'शहरी गरीब बच्चे कमजोर, एनिमिया के शिकार'

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यूनिसेफ की एक ताजा रिपोर्ट में शहरी बच्चों की खराब हालत पर चिंता जताई गई है. रिपोर्ट के अनुसार 72 प्रतिशत गाँवों में रहने वाले बच्चे कमजोर हैं एनिमिया के शिकार हैं और 46 प्रतिशत का वजन कम है.
आठ साल की नजहत को ही ले लें जो निजामुद्दीन दरगाह के पास परिवार के साथ रहती हैं.
उसके पाँच भाई बहन हैं, और उसका दिन भर काम करते हुए बीतता है. नजहत को मिलाकर साठ लोगों ने ठंड का मौसम एक छोटे से रैनबसेरा में गुजारा है.
रैनबसेरा दिल्ली सरकार की दी हुई रहने की जगहे हैं. नजहत की माँ मेहजबीं के शरीर में जैसे जान ही नहीं है. नजहत दिखने में बेहद कमजोर है, और नाम का ही स्कूल जाती है.
जब कुछ अच्छा खाने का मन करता है तो पास ही भीख मांगने चली जाती है. नजहत उन लाखों करोड़ो भारतीय बच्चों में से एक है जो शहरों में बढ़ते गरीबों में से एक हैं.
दिल्ली में ‘चिल्ड्रेन इन ऐन अरबन वर्ल्ड’ नाम की जारी रिपोर्ट में यूनिसेफ ने कहा कि शहरों में रहने वाले गरीबों की हालत गाँवों के गरीबों से ज्यादा खराब है.
भारत में बच्चों की संख्या चीन से ज्यादा है और दुनिया भर के बच्चों की मौतों में से 20 प्रतिशत भारत में होती हैं. करीब दो दशकों से बड़ी संख्या में लोग गाँवों से शहरों की ओर आ रहे हैं लेकिन गरीबों के लिए शहरों में रहने का स्तर बेहद खराब है.
बेहतर जिंदगी की उम्मीद
शहरों में आने का कारण बेहतर जिंदगी की उम्मीद है, लेकिन यूनिसेफ आंकड़ों के मुताबिक गरीबों के लिए शहर की जिंदगी का स्तर गाँव की जिंदगी से बदतर है, और सबसे ज्यादा प्रभावित वर्ग बच्चों का है.
रिपोर्ट कहती है कि भारतीय शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या 37 करोड़ से ज्यादा है और शहरों में आने वाले 60 प्रतिशत प्रवासी गाँवों से आते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय शहरों में करीब 50,000 गंदी बस्तियाँ हैं और ऐसी बस्तियाँ भारत के पाँच राज्यों में केंद्रित हैं. ये हैं महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और गुजरात.
आंकड़े पेश करते हुए यूनिसेफ के केडी मैटी ने कहा कि बस्तियों में रहने वाला तीन में एक व्यक्ति या तो नाले या रेल लाइन के किनारे रहता है.
मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज प्रमुख डॉक्टर एस परसुरामन का कहना था कि भारत में गरीबी की वजह से कम उम्र में बच्चों की मौतें बहुत ज्यादा हैं और दलित और मुसलमान बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित वर्ग हैं.
उन्होंने कहा कि बड़े भारतीय शहरों में गरीबों के इलाके अमीरों के घरों की जरूरत पूरी करने वालों की बस्ती बनते जा रहे हैं.
यूनिसेफ ने सरकार से आग्रह किया कि वो शहरों को भी लक्ष्य बनाकर नई योजनाएँ बनाए जैसा कि वो गाँवों के मामले में करती है.
उधर सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक स्वास्थ पर कुल सरकारी खर्च को 2.5 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला किया है. अभी ये 1.4 प्रतिशत है.
प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार स्वास्थ्य मंत्रालय सभी को स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया करवाने की दिशा में काम कर रहा है.
































