन उससे भी पहले उन्हें परिवार और समाज के लोगों को अपने बारे में बताना था, और ये बिल्कुल आसान नहीं था
उन्हें बताना था कि वो जैसे वो दिखते हैं, वैसा वो अंदर से महसूस नहीं करते. उन्हें स्कूल के दौरान ही ख़ुद में हो रहे बदलाव के बारे में पता चलना शुरू हो गया था. एडम ने इस बारे में अपने कुछ दोस्तों से भी बात की थी.
कई बार एडम हैरी के दोस्तों और शिक्षकों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया था. यहां तक की उनके शिक्षकों ने उन्हें कुछ हाव-भाव बदलने के लिए भी कहा.
एडम कहते हैं, "पहले मुझे नहीं पता था कि मैं ट्रांसजेंडर हूं. मैंने ये शब्द ही कभी नहीं सुना था. दसवीं कक्षा मैं मैंने इससे जुड़ी एक ख़बर पढ़ी."
लेकिन अब उनके दोस्तों और शिक्षकों के बर्ताव बदलाव आया है.
वो कहते हैं, "मैं उन्हें दोष नहीं देता क्योंकि हमारे समाज में जेंडर के प्रति इतनी समझ नहीं थी. इसलिए मैं अपने माता-पिता को दोष नहीं देता. वो समाज का सामना करने से डरते थे. उन्होंने मेरे परिवार, रिश्तेदारों और समाज के कारण बहुत कुछ झेला है. इसलिए वो दबाव में थे, मुझे इलाज से रोकना चाहते थे."
माता-पिता साथ नहीं, लेकिन मिला एक नया परिवार
एडम अब छोटे-मोटे काम कर अपना ग़ुज़ारा कर रहे हैं, कभी किसी लोकल टीवी चैनल के लिए एंकरिंग कर लेते हैं तो कभी बच्चो को जेंडर के मामलों पर लेक्चर देते हैं. वो ख़ाने की डिलीवरी का काम भी करते हैं.
एडम अकेले नहीं हैं जिन्हें इस तरह की परेशानियों के गुज़रना पड़ रहा है.
भारत के लिए 12 अंतरराष्ट्रीय मेडल जीत चुकीं शांति सुंदरराजन से 2006 में जीते एशियन गेम्स के मेडल वापस ले लिए गए थे क्योंकि वो जेंडर टेस्ट में फ़ेल हो गई थीं. हाल ही वो ख़बरों में थीं क्योंकि एक सहकर्मी के ख़िलाफ़ उत्पीड़न की रिपोर्ट लिखावने जब वो पुलिस स्टेशन गईं तो उनसे पुलिस ने जेंडर सर्टिफ़िकेट मांगा.
इस लड़ाई में एडम अपने माता-पिता के साथ की कमी महसूस करते हैं. वो कहते हैं, "मुझे उनकी कमी महसूस होती है लेकिन मेरे पास ट्रांसजेंडर समुदाय का एक बड़ा परिवार है."
आख़िर में एडम हैरी बताते हैं किसमाजिक न्याय विभाग के एक अधिकारी से उनकी लंबी बातचीत हुई है.
उन्हें उम्मीद है कि कुछ अच्छा होगा.
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