आईआईटी में 12 वर्षीय सत्यम का मास्टर स्ट्रोक

सत्यम कुमार
इमेज कैप्शन, सत्यम कुमार ने सीधे आठवीं कक्षा में पढ़ाई शुरू की

बिहार के सत्यम कुमार जब अपना गाँव छोड़कर पढ़ाई के लिए राजस्थान के कोटा जा रहे थे, तो उनकी आँखों में एक सपना था. सपना अपने घर का नाम रौशन करने का.

सपना अपने चाचा और बुआ की उम्मीदों पर खरा उतरने का. लेकिन सत्यम कुमार ने अपनी उपलब्धि से न सिर्फ अपने गाँव, जिले और राज्य का नाम रौशन किया है, बल्कि देश को भी सुर्खियों में ला दिया है.

<link type="page"><caption> सत्यम कुमार से बातचीत सुनिए</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/05/120520_satyam_iv_pp.shtml" platform="highweb"/></link>

देश के साथ-साथ विदेशी मीडिया में भी सत्यम छाए हुए हैं. भारत की प्रतिष्ठित आईआईटी की परीक्षा सिर्फ 12 साल की उम्र में पास करके उन्होंने नया रिकॉर्ड बनाया है.

इससे पहले ये रिकॉर्ड दिल्ली के चहल कौशिक के नाम था, जिन्होंने 14 साल की उम्र में आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास की थी. लेकिन अब बिहार के भोजपुर जिले के बखोरापुर गाँव के सत्यम उनसे आगे निकल गए हैं.

रुचि

बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में सत्यम ने बताया कि बचपन से ही विज्ञान में उनकी रुचि थी और उनकी पढ़ाई में उनके चाचा और बुआ ने काफी मदद की.

बचपन से ही विज्ञान में रुचि रखने वाले सत्यम की प्रतिभा को उनके चाचा ने पहचाना. सत्यम अपने चाचा और बुआ की प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें मन से पढ़ते थे.

फिर उनके चाचा सत्यम को गाँव से राजस्थान के कोटा शहर लेकर आए, जो आईआईटी की तैयारी के लिए मशहूर माना जाता है.

रेजोनेंस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आरके वर्मा की पहल पर सत्यम कोटा पहुँचे. आरके वर्मा ने सत्यम की खूबियों और कमियों को पहचाना और फिर उस पर काम करना शुरू किया.

बीबीसी के साथ बातचीत में आरके वर्मा ने कहा, "सत्यम के चाचा मेरे छात्र रहे हैं. उनके चाचा ने ही मुझे सत्यम से मिलाया. मैं सत्यम से बात की और मुझे पता चला कि सत्यम को गणित, भौतिकशास्त्र और रसायन शास्त्र की कुछ-कुछ चीजें 12वीं तक की आती थी."

लेकिन आवश्यकता थी सत्यम को दिशा-निर्देश की, जो आरके वर्मा ने दी. आरके वर्मा ने सत्यम को आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक सहायता दी और फिर सत्यम की गाड़ी सही रास्ते पर निकल पड़ी.

रेजोनेंस का सहयोग

सत्यम बताते हैं, "पहले मेरे चाचा यहाँ आए थे. रेजोनेंस के सीईओ आरके वर्मा से मिलकर उन्होंने मेरे बारे में बताया था. कोटा आने के बाद आरके सर ने मुझे हर तरह से मदद की. आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से भी."

लेकिन समस्या ये थी कि सत्यम किसी स्कूल में गए नहीं थे. गाँव के सरकारी स्कूल का माहौल अच्छा नहीं था, इसलिए सत्यम घर में ही अपने चाचा और बुआ की किताबें पढ़ते रहते थे.

सत्यम कहते हैं, "मेरे गाँव में स्कूल तो है, लेकिन जैसे हर गाँव में होता है सरकारी स्कूल. वहाँ अच्छी पढ़ाई नहीं होती. वहाँ माहौल उतना अच्छा नहीं है. मेरी बुआजी और चाचा प्रतियोगिता दर्पण लाते थे, वो सब पढ़ता था. चाचा इंजीनियरिंग की तैयारी करते थे, तो मैं उनकी किताबें पढ़ा करता था."

सत्यम को स्कूली पढ़ाई जारी रखने में आरके वर्मा ने मदद की और राजस्थान के शिक्षा बोर्ड ने इसकी अनुमति दी कि सत्यम को सीधे आठवीं कक्षा में दाखिला मिले.

इसके बाद सत्यम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने 10वीं, फिर 12वीं बोर्ड की परीक्षा पास की और इस साल आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठे. सत्यम ने इस परीक्षा को पास करके नया रिकॉर्ड तो बनाया है, लेकिन वे अपनी रैंकिंग से संतुष्ट नहीं हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि वे इस बार किसी संस्थान में नामांकन नहीं लेंगे. सत्यम अगली बार फिर आईआईटी की परीक्षा देंगे और उन्हें उम्मीद है कि उनकी रैंकिंग और बेहतर होगी.

फेसबुक और लिट्टी-चोखा

आगे चलकर सत्यम फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट बनाना चाहते हैं. सत्यम कहते हैं, "मैं फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट विकसित करना चाहता हूँ. मैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के माध्यम से सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी जाना चाहते हैं."

सत्यम को फुटबॉल, क्रिकेट और बैडमिंटन पसंद हैं. लेकिन क्रिकेट में वे किसी भारतीय क्रिकेटर को नहीं बल्कि क्रिस गेल को पसंद करते हैं और फुटबॉल में उनके फेवरिट हैं डिएगो माराडोना.

सत्यम को फिल्में देखना पसंद है, लेकिन ज्यादा नहीं. उन्हें पुरानी फिल्में पसंद है. राजनीति पर ज्यादा नजर तो नहीं रख पाते, लेकिन चुनाव होते हैं तो वे नजर रखते हैं.

सत्यम बिहार की मौजूदा नीतीश सरकार को अच्छा मानते हैं. खाने की बात आई, तो बिहार के ज्यादातर लोगों की तरह उन्हें भी लिट्टी चोखा खाना बेहद पसंद हैं. जब इसकी वजह पूछी गई, तो उन्होंने बड़े भोलेपन से कहा- घर में बनता रहता है, तो वे खाते रहते हैं.