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कौन है जापान का धार्मिक नेता, जिसे फांसी दी गई
हज़ारों अनुयायियों वाला वह एक ऐसा धार्मिक नेता था, जो अपने संप्रदाय का संस्थापक था और जिसने जापान के सबसे भयावह चरमपंथी हमलों की योजना बनाई थी.
ओम शिनरीक्यो संप्रदाय के नेता 63 वर्षीय शोको असाहारा को जापानी प्रशासन ने शुक्रवार को फांसी दे दी. 1995 के टोक्यो अंडरग्राउंड नर्व गैस हमले के केस में साल 2004 में उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई थी.
इस हमले को जापान में घरेलू आतंकवाद की सबसे भयावह घटना माना जाता है. इसमें 13 लोगों की मौत हो गई थी और हज़ार से ज़्यादा लोग बीमार और लाचार हो गए थे.
मुख्य कैबिनेट सचिव योशिहिदे सुगा ने शोको असाहारा को शुक्रवार सुबह फांसी दिए जाने की पुष्टि की है. जापानी मीडिया के मुताबिक, ओम शिनरीक्यो से जुड़े छह अन्य सदस्यों को भी फांसी दी गई है.
सभी अभियुक्तों की आख़िरी अपील पर सुनवाई पूरी होने तक इन दोषियों की फांसी रोक दी गई थी. इस संप्रदाय के छह और सदस्यों को अभी फांसी दी जानी है.
क्या है ओम शिनरीक्यो संप्रदाय?
शोको असाहारा का असल नाम चिज़ुओ मात्सुमोतो था. 1955 में क्यूशू द्वीप में उनका जन्म हुआ, बाद में नाम बदलकर उन्होंने अपना धार्मिक साम्राज्य बनाना शुरू किया.
असाहारा शुरू में योग शिक्षक के तौर पर काम करते थे और कम उम्र में ही उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी.
साल 1980 में हिंदू और बौद्ध मान्यताओं के मिश्रण के तौर पर एक आध्यात्मिक समूह के रूप में उन्होंने ओम शिनरीक्यो संप्रदाय शुरू किया. बाद में सर्वनाश से जुड़ी भविष्यवाणी का ईसाई विचार इसमें शामिल हुआ. ओम शिनरीक्यो का शाब्दिक अर्थ है 'सर्वोच्च सत्य'.
शोको असाहारा ने ख़ुद को ईसा और बुद्ध के बाद दूसरा बुद्ध घोषित किया था.
1989 में इस समूह को एक धार्मिक संस्था के तौर पर औपचारिक मान्यता मिल गई. अपनी लोकप्रियता के समय असाहारा के दसियों हज़ार अनुयायी थे.
समूह ने बाद में यह भी कहा कि एक विश्व युद्ध में समूची दुनिया ख़त्म होने वाली है और केवल उनके संप्रदाय के लोग ही जीवित बचेंगे.
1995 हमले के बाद संप्रदाय भूमिगत हो गया, लेकिन ग़ायब नहीं हुआ. नाम बदलकर उसने दो संगठनों का रूप ले लिया- एलेफ और हिकारी नो वा.
ओम शिनरीक्यो को अमरीका समेत कई देश आतंकवादी संगठन मानते हैं. हालांकि जापान में एलेफ और हिकारी नो वा दोनों संगठनों को वैधता प्राप्त है. हालांकि उन्हें 'ख़तरनाक धर्म' की श्रेणी में रखा गया है, जिनकी निगरानी ज़रूरी मानी गई है.
अब भी इसके जापान और बाक़ी दुनिया में इनके अनुयायी हैं. ख़ास तौर से, रूस और उसके आस-पास के देशों में. 2016 में रूस में संप्रदाय के संदिग्ध सदस्यों की तलाश में पुलिस ने मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में छापे मारे थे.
टोक्यो हमला क्या था?
20 मार्च 1995 को ओम शिनरीक्यो संप्रदाय के सदस्यों ने टोक्यो के एक सब-वे में सारिन नामक ज़हरीली गैस से हमला किया था. उन्होंने लिक्विड नर्व एजेंट से भरे बैगों में छेद करके उन्हें ट्रेन लाइन पर छोड़ दिया था.
कुछ ही देर बाद वहां लोगों की आंखों में तेज़ जलन होने लगी. इस ज़हर ने कई लोगों को चंद सेकेंडों में ढेर कर दिया. उनका दम घुटने लगा, उल्टियां होने लगीं, कुछ अंधे हो गए और कुछ लकवे के शिकार हो गए. कुल 13 लोगों की मौत हो गई.
इसके बाद इस संप्रदाय ने कई स्टेशनों पर हाइड्रोजन सायनाइड से हमले करने की नाकाम कोशिशें की.
अपने यहां अपराध की नियंत्रित दर पर गर्व करने वाले जापान को इस हमले ने हिलाकर रख दिया. संप्रदाय के सदस्य गिरफ्तार किए गए, उन पर मुक़दमा चला और 13 अभियुक्तों को फांसी की सज़ा सुनाई गई. इनमें असाहारा भी थे. छह अभियुक्त उम्रक़ैद काट रहे हैं.
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