नया नहीं भूमि अधिग्रहण का विरोध

इलाहाबाद के पास रेलवे ट्रेक पर किसानों के विरोध से रेल यातायात ठप्प हो गया था.

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भट्टा परसौल गांवों में किसानों के विरोध ने एक बार फिर भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों को सामने खड़ा कर दिया है.

सवाल ये कि क्या अधिग्रहण का उद्देश्य सचमुच लोकहित है? इससे विस्थापित लोगों को क्या लाभ होगा? और मुआवज़े की शक्ल और दर कैसे तय होनी चाहिए?

ये सवाल पुराने हैं. देश में जब भी विकास कार्यों के लिए किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण हुआ है, ये सवाल उठाए गए हैं.

उत्तर प्रदेश में ही भूमि-अधिग्रहण का कई बार विरोध हुआ है.

इसी साल जनवरी में इलाहाबाद के करछना में 400 करोड़ रुपए से बन रहे जेपी ग्रुप के पावर प्लांट के लिए सरकार की तरफ से ज़मीन लिए जाने के विरोध में किसान अनशन पर थे.

किसान छह महीने से अपनी ज़मीनों के लिए ज़्यादा मुआवज़े की मांग उठाने के लिए शांति प्रिय प्रदर्शन कर रहे थे.

जब पुलिस ने जबरन किसानों का अनशन तुड़वाकर उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा करना चाहा तो किसान उग्र हो गए.

किसानो के पथराव में कई पुलिस वाले घायल हुए, कई घंटों तक सड़क के अलावा रेल यातायात ठप रहा और पुलिस के साथ भिड़ंत में एक किसान की मौत हो गई.

यमुना एक्सप्रेस वे के ख़िलाफ़ अनशन

पूरे राज्य से दिल्ली में जुटकर इन किसानों ने नए कानून की मांग की.
इमेज कैप्शन, पूरे राज्य से दिल्ली में जुटकर इन किसानों ने नए कानून की मांग की.

पिछले साल अगस्त में अलीगढ़ के टप्पल में किसान यमुना एक्सप्रेस वे के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध करने के लिए धरने पर बैठे थे.

वो मुआवज़े की दर बढ़ाने की मांग कर रहे थे. उनका नेतृत्व कर रहे थे मथुरा के किसान नेता रामबाबू कठेरिया.

जब मथुरा पुलिस ने अलीगढ़ पुलिस के साथ उन्हें गिरफ़्तार किया तो धरने पर बैठे किसान भड़क गए और उन्होंने पथराव शुरु कर दिया.

पथराव, आगज़नी, आंसू गैस और फ़ायरिंग की घटनाओं में तीन किसान और एक पुलिकर्मी की मौत हो गई.

इसके बाद करीब दस हज़ार किसान दिल्ली में जुटे और भूमि अधिग्रहण के लिए नए कानून की मांग की.

क्यों बदला जाए क़ानून

भारत में लागू ज़मीन अधिग्रहण क़ानून ब्रितानी राज का है जो 1894 में बना था. उसके बाद से इसमें एक ही बार 1984 में संशोधन हुआ था.

1894 में भू-अधिग्रहण क़ानून मुख्य रूप से रेल, सड़क, हवाई अड्डा, सेना, पुलिस अथवा अन्य सरकारी और सार्वजनिक कल्याणकारी उद्देश्य की परियोजनाओं और उनसे विस्थापित होने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए बनाया गया था.

इसी क़ानून के ज़रिए सरकार किसी कंपनी अथवा सोसाइटी के लिए ज़मीन भी उपलब्ध कराती है. भूमि अधिग्रहण और मुआवज़ा तय करने का काम राज्य ज़िला कलेक्टर या सरकार ही करती है.

उस समय पुलिस और सेना के ज़रिए ज़मीनों पर कब्जा कर लिया जाता था. वही व्यवस्था आज भी चालू है.

भूमि अधिग्रहण कानून पर मेधा पाटकर से बातचीत

सरकार लंबे समय से इस क़ानून में संशोधन लाने की बात कर रही है और अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख से इस तरफ जल्द क़दम उठाने को कहा है.

हालांकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के मुताबिक़ सरकार जिस संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक पर चर्चा कर रही है उसमें भी ख़ामियां हैं.