'भारत लोकतांत्रिक, चीन सर्वसत्तावादी'

गूगल इंडिया

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इमेज कैप्शन, गूगल इंडिया का कहना है कि गूगल इंक से वो अलग है

इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री को लेकर आपराधिक मामले का सामना कर रही गूगल इंडिया के वकील ने दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा है कि वेबसाइट्स को ब्लॉक करना विकल्प नहीं है, क्योंकि लोकतांत्रिक भारत चीन की तरह 'सर्वसत्तावादी' नहीं.

इस मामले में गूगल के अलावा 20 और कंपनियाँ दिल्ली हाई कोर्ट में अपना पक्ष रख रही हैं. दिल्ली हाई कोर्ट में गूगल इंडिया की ओर से पेश हुए वकील एनके कौल ने कहा, "ये मुद्दा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है और इसका दमन संभव नहीं क्योंकि भारत में बोलने की आज़ादी हमें चीन जैसे सर्वसत्तावादी शासन से अलग करती है."

पिछले दिनों इस मामले पर कड़ा रुख़ अपनाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सुरेश कैत ने कहा था कि अगर ये वेबसाइट्स अश्लील और आपत्तिजनक सामग्रियों पर रोक लगाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाती, तो चीन की तरह भारत में इन्हें ब्लॉक किया जा सकता है.

अदालत की इस टिप्पणी पर ध्यान आकृष्ट करते हुए एनके कौल ने उन मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया, जिनमें अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता की बात कही गई थी.

बहस की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि इंटरनेट एक ग्लोबल सिस्टम है, जिसके अरबों उपभोक्ता हैं. इनमें कंपनियाँ, लोग, सरकार और उनके विभाग शामिल हैं.

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कोर्ट में एक प्रतिवेदन दाखिल करके उन्होंने कहा कि 'वर्जिन' जैसे शब्दों के लिए 0.33 सेकेंड में 82.30 करोड़ सर्च रिजल्ट आते हैं, इसलिए ऐसे शब्दों को ब्लॉक करने से नेट उपभोक्ताओं को ज़रूरी जानकारी नहीं मिल पाएगी.

उन्होंने कहा कि हो सकता है कि सर्च रिजल्ट में उपभोक्ता को वर्जिन एयरलाइंस से जुड़ी सामग्री की ज़रूरत हो.

निचली अदालत की ओर से जारी समन को रद्द करने की मांग करते हुए एनके कौल ने कहा कि गूगल इंडिया न तो सर्च इंजन है और न ही वेब होस्टिंग साइट है. उन्होंने कहा कि गूगल इंडिया अमरीका स्थित अपनी होल्डिंग कंपनी गूगल इंक से अलग है, जो एक सर्च इंजन है.

उन्होंने कहा कि इस आधार पर गूगल इंडिया पर कोई क़ानूनी ज़िम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती है.

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने गूगल, फ़ेसबुक सहित 21 और सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा देने के आरोप में मुक़दमा चलाए जाने की अनुमति दे दी है.

सरकार ने अदालत को बताया है कि उसके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि 21 सोशल नेटवर्किंग साइट्स विभिन्न वर्गों के बीच दुश्मनी फैलाने और राष्ट्रीय एकता को हानि पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं.