भारत-अमेरिका युद्ध अभ्यास पर आख़िर चीन को एतराज़ क्यों

भारत-अमेरिका युद्ध अभ्यास

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    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत और अमेरिका के बीच जारी युद्ध अभ्यास पर चीन ने विरोध दर्ज किया है.

भारत और अमेरिका भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से लगभग 100 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के औली में युद्ध अभ्यास कर रहे हैं.

भारत और अमेरिका के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास का यह 18वां संस्करण है. यह क़रीब दो हफ़्ते तक चलेगा और इसका उद्देश्य शांति स्थापना और आपदा राहत कार्यों में दोनों सेनाओं के बीच विशेषज्ञता को साझा करना है.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लीजियान ने बुधवार को पत्रकारों से बात करते हुए चीन के विरोध को दर्ज कराया.

चीनी प्रवक्ता ने कहा कि ऐसा करके भारत ने 1993 और 1996 में भारत और चीन के बीच हुए समझौतों की भावना का उल्लंघन किया है.

भारत ने चीन के विरोध को ख़ारिज करते हुए कहा है कि इस मामले में चीन के पास कोई 'वीटो' नहीं है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, "युद्ध अभ्यास का 1993 और 1996 के समझौतों से कोई लेना-देना नहीं है. चीन ख़ुद ही इस समझौते का उल्लंघन करता है. उन्हें पहले ख़ुद इसका अवलोकन करना चाहिए कि उन्होंने इसका कितना उल्लंघन किया है. चीन या किसी भी दूसरे देश को भारत के सैन्य अभ्यास के बारे में कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं है."

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1993 और 1996 का भारत-चीन समझौता

अस्सी के दशक में भारत और चीन के संबंधों में थोड़ी बेहतरी आने लगी थी और 1988 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चीन दौरे ने संबंधों को और बेहतर करने में अहम रोल अदा किया था.

दोनों देशों के बेहतर होते रिश्तों का फल था 1993 और 1996 का भारत-चीन समझौता.

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव ने 1993 में चीन का दौरा किया और उस समय चीन के प्रधानमंत्री रहे ली पेंग के बीच समझौता हुआ था.

समझौते को भारत के तत्‍कालीन विदेश राज्‍य मंत्री आर एल भाटिया और तत्‍कालीन चीनी उप-विदेश मंत्री तांग जियाशुआन ने साइन किया था.

चीनी मामलों के जानकार और फ़िलहाल शिव नाडर यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे प्रोफ़ेसर जबिन टी जैकब के अनुसार, "इन समझौतों का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सेना के बीच सीबीएम (कॉन्फ़िडेंस बिल्डिंग मेजर्स) यानी विश्वास बढ़ाना था."

इन समझौतों पर हस्ताक्षर भले ही मंत्रियों ने किए थे प्रोफ़ेसर जैकब के अनुसार एलएसी पर शांति बरक़रार रखने के लिए दोनों देशों के बीच यह एक तरह का सैन्य समझौता था.

इसके तहत नौ बिंदुओं पर सहमति बनी थी.

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद

इस समझौते के तहत यह बात तय की गई थी कि कोई पक्ष दूसरे के ख़िलाफ़ बल या सेना प्रयोग नहीं करेगा.

अगर एक देश के जवान ग़लती से एलएसी पार कर जाते हैं, और दूसरा पक्ष उनको बताता है तो वो जवान फ़ौरन अपनी ओर वापस लौट आएंगे.

हर पक्ष सैन्य अभ्यास की पूर्व जानकारी देगा.

यह भी कहा गया था कि अगर तनाव बढ़ता है तो दोनों पक्ष एलएसी पर जाकर हालात का जायज़ा लेंगे और बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे.

1993 के समझौते को 1996 में बढ़ा दिया गया. उस समय चीनी राष्ट्रपति जियांग ज़ेमिन भारत आए थे. भारत के प्रधानमंत्री उस समय एचडी देवेगौड़ा थे.

1996 के समझौते में कमोबेश वही सारें बातें की गईं जिनका ज़िक्र 1993 के समझौते में था. 1996 में यह भी तय हुआ था कि एलएसी के पास दो किलोमीटर के भूक्षेत्र में कोई फ़ायर नहीं होगा, कोई पक्ष आग नहीं लगाएगा, विस्फोट नहीं करेगा और ना ही ख़तरनाक रसायनों का उपयोग करेगा.

1996 के समझौते के तहत एलएसी पर दोनों पक्ष ना तो सेना का इस्तेमाल करेंगे और ना ही इसकी धमकी देंगे.

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गलवान में हिंसा

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  • एक मई 2020 को पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील के नॉर्थ बैंक पर झड़प, दर्जनों सैनिक घायल
  • इसके बाद 15 जून को गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प
  • गलवान पर 16 जून को भारतीय सेना का बयान - 20 भारतीय सैनिकों की मौत
  • चीन ने भी बयान जारी किया मगर इससे ये साफ़ नहीं हुआ कि उसके कितने सैनिकों की मौत हुई.
  • फरवरी, 2021 में चीन ने गलवान घाटी झड़प में मरने वाले अपने चार सैनिकों को मरणोपरांत मेडल देने की घोषणा की.
  • फ़रवरी 2022 में ऑस्ट्रेलियाई अख़बार 'द क्लैक्सन' का दावा: गलवान में चीन के 9 गुना ज़्यादा यानी कम-से-कम 38 सैनिकों की मौत
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1993 और 1996 में जो समझौते हुए थे उसी ने 2005, 2012 और 2013 में हुए समझौते की नींव रखी.

प्रोफ़ेसर जैकब के अनुसार, "1993 और 1996 के समझौते दोनों देशों की सेना के बीच थे, लेकिन 2005 का समझौता एक राजनीतिक समझौता था. 2005 में पहली बार दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को कैसे दूर किया जाए इस पर बातचीत हुई थी."

उस समय भारत के प्रधानमंत्री रहे डॉक्टर मनमोहन सिंह (2004-2014) और चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के कार्यकाल में भारत और चीन के संबंधों में काफ़ी प्रगति हुई थी.

शी जिनपिंग 2012 में पार्टी के महासचिव बने और फिर मार्च 2013 में चीन के राष्ट्रपति बन गए. इधर नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने.

शुरुआती कुछ सालों में दोनों नेताओं के बीच संबंध अच्छे रहे और दोनों देशों के बीच रिश्तों में कोई ख़ास कड़वाहट भी नहीं आई, लेकिन फिर 2017 में डोकलाम और 2020 में गलवान के बाद दोनों देशों के संबंध ख़राब होते चले गए.

जून 2020 में भारत और चीन की सेना के बीच पूर्वी लद्दाख़ की गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई थी. इसमें भारत के 20 सैनिक मारे गए थे.

पहले ख़बर आई थी कि चीन के चार सैनिक मारे गए थे लेकिन बाद में एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कम से कम 38 चीनी सैनिकों की भी मौत हुई थी. भारत और चीन के बीच 46 साल के बाद इतनी गंभीर हिंसक झड़पें हुई थीं.

भारत-चीन संबंध

क्या भारत ने 1993 और 1996 समझौतों का उल्लंघन किया है?

प्रोफ़ेसर जैकब कहते हैं कि चीन का यह आरोप बेबुनियाद है.

उनके अनुसार, "एलएसी पर समझौतों का अगर किसी ने उल्लंघन किया है तो वो चीन है जो लगातार दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का उल्लंघन करता आ रहा है."

भारत और अमेरिका के बीच यह 18वां सैन्य अभ्यास है जो कि हर साल होता है. भारत और चीन के बीच कई वर्षों तक काउंटरटेररिज़्म (आंतकवाद विरोधी) सैन्य अभ्यास हुए हैं तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है.

प्रोफ़ेसर जैकब का मानना है कि चीन की असल दिक़्क़त भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रिश्ते हैं. चीन को लगता है कि क्वाड का गठन चीन को दबाने के लिए किया गया है.

क्वाड यानी क्वाड्रीलेटरल सुरक्षा समूह जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं.

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चीन ने अमेरिका को चेतावनी दी थी: पेंटागन

अमेरिका के रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने अमेरिकी संसद में एक रिपोर्ट पेश की है जिसमें दावा किया गया है कि चीन ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि वो भारत के साथ उसके रिश्तों में दख़लअंदाज़ी ना करे.

पेंटागन ने यह रिपोर्ट मंगलवार को पेश की. इसमें यह भी कहा गया है कि चीन भारत के साथ तनाव को कम करना चाहता है ताकि भारत अमेरिका के ज़्यादा क़रीब ना जाए.

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एलएसी पर भारत के साथ टकराव कितने गंभीर हैं, चीन ने पूरी कोशिश की थी कि दुनिया को इसका पता नहीं चल सके.

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि एलएसी पर चीनी सेना ने 2021 में अपनी मौजूदगी बनाए रखी और एलएसी के पास बुनियादी ढांचे का निर्माण भी जारी रखा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और चीन के बीच बातचीत तो हुई लेकिन उसमें कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई क्योंकि कोई भी अपने स्थान से हटने को तैयार नहीं है.

प्रोफ़ेसर जबिन टी जैकब के अनुसार यह समझना महत्वपूर्ण है कि अगर चीन की तरफ़ से चेतावनी दी गई थी तो वो किस तरह की थी.

उनके अनुसार, "चीनी विदेश मंत्रालय के काम करने का तरीक़ा है कि वो संकेतों में बात करते हैं वो कभी भी खुलकर कोई बात नहीं करते हैं. इसलिए कई बार ऐसा होता है कि बाद में आपको पता चलता है कि दरअसल वो एक चेतावनी थी."

भारत-चीन व्यापार

भारत में भी इस तरह कि रिपोर्ट की ज़रूरत

प्रोफ़ेसर जैकब के अनुसार पेंटागन की रिपोर्ट से एक सीख यह ली जा सकती है कि भारत में भी इस तरह की रिपोर्ट बनाई जाए.

वो कहते हैं, "भारत में भी ऐसा सिस्टम होना चाहिए कि सरकार संसद के ज़रिए जनता को बताए कि एलएसी पर क्या हो रहा है. 2020 में गलवान में जो कुछ हुआ है उस पर भारत सरकार की तरफ़ से अभी तक कोई रिपोर्ट या व्हाइट पेपर नहीं आया है."

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भारत-चीन रिश्ते का भविष्य

प्रोफ़ेसर जैकब का मानना है कि निकट भविष्य में भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की कोई उम्मीद उन्हें नहीं है.

उनके अनुसार जब तक एलएसी ख़ासकर पूर्व लद्दाख़ में जो कुछ हुआ वो उलट नहीं जाता है, संबंधों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है.

वो कहते हैं, "आगे भी कठिनाई आने वाली है. झड़पें होती रहेंगी, दोनों तरफ़ से जान का नुक़सान होता रहेगा. यह दोनों देशों के बीच संरचनात्मक समस्या है. दोनों देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता जारी है इसलिए यह आसानी से हल होने वाला नहीं है."

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