दीदी और अम्मा ने पलट दी बाज़ी

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पश्चिम बंगाल में 34 साल से चला आ रहा वाममोर्चे का शासन ख़त्म हो गया है.
अब तक आए नतीजों और रुझान से तय हो गया है कि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने अपने सहयोगी दल कांग्रेस के साथ मिलकर भारी बहुमत हासिल कर लिया है.
वामपंथी दलों ने अपनी हार स्वीकार करते हुए विपक्ष की सकारात्मक भूमिका निभाने की बात कही है. वहीं ममता बनर्जी ने इसे लोकतंत्र और बंगाल की जनता की जीत बताया है.

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इसी तरह अधिकांश चुनावी विश्लेषणों को ग़लत साबित करते हुए जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने सत्तारुढ़ डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन का सफ़ाया कर दिया है.
असम में तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार तीसरी बार सत्तारूढ़ होने जा रही है.
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ को मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन एलडीएफ़ पर बहुत कम अंतर से जीत हासिल हुई है. 140 सदस्यीय विधानसभा में यूडीएफ़ को 72 सीटें हासिल हुई हैं जबकि एलडीएफ़ को 68 सीटें मिली हैं. यूडीएफ़ को चूंकि स्पष्ट बहुमत मिला है इसलिए अब उनकी सरकार बनना तय है.
इसके साथ ही आंध्र की कड़प्पा लोकसभा सीट और पुलिवेंदलू विधानसभा सीट पर उपचुनाव था. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी ने इस सीट से इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस के ख़िलाफ़ चुनाव लडा़ और बड़ी जीत हासिल की है.
जनगमोहन की माँ विजयलक्ष्मी ने भी कांग्रेस के ख़िलाफ़ पुलिवेंदलू विधानसभा सीट पर उपचुनाव जीत लिया है.
छत्तीसगढ़ की बस्तर लोकसभा सीट पर भाजपा आगे चल रही है.
वाममोर्चे की हार
वाममोर्चे को पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद पहली बार विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है.
ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का गठबंधन दो तिहाई से अधिक सीटों पर जीत की ओर बढ़ रहा है.
ममता बनर्जी ने इस जीत को लोकतंत्र और पश्चिम बंगाल की जनता की जीत बताया है.
सीएनएन-आईबीएन से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा है कि इन चुनावों से राज्य में लोकतंत्र की बहाली हुई है.
उन्होंने कहा, "एक राजनीतिक दल की तरह हमारी पार्टी आती-जाती रहेगी लेकिन अब राज्य में लोकतंत्र की बहाली हो गई है."
ममता बनर्जी ने कहा है कि उनकी प्राथमिकता प्रदेश में अच्छे प्रशासन की स्थापना करना है, जिसका कई दशकों से अभाव रहा है.
ममता बनर्जी अपने दम पर भी स्पष्ट बहुमत हासिल करती हुई दिख रही हैं.
पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की हार ने उनके लिए एक युग का अंत कर दिया है, जिसकी शुरुआत 1977 में ज्योति बसु के मुख्यमंत्री बनने के साथ हुई थी.
हालांकि इसके संकेत पिछली लोकसभा चुनाव के समय मिल गए थे जब वामदलों को कई अहम सीटों पर क़रारी हार का सामना करना पड़ा था.
चुनाव के थोड़े दिन पहले ही मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने स्वीकार किया था कि सीपीएम का लोगों से संपर्क कमज़ोर हो गया है.

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डीएमके गठबंधन का सफ़ाया
ज़्यादातर चुनाव विश्लेषक कह रहे थे कि तमिलनाडु में करुणानिधि की पार्टी डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन और जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके के बीच टक्कर की स्थिति है.
योगेंद्र यादव जैसे कुछ ही चुनाव विश्लेषकों ने कहा था कि इन चुनावों में जयललिता की जीत होने जा रही है.
लेकिन चुनाव परिणाम और रुझान बता रहे हैं कि तमिलनाडु में एआईएडीएम को 234 में से 200 के क़रीब सीटों पर जीत हासिल करती दिख रही हैं. डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को 33 सीटें ही मिलती दिख रही हैं.
माना जा रहा था कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले में ए राजा के जेल जाने और सीबीआई के आरोपपत्र में कनिमोड़ी का नाम आने के बाद भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा बनेगा.
लेकिन जयललिता ने 2जी स्पेक्ट्रम की जगह करुणानिधि परिवार के 45 सदस्यों की हर जगह मौजूदगी और उनके भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया.
चुनाव परिणाम बताते हैं कि डीएमके को परिवारवाद और भ्रष्टाचार का मुद्दा भारी पड़ा है.
हालांकि कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा है कि चुनाव परिणामों का कांग्रेस-डीएमके गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन चेन्नई से कई और विश्लेषक मानते हैं कि तत्काल न सही लेकिन इस गठबंधन पर चुनाव परिणामों का असर ज़रुर दिखाई पड़ेगा.
तीसरी बार सरकार

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असम में पिछले दस वर्षों से कांग्रेस का शासन है
असम में सत्तारुढ़ मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस तीसरी बार सरकार बनाने की ओर अग्रसर है.
चुनाव के दौरान कहा जा रहा था कि इस बार असम गण परिषद की स्थिति मज़बूत दिख रही है और भाजपा भी बेहतर तैयारी के साथ चुनाव में उतर रही है.
लेकिन तरुण गोगोई अधिकांश चुनावी विश्लेषण को ग़लत साबित करते हुए भारी जीत की ओर बढ़ रहे हैं.
हालांकि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी रहे हैं लेकिन लगता है कि इसने मतदाताओं को प्रभावित नहीं किया है.
आरंभिक रुझानों के बाद टेलीविज़न चैनल सीएनएन-आईबीएन से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जनता से जिस तरह की प्रतिक्रिया मिल रही थी उसे देखकर वे शुरु से ही कह रहे थे कि कांग्रेस की फिर जीत होगी.
उन्होंने कहा कि कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें स्वतंत्र रुप से काम करने की जो छूट दी है जीत में उसका बड़ा हाथ है.
यूडीएफ़ की जीत

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केरल में यूडीएफ़ को आसान जीत की उम्मीद थी, लेकिन सीपीएम के भीतर मचे घमासान के बावजूद पार्टी का चुनावी प्रदर्शन संतोषजनक रहा है और एलडीएफ़ ने 140 सीटों वाली विधानसभा में यूडीएफ़ की 72 सीटों के मुक़ाबले 68 सीटें हासिल की हैं.
आमतौर पर केरल में वामपंथी दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन एलडीएफ़ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूडीएफ़ के बीच बारी-बारी से सत्ता बँटती रही है.
इस आधार पर चुनाव विश्लेषक ये मान रहे थे कि इस बार सत्ता यूडीएफ़ के हाथों में आ जाएगी.
सत्तारुढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रही सीपीएम में अंतर्कलह और पार्टी नेतृत्व की मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के साथ चल रही खींचतान यूडीएफ़ की जीत आसान भी नज़र आ रही थी, लेकिन यूडीएफ़ को बहुत कम अंतर से एलडीएफ़ पर जीत हासिल हुई है.
































