अयोध्या पर नरमी के संकेत नहीं

अयोध्या के रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर अब हिंदू और मुसलमान दोनों पक्षों के रुख़ में सख़्ती आती जा रही है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर विचार-मंथन के बाद अब दोनों पक्षों की ओर से जो बातें आ रही हैं उसमें समझौते की कोई गुंजाइश तो कम से कम नज़र नहीं आ रही है.
एक ओर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को विसंगतिपूर्ण बताते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है.
तो दूसरी ओर हिंदु महासभा ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी कि पूरा परिसर ही रामलला विराजमान को दे दिया जाए.
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जहाँ कहा है कि मस्जिद लेन-देन का विषय नहीं है वहीं हिंदु महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा है कि मुसलमानों को मंदिर बनाने में सहयोग देना चाहिए.
उल्लेखनीय है कि पिछले महीने बहुमत के आधार पर दिए गए अपने फ़ैसले में विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में बाँट दिया था और कहा था कि जहाँ राम की मूर्ति रखी है वह रामलला विराजमान को ही दे दी जाए.
सहयोग का आग्रह
हिंदू महासभा की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील करके यह प्रयास किया जाएगा कि वह पूरा परिसर रामलला विराजमान को दे दिया जाए.
महासभा ने सभी घटकों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करने की बात भी कही है.
यहाँ तक तो ठीक था लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बयान के बाद हिंदू महासभा का लहज़ा ख़ासा सख़्त होता दिखता है.
अपने बयान में महासभा ने कहा है, "मुस्लिम संगठन बार-बार शरियत की दुहाई देकर हिंदू समाज और भारतीय संविधान का अपमान कर रहे हैं. जबकि शरियत स्वयं संदेह के घेरे में है."
हिंदू महासभा की ओर से अनुरोध किया गया है, "भगवान राम आपके पूर्वज हैं इसलिए दुराग्रह को त्यागकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता और विकास में दोनों समुदाय सहयोग करें."
कुछ ऐसा ही अनुरोध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहनराव भागवत ने भी किया है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस पर नागपुर में संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा, "इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ का निर्णय रामजन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर के निर्माण का ही मार्ग प्रशस्त करेगा."
भागवत ने कहा, "हाईकोर्ट का निर्णय अपने देश के मुसलमानों सहित सभी वर्गों को आत्मीयतापूर्वक मिलजुलकर एक नया शुभारंभ करने का नियति द्वारा प्रदत्त एक अवसर है."
शरियत का हवाला
इससे पहले आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय किया था.
बोर्ड ने कहा था कि शरियत के अनुसार मस्जिद की जगह पर लेन-देन से कोई समझौता नहीं हो सकता.
बोर्ड ने अपने बयान में कहा था कि हाईकोर्ट के फ़ैसले में कई विसंगतियाँ हैं.
बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया है, "यह मुसलमानों का अधिकार है और दायित्व भी कि के वे फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर फ़ैसले के ज़रिए संविधान और न्याय के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ हुई विसंगतियाँ दूर कराएं."
जहाँ तक बातचीत का सवाल है तो बोर्ड ने इसका स्वागत को किया लेकिन शरियत की बात करके साफ़ कर दिया कि वह झुकने को तैयार नहीं है जिसकी हिंदू संगठन उम्मीद कर रहे हैं.
बोर्ड की तरफ से कहा गया कि अगर कोई ठोस प्रस्ताव आता है तो बोर्ड बातचीत के लिए तैयार हैं बशर्ते कि वह प्रस्ताव संविधान, शरियत और मुस्लिम समुदाय के सम्मान के दायरे में हो.
































