सेना की तैनाती पर नाराज़ माओवादी

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता,रायपुर
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) नें छत्तीसगढ़ में सेना की तैनाती का विरोध किया है. माओवादियों का कहना है कि प्रशिक्षण केंद्र खोलने के बहाने सरकार जनता के ख़िलाफ़ सेना को उतार रही है.
संगठन ने इस सिलसिले में एक बयान जारी कर कहा है कि छत्तीसगढ़ में सेना की एक टुकड़ी के पहुँचने के साथ ही बस्तर के इलाक़े में भारतीय सेना की औपचारिक तैनाती की प्रक्रिया शुरू हो गई है.
दूसरी तरफ सेना नें स्पष्ट किया है कि वह बस्तर में किसी नक्सल विरोधी अभियान में हिस्सा लेने नहीं बल्कि अपना प्रशिक्षण केंद्र खोलने आई है.
हाल ही में थल सेना के लखनऊ स्थित मध्य कमान के मुख्यालय से सेना का एक 'कॉलम' यानी टुकड़ी छत्तीसगढ़ पहुँची. इस टुकड़ी में हज़ार से ज़्यादा जवान और अधिकारी हैं.
प्रशिक्षण केंद्र
सेना की छत्तीसगढ़-उड़ीसा सब-एरिया हेडक्वार्टर के कमांडिंग अफ़सर ब्रिगेडियर अमरीक सिंह ने रायपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि सेना छत्तीसगढ़ में माओवादियों से लड़ने नहीं बल्कि अपने प्रशिक्षण केंद्र खोलने आ रही है.
इससे पहले मध्य कमान के जनरल अफ़सर कमांडिंग इन चीफ़ लेफ्टिनेंट जनरल वीके अहलूवालिया ने भी छत्तीसगढ़ में अपने दौरे के क्रम में यही कहा था.
यूँ तो सेना को बस्तर के इलाक़े में बहुत पहले ही आना था. लेकिन मामला लंबित रहा था. छत्तीसगढ़ की सरकार ने सेना के प्रस्तावित केंद्र के लिए ज़मीन भी आबंटित कर दी थी.
लेकिन सेना के अधिकारी केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय से यह जानना चाह रहे थे कि अगर बस्तर में उन पर माओवादी हमला करते हैं तो वह किस तरह की जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं.
इस मुद्दे पर गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय ने गहन विचार विमर्श करते हुए बस्तर में सेना के लिए 'मार्गदर्शी सिद्धांत' तय कर दिए है.
हालाँकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये सिद्धांत क्या होंगे, लेकिन समझा जा रहा है कि इसके तहत माओवादी हमले की सूरत में सेना को अधिकार होगा कि वह जवाबी कार्रवाई करे.
सेना के जवानों को आत्मरक्षा में कार्रवाई करने की भी छूट दी गई है. सरकारी सूत्रों का कहना है कि इसके अलावा सेना को बस्तर में वो सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो उसे पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू और कश्मीर में हासिल है.
आरोप
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल ज़ोनल कमेटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने बीबीसी को जारी किए गए एक बयान में आरोप लगाया है कि देश की जनता को गुमराह करने और जनवादी ताक़तों के विरोध की वजह से ही सरकार प्रशिक्षण केंद्र का बहाना कर सेना को तैनात कर रही है.
गुड्सा उसेंडी ने बयान में कहा है, "सच्चाई यह है कि देश की जनता के ख़िलाफ़ पहले से जारी युद्ध में अब सेना को मोर्चे पर लगाया गया है. प्रशिक्षण भी यहीं युद्ध लड़ने के लिए है. कश्मीर और पूर्वात्तर इलाक़ों के बाद अब देश के बीचों-बीच, अत्यंत दबी-कुचली जनता के ख़िलाफ़ सेना का प्रयोग किया जाने वाला है. कश्मीर और पूर्वोत्तर इलाक़ों की तरह ही बस्तर में भी काला क़ानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम लागू करने की आशंका सच में बदलती नज़र आ रही है."
माओवादियों का कहना है कि आत्मरक्षा के नाम से सरकार सेना और वायु सेना को जनता पर हमला करने का अधिकार दे रही है.
संगठन का कहना है कि वर्ष 2005 से लेकर आज तक पहले सलवा जुडूम के नाम से और बाद में ऑपरेशन ग्रीनहंट के तहत बस्तर के इलाक़े में सशस्त्र बलों ने 700 से अधिक गाँवों को जला दिया, सैकड़ों महिलाएँ बलात्कार का शिकार हुई और हज़ारों आदिवासियों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा.
इस सिलसिले में माओवादियों ने कॉरपोरेट कंपनियों और सरकार के बीच हुए तमाम सहमति पत्र को रद्द करने की मांग की है.
































