दक्षिण बस्तर की रणभूमि से पलायन शुरू

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, चिंतलनार (दंतेवाडा), छत्तीसगढ़ से
ध्वस्त हुईं इमारतें और पुल, हर पचास गज की दूरी पर कटी हुईं सड़कें, घाटियों और बीहड़ों के बीच से होकर गुज़रने वाली कच्ची सड़कों पर टूटे हुए पेड़-- यह युद्ध क्षेत्र है. संगीनें खिंची हुईं हैं और अब आर पार की लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी है. एक तरफ़ माओवादी छापामार हैं तो दूसरी तरफ़ सुरक्षाबलों के जवान.
चिंतलनार को माओवादियों की राजधानी कहा जाता रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि यहाँ इनका कोई मुख्यालय स्थित हो या कोई कार्यालय. मगर कहा जाता है कि चिंतलनार के बीहड़ों से ही वह अपनी समानांतर 'जनता सरकार' चलाते हैं.
इसीलिए यहाँ के संपर्क मार्गों को काफ़ी कठिन बना कर रखा गया है. माओवादियों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ यहाँ न कोई आ सकता है और न यहाँ से जा सकता है.
<link type="page"><caption> दंतेवाड़ा का हाल सलमान रावी की ज़ुबानी </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/04/100415_salman_dantewada_awa.shtml" platform="highweb"/></link>
दोरनापाल से चिंतलनार तक का सफ़र कोई आसान नहीं है. सीमित वाहन और कुछ चुनिंदा लोग ही इस सड़क पर आते जाते हैं. पिछले छह अप्रैल से इस मार्ग पर वाहनों की आवाजाही बंद है क्योंकि उसी दिन सुबह यह इलाक़ा गवाह बना भारत के इतिहास के सबसे बड़े नक्सल हमले का. जिसमें सुरक्षाबलों के 76 जवानों को अपनी जान गवांनी पड़ी.
दोरनापाल से सीधी सड़क कोंटा की तरफ़ जाती है और दाहिने वाली सड़क जगरगुंडा तक जो 70 किलोमीटर की दूरी पर है. हमें पता चला कि चिंतलनार तक तो हम किसी तरह पहुँच सकते हैं. मगर वहां से जगरगुंडा का रास्ता कटा हुआ है. एक लंबे अरसे से यहाँ वाहन नहीं चल रहे हैं.
नक्सली गढ़ का सफ़र
दोरनापाल नामक कस्बे के चौराहे पर खड़े कुछ युवकों की यह सलाह थी, "प्रेस वाले जा सकते हैं. घटना के बाद प्रेस के जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. हो सकता है की बीहड़ों में छापामार दस्ते के लोग आपको रोकें. अपना परिचय दे दीजिएगा. आप जा सकते हैं."
पहला पुलिस कैंप हमें दोरनापाल से मुड़ते ही मिला. रेत की बोरियों के पीछे सिमटे हुए जवान सड़क पर चलने वालों पर पैनी नज़र रख रहे थे. कैंप के बाहर कोई हलचल नहीं थी.
दूसरा कैंप पोल्लमपल्ली में मिला. जवान अपने कैंप में और बहार सड़क पर मौजूद चेक नाके पर किसी का अता पता नहीं. बांस गिरा हुआ था. हमें बताया गया कि हमें गाडी से खुद उतारकर इस बांस को हटाना है और फिर खुद इसे बंद करना भी है. जवान कैंप से बाहर नहीं आएंगे.
यह रणभूमि है और यहाँ कोई भी चूक महंगी पड़ सकती है. शायद छह अप्रैल को चिंतलनार में ऐसा ही हुआ था. स्थिति की थोड़ी सी अनदेखी और इतने ख़तरनाक परिणाम.
जगह जगह पर कटी हुई सडकों पर समझ नहीं आ रहा था कि किस परिवर्तित रास्ते से जाया जाए. ध्वस्त किए गए रास्तों पर हमारी गाड़ी बमुश्किल पार हो तो रही थी मगर कलेजा मुंह को आ रहा था. कहा जाता है कि इस रोड पर कहाँ बारूदी सुरंग बिछी हुई है यह खुद माओवादी भी भूल गए हैं.
चिंतागुफा थाने पर स्थित कैंप के पास के चेक नाके पर हमें जवानों के रजिस्टर पर एंट्री करनी पड़ी. हमें बताया गया कि एंट्री करने से यह पता चल जाएगा कि कौन वापस लौट गया और कौन रह गया.
चेक नाके पर तैनात जवान नें हमसे कहा, "यहाँ से चिंतलनार 15 किलोमीटर दूर है. सड़क ख़राब है सावधानी से जाएंगे." छह अप्रैल की घटना में चिंतागुफा कैंप के 13 जवान भी मारे गए थे इसलिए यहाँ तैनात जवानों में मातम और आक्रोश ख़त्म नहीं हुआ है.

इस रास्ते को देख कर लगता है कि माओवादी नहीं चाहते कि कोई इस इलाक़े में आए. यह फिर इस इलाक़े को ऐसा मुश्किल बना दें कि सुरक्षा बलों के जवान यहाँ आसानी से न पहुँच पाएं. और अगर आएं भी तो उन्हें बारूदी सुरंगों के जाल का सामना करना पड़े.
यूँ तो पूरे बस्तर में खौफ़ का साया है मगर छह अप्रैल की घटना के बाद हालात और गंभीर बने हुए हैं. सुदूर ग्रामीण और जंगली क्षेत्रों में अब मौत का डर बड़े पैमाने पर लोगों को पलायन करने पर मजबूर कर रहा है. घटना के बाद से दोरनापाल से लेकर चिंतलनार और चिंतलनार से लेकर जगरगुंडा तक सन्नाटा पसरा हुआ है.
चिंतलनार से महज़ चार किलोमीटर पहले कच्ची सड़क पर हमें उस बारूदी सुरंग निरोधक वाहन के अवशेष मिले जिसे छह अप्रैल को माओवादियों नें विस्फोट कर उड़ा दिया था. घटना के कई दिनों बाद भी इस वाहन के टुकड़े अभी तक इधर उधर बिखरे पड़े थे. विस्फोट के कारण हुए गड्ढे को देख कर और वाहन के बिखरे हुए कलपुर्जों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि धमाका कितना ज़ोरदार था.
दंतेवाड़ा ज़िला मुख्यालय से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित चिंतलनार के लोग बताते हैं कि पिछले सात दिनों से वह अपने अपने घरों में सिमटे हुए हैं. इस इलाक़े में हर मंगलवार को बाज़ार भी लगता है जो इस बार नहीं लगा.
चिंतलनार के एक ग्रामीण नें बीबीसी को बताया. "बाज़ार तो लगा मगर इसमें कोई ग्रामीण नहीं आया. चिंतलनार के मंगल बाज़ार में सुदूर जंगली क्षेत्रों से आदिवासी आया करते हैं, मगर घटना के बाद से सब अपने घरों में सिमट गए हैं."
युद्ध क्षेत्र

यहाँ कब क्या होगा कोई नहीं जानता. एक युद्ध क्षेत्र में रहने का ख़ामियाज़ा लोगों को भुगतना पड़ रहा है. चूँकि यहाँ बिजली नहीं है इसलिए हर रात और ज़्यादा अंधेरी और खौफ़ज़दा बन जाती है.
घटना के बाद से इस इलाक़े के कई गांव वीरान हो गए हैं. खौफज़दा ग्रामीण अपना घर छोड़ कर दूसरी जगहों पर चले गए हैं. पुलिस के लोग कहते हैं कि बहुत सारे लोग तो घटना के पहले से ही यहाँ से पलायन कर चुके हैं.
चिंतलनार के ही काशीनाथ सिंह कहते हैं, "कौन रहेगा यहाँ. भूख और दहशत के बीच कितने दिनों तक यहाँ रहा जा सकता है? एक एक कर लोग अब भाग रहे हैं. हमारे गाँव में भी पांच घरों में ताले लटके हुए हैं. बगल के आदिवासी टोले में भी कई परिवार पलायन कर चुके हैं.
चिंतलनार में ही वह सीआरपीएफ़ का कैंप है जहाँ से सबसे ज़्यादा जवान छह अप्रैल की घटना में मारे गए थे. सुबह छह बजे से दो घंटों तक चली मुठभेड़ का गांव वालों की तरफ़ से कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है. जिससे पूछो वह यही कहता है: "हमने कुछ नहीं देखा. हम अपने घरों में थे. सिर्फ़ आवाजें सुन रहे थे."
कैंप चिंतलनार के अंदर है मगर यहाँ तैनात कोई जवान बाहर नहीं आता है. जवान हर किसी को शक़ की नज़र से देखते हैं. यहाँ कोई किसी पर भरोसा नहीं करता है. शायद युद्ध क्षेत्र में ऐसा ही होता है.
































