अनिवार्य शिक्षा कितनी कारगर?

- Author, ज्योत्सना सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
छह से चौदह साल के बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिलाने से संबंधित विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया गया है.
राज्यसभा में यह विधेयक पहले ही पारित किया जा चुका है.
केंद्र सरकार का कहना है कि इस विधेयक के दस मुख्य लक्ष्य हैं जिनमें निजी स्कूलों में 25 फ़ीसदी सीटें ग़रीब बच्चों के लिए आरक्षित करना और स्कूलों में दाख़िले को लेकर लालफ़ीताशाही ख़त्म करना शामिल है.
विधेयक में ये भी कहा गया है कि तीन साल के भीतर सभी राज्य हर इलाक़े में स्कूल बना देंगे.
मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने राज्यसभा में इस विधेयक को पारित कराने की अपील करते हुए कहा था, “हम पहले ही बहुत समय बर्बाद कर चुके हैं. अब और देरी नहीं की जा सकती.”
सिब्बल ने कहा, “ये विधेयक देश का भविष्य सुधारने का एक महान अवसर है. इसे गँवा दिया तो पता नहीं देश का क्या होगा.”
ज़ाहिर है सरकार इसके प्रति गंभीर है. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हैं कि सरकार इस कार्यक्रम को अमल में लाने के लिए पैसा कहां से लाएगी.
कई सवाल
कपिल सिब्बल कह चुके हैं कि एक बार विधेयक पास हो जाए तो पैसा लाने में दिक्क़त नहीं होगी. इस मामले वह सरकारी-निजी भागीदारी की बात कर चुके हैं.
सरकार की तत्परता के बावजूद इस विधेयक को लेकर आलोचकों ने कई सवाल उठाए हैं.
कई लोग ये मानते हैं कि सबको शिक्षा देने की बात के पीछे मंशा तो अच्छी है लेकिन ये क़दम आधा अधूरा है.
बच्चों के अधिकार से जुड़ी संस्था 'सेव द चिल्ड्रन' का कहना है कि विधेयक में तीन से छह साल के बच्चों को न शामिल करना बहुत बड़ी ग़लती है.
संस्था की निदेशक रेणु सिंह कहती हैं, “संसार भर में शोध से ये साबित हो चुका है कि तीन से छह वर्ष की उम्र में बच्चों में सीखने की कला विकसित होती है, इसलिए उनको पढ़ाई के लिए तैयार करने की सुविधा देना ज़रूरी है.”
वो कहती हैं कि बाल श्रमिकों और शिक्षा के समान अवसर प्रदान करने के बारे में नियम सुनिश्चित करने के विषय में भी सरकार ने कुछ नहीं कहा है.
इस विधेयक की सबसे बड़ी खामी ये है कि शिक्षा दिलाने की बात हो रही है लेकिन शिक्षा का स्तर सुधारने की बात नहीं हो रही है.
स्वयंसेवी संस्थाएँ सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को लेकर सवाल उठाती रही है.
सरकारी आँकड़ों के अनुसार लगभग सात करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते. दिल्ली की सड़कों पर पत्र-पत्रिकाएँ बेच रहे एक बच्चे का कहना है, “मैं स्कूल जाता था लेकिन माँ- बाप ने बंद कर दिया. मैं और पढ़ना चाहता हूं. इंजीनियर बनना चाहता हूँ.”
शिक्षा के अधिकार के इस विधेयक से ऐसे कितने सपने सच हो पाएंगे, कहना मुश्किल है.
































