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ख़ामेनेई की मौत के बाद कैसे चल रहा है ईरान का शासन, कब तक टिक पाएगी मौजूदा सरकार?
- Author, अमीर अज़ीमी
- पदनाम, न्यूज़ एडिटर, बीबीसी फारसी
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
अमेरिका–इसराइल के संयुक्त हमलों की पहली लहर में अली ख़ामेनेई की हत्या ने इस्लामिक गणराज्य ईरान को 1979 के बाद सबसे निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है.
इस अभियान में ईरान के वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक नेताओं को निशाना बनाया गया.
अमेरिका ने दावा किया कि इससे ईरान की सत्ता का ढांचा कमज़ोर हो गया है.
शनिवार शाम तक ख़ामेनेई की मौत की ख़बरें व्यापक रूप से फैल चुकी थीं, जिसके बाद ईरान से ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिनकी कुछ दिन पहले तक कल्पना करना भी मुश्किल था.
वीडियो में ईरान के कई शहरों में जश्न और खुशी मनाते लोग भी दिखे. विदेश में बसे ईरानी समाज के बड़े तबकों के बीच से भी ऐसे ही दृश्य देखे गए.
कई लोगों के लिए इस्लामिक गणराज्य के नेता का हटना एक ऐतिहासिक मोड़ था.
सालों के नागरिक प्रतिरोध के बाद भी ख़ामेनेई को हटाया नहीं जा सका था.
हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति और इसराइली प्रधानमंत्री ने अपने सार्वजनिक बयानों में बेहद सख्त भाषा का इस्तेमाल किया.
डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानियों से इस मौके का फायदा उठाकर "अपनी सरकार वापस लेने" की अपील की. इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने भी यही बात दोहराते हुए कहा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन 'ना सिर्फ़ ज़रूरी है बल्कि मुमकिन भी है.'
अमेरिका ने अपने सैन्य अभियान को "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" नाम दिया है. इसे लेकर अमेरिका बिलकुल साफ़ और निश्चित है लेकिन ईरानी जनता को दिया गया राजनीतिक संदेश कहीं ज़्यादा अनिश्चित है.
रविवार सुबह ईरानी सरकारी टेलीविज़न ने आधिकारिक रूप से अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि की और तुरंत कार्यकारी शक्तियाँ संभालने के लिए तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद के गठन की घोषणा की.
सरकार ने फ़ौरन क़दम उठाते हुए ये संदेश देने की कोशिश की कि देश में स्थिरता है.
संभावित उत्तराधिकारियों को लेकर अटकलें तेज़
संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए और अस्थायी शासन व्यवस्था को सक्रिय कर, अधिकारी यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि सर्वोच्च पद के खाली होने के बावजूद व्यवस्था कायम है.
अब संभावित उत्तराधिकारियों को लेकर अटकलें तेज़ हो गई हैं.
ईरान में संभावित उम्मीदवारों को पहले से सार्वजनिक रूप से सामने लाना आम नहीं है, और यह प्रक्रिया आमतौर पर बंद दरवाज़ों के पीछे चलती है.
हालांकि, कहा जाता है कि सर्वोच्च नेता चुनने के लिए बनी असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नामों की समीक्षा और उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने की ज़िम्मेदार होती है.
ये समिति चयन प्रक्रिया के आधिकारिक तौर पर शुरू होने के बाद सदन के सामने एक संक्षिप्त सूची पेश कर सकती है.
बैठकें बंद दरवाज़ों के पीछे होती हैं और मतदान सार्वजनिक नहीं होता, जिससे बाहरी तौर पर इस प्रक्रिया को मॉनिटर करने का ज़्यादा स्कोप नहीं होता.
हाल के वर्षों में यह अटकलें लगाई जाती रही हैं कि ख़ामेनेई के बड़े बेटे, मोजतबा, राष्ट्रपति पद के लिए सामने आ सकते हैं.
लेकिन हालिया हमलों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के उनके कई विश्वस्त कमांडरों के मारे जाने की ख़बरों के बाद आंतरिक शक्ति संतुलन बदल सकता है.
पिछली संसद के इतिहास से यह भी संकेत मिलता है कि जब ख़ुद ख़ामेनेई नेतृत्व में आए थे, तब उन्हें व्यापक रूप से मुख्य विकल्प नहीं माना जाता था.
जिससे संकेत ये भी मिलते हैं कि अंतिम परिणाम उम्मीदों के विपरीत भी हो सकता है.
चयन प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ सकती है और संभव है कि कुछ ही दिनों में पूरी हो जाए.
बैकफ़ुट पर ईरानी सरकार
हालाँकि सैन्य दृष्टिकोण से ईरान को भारी झटका लगा है.
उसके कई ठिकाने अभी भी ख़तरे में हैं और अमेरिका-इसराइल का हवाई अभियान भी जारी है.
लोगों में असुरक्षा की भावना है. कई सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा है. सत्ता के शीर्ष पर खालीपन है और निर्णय-प्रक्रिया आपातकालीन स्थिति में सिमट गई है.
फिर भी, ईरान ने जवाबी कार्रवाई की क्षमता दिखाई है.
हमलों के पहले दो दिनों में ईरानी बलों ने कई अरब देशों में अमेरिकी ठिकानों और इसराइल के लक्ष्यों पर हमला किया.
पहली बार मिसाइलें दुबई के नागरिक ठिकानों और कुवैत के एक नागरिक हवाई अड्डे पर गिरीं, जिससे संघर्ष का दायरा काफी बढ़ गया.
ये सब दिखाता है कि अपने नेताओं को खोने के बावजूद ईरान के पास अभी भी सैन्य ताक़त है और उसका इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति भी मौजूद है.
अब क्षेत्र में संघर्ष के और बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है.
ईरानी नेतृत्व के दृष्टिकोण से, यदि युद्ध का दायरा फैलता है और मध्य पूर्व में उसके सहयोगी मिलिशिया समूह लड़ाई में शामिल होते हैं, तो ईरान युद्धविराम के लिए दबाव बना सकता है या कम से कम अमेरिका और इसराइल की थोपी गई शर्तों पर पूर्ण समर्पण से बचने के लिए छूट पा सकता है क्योंकि अमेरिका भी इस संघर्ष को लंबा खींचना नहीं चाहेगा.
दूसरी ओर, लगातार सैन्य दबाव और सत्ता के ख़िलाफ़ व्यापक विरोध प्रदर्शन अगर फिर से उभरते हैं तो ये इस्लामिक गणराज्य को पतन की ओर धकेल सकते हैं.
अंदरूनी मतभेद का ख़तरा
यदि सुरक्षा और सैन्य बलों के कुछ हिस्सों में मतभेद होते हैं या वो लीडरशिप के आदेशों का पालन करने से इनकार करते हैं, तो ईरान का मौजूदा शासन और भी ख़तरे में पड़ सकता है.
आने वाले दिन दिखाएंगे कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और देश की अन्य सुरक्षा और सैन्य संस्थाएं अपने लंबे समय तक रहे नेता की गैर मौजूदगी में एकजुट रह पाती हैं या नहीं.
फिलहाल सभी तरह की स्थितियां संभव हैं.
इन हमलों के बाद इस्लामिक गणराज्य पहले की तुलना में कमज़ोर स्थिति में दिखाई देता है.
अपने सर्वोच्च नेता से वंचित, प्रमुख कमांडरों को खो चुका और लगातार सैन्य दबाव वाला देश.
फिर भी उसके पास संस्थागत ढांचा, सशस्त्र बल और जवाबी क्षमता मौजूद है, जो सत्ता परिवर्तन के किसी भी सरल रास्ते को जटिल बनाती है.
अली ख़ामेनेई की मौत ने ईरान को अस्थिर और अनिश्चित दौर में पहुंचा दिया है.
अब आगे क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरान लगातार हवाई हमलों के बीच आंतरिक नियंत्रण बनाए रख पाता है या नहीं, क्या विरोध प्रदर्शन फिर से गति पकड़ते हैं, और यह संघर्ष क्षेत्र में कितनी दूर तक फैलता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.