क्या हासिल किया प्रतिनिधिमंडल ने

कश्मीर के दौरे पर गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने अपनी एक छाप तो छोड़ी है.
इसने कम से कम कश्मीर के एक वर्ग के निराशावाद को कम किया है.
कश्मीर की आम जनता ने ये देखा कि अलगाववादी नेताओं ने तो इस प्रतिनिधिमंडल से मिलने से मना कर दिया था, लेकिन उसके सदस्यों ने इन नेताओं के घर जाकर उनसे मुलाक़ात की.
यहाँ तक कि कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गिलानी भी अब उतने निराशावादी नहीं हैं.
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वो केंद्र सरकार से कहेंगे कि बातचीत करने के लिए वो पहले गिलानी की पाँच शर्त्तों पर ग़ौर करे.
गिलानी ने कहा है कि "हमें तबतक इंतज़ार करना चाहिए जबतक कि ये प्रतिनिधिमंडल अपनी सिफ़ारिशें भारत सरकार को नहीं भेज देता. उसके बाद ही हम कह पाएँगे कि इस प्रतिनिधिमंडल की यात्रा फ़ायदेमंद रही या नहीं."
आम लोगों से सीधा संपर्क
प्रतिनिधिमंडल के सदस्य एक अस्पताल सहित कई जगहों पर गए.
जहाँ कहीं भी वो गए, उन्हें ग़ुस्साई हुई भीड़ का सामना करना पड़ा.
श्रीनगर से 40 किलोमीटर दूर, तंगमाल में भीड़ ने उनसे सवाल किया कि वो कैसे कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हैं जबकि "जब सुरक्षाबल हमारे बच्चों की हत्या करते हैं और जब हमारी औरतों के साथ बलात्कार होता है तब ये दर्द उन्हें महसूस नहीं होता."
प्रतिनिधिमंडल के किसी भी सदस्य ने इनमें से किसी भी सवाल का कोई भी जवाब नहीं दिया.
लेकिन उनका उद्देश्य पूरा हो चुका था. वो आम लोगों से संपर्क बनाने के अपने प्रयास में सफल हो चुके थे.
26 साल के आशिक हुसैन ने कहा, वो जब आए तो पहले तो मैं पूरी तरह से निराश था, लेकिन अब मुझे लगता है कि वो शायद सच में एक गंभीर कोशिश थी.
लेकिन विडंबना ये थी कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के साथ ही पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों से साथ मिलकर सेना ने आम जनता के विरोध को कुचलने का काम शुरू कर दिया.
पट्टन के एक निवासी ने मुझे बताया कि यहाँ अघोषित सैनिक शासन लागू है.
उसने बताया कि सेना के अत्याचार से बचने के लिए कई परिवार गाँव छोड़कर चले गए हैं.
सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ऐसे किसी भी गाँव में नहीं गया.
उद्देश्य
पर्यवेक्षकों का कहना है कि कश्मीरियों पर अपना प्रभाव बनाने से ज़्यादा इस प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के ज़रिए भारत सरकार का उद्देश्य कश्मीर पर एक राष्ट्रीय सर्वसम्मति क़ायम करना था.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कश्मीर पर लिए जानेवाले किसी भी फ़ैसले में मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को अपने साथ लेकर चलना चाहते हैं, लेकिन कई मुद्दों पर पार्टी की कुछ आपत्तियाँ हैं.
लेकिन कश्मीर पर भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथ के बावजूद वहाँ के कई लोग मानते हैं कि ये प्रतिनिधिमंडल कश्मीर की स्थिति की बेहतर समझ के साथ वापस गया है.
अगर ये प्रतिनिधिमंडल वापस जाकर कुछ हासिल नहीं करता तो इससे कश्मीरियों का विश्वास टूटेगा और जो भी थोड़ी बहुत उम्मीद बनी है, वो टूट जाएगी
































