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क्या 'इस्लामी ख़िलाफ़त' का सपना हक़ीक़त में मुमकिन है?
- Author, मेहरान मोवहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) से
इस्लाम की बात करने वाले संगठन, यहाँ तक कि जिहादी सलफ़ी समूह (अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन) के उदय का गहरा और सीधा संबंध इस्लामी ख़िलाफ़त के मुद्दे से है.
ये और इस तरह के दूसरे कई संगठन इस्लामी ख़िलाफ़त, यानी तुर्की के उस्मानी साम्राज्य के पतन को एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में देखते हैं.
उन्हें लगता है कि इस घटना के बाद मुस्लिम समाज पूरी दुनिया में निर्बल और बदहाल हो गया.
इसी कारण इन तमाम संगठनों ने इस्लामी ख़िलाफ़त की पुनर्स्थापना को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया है.
उनका मानना है कि ख़िलाफ़त की स्थापना के साथ मुसलमान अपने खोए हुए सुनहरे दिन फिर से हासिल कर लेंगे.
इन संगठनों में अफ़ग़ानिस्तान में उभर रहा इख़्वानुल मुसलेमीन सब से अधिक सक्रिय और अहम है क्योंकि इस तरह के दूसरे संगठन जैसे हिज़बुत तहरीर और सलफ़ी आंदोलन इख़्वानुल मुसलेमीन को ही अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं.
साठ के दशक में...
19वीं सदी के 60 के दशक में सैय्यद क़ुतुब शहीद के धार्मिक लेखों के प्रचार प्रसार के साथ साथ इख़्वान के अंदर कुछ ऐसे समूहों का उदय हुआ जो बाद में सैय्य क़ुतुब की विचारधारा के अनुयायी हो गए.
सैय्यद क़ुतुब को ही ये लोग अपना आदर्श मानने लगे. उस दौर में ऐसे गुटों का विस्तार भी काफ़ी हुआ.
ये लोग सैय्यद क़ुतुब की विचारधारा के अनुसार तत्कालीन इस्लामी समाज को अज्ञानी, पथभ्रष्ट मानते थे और उनका कहना था कि दोबारा मूल इस्लाम की ओर लौटना पड़ेगा जिसके लिए इस्लामी ख़िलाफ़त की पुनर्स्थापना ही एक मात्र रास्ता है.
जब मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने सैय्यद क़ुतुब और कई दूसरे लोगों की एक साथ हत्या कर दी तो इख़्वान के अंदर उनकी अतिवादी विचारधारा के मानने वाले बढ़ गए और इख़्वान के अंदर ही मध्यम मार्ग वाले विचार के लोग कमज़ोर पड़ गए.
इसी तरह अल-क़ायदा और ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले संगठन भी सैय्यद क़ुतुब के विचार से बहुत प्रभावित हैं.
इस तमाम बहस के बाद अब सवाल ये पैदा होता है कि क्या समकालीन हालात में इस्लामी ख़िलाफ़त (जिसे कभी-कभी इस्लामी हुकूमत भी कहते हैं) की फिर से स्थापना संभव है?
'इस्लामी ख़िलाफ़त' का आकर्षण
हक़ीक़त तो ये है कि इस्लामी ख़िलाफ़त का सपना बहुत ही मीठा और आकर्षण भरा है.
अभी तक इस सपने ने बहुत से मुसलमान नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित भी किया है.
इस्लामवादी तत्व इस नतीजे पर पहुंच गए लगते हैं कि अगर इस्लामी ख़िलाफ़त का झंडा लेकर आगे बढ़ें तो लोगों को अपने साथ ला सकेंगे और समाज में प्रभाव भी फैला सकेंगे.
इस्लामवादी विचारक अपने इस विचार का ख़ूब प्रचार प्रसार कर रहे हैं कि 'ख़िलाफ़त' मूल इस्लाम है और इसका विरोध करने वाले इस्लाम से दग़ा करने वाले हैं और इस्लाम के दुश्मन हैं.
साथ ही ये इस्लामवादी विचारक ये भी कहते हैं कि इस्लाम का 'स्वर्ण युग' और उसका दबदबा ख़िलाफ़त के कारण ही था और आज के मुसलमानों का पिछड़ापन ख़िलाफ़त नहीं रहने के कारण ही है.
'इस्लामी एकता'
इन विचारकों का ये भी मत है कि इस्लामी ख़िलाफ़त से पहले इस्लामी एकता हासिल करना ज़रूरी है.
वे मानते हैं कि इस्लामी दुनिया की भौगोलिक और सांस्कृतिक भिन्नता में एकता ही इस्लाम की शक्ति है और इसी पर इस्लामी साम्राज्य की मज़बूती है.
इस्लामी ख़िलाफ़त के पक्षधर ये भी मानते हैं कि ख़िलाफ़त ही के कारण मुसलमानों ने क्रूसेड्स ( 10 से 12वीं सदी में मुसलमानों और ईसाइयों के बीच हुई लड़ाई) में पश्चिम की शक्ति को पराजित किया था और खोए हुए अपने भू-भाग को दोबारा हासिल किया था.
और अगर अब भी चाहें तो इस्लामी ख़िलाफ़त की दोबारा बहाली कर के पश्चिम के वर्चस्व से बाहर आ सकते हैं.
लेकिन 'इस्लामी ख़िलाफ़त' के सपने का साकार होना संभव नहीं है.
आधुनिक राष्ट्र-राज्य
आज की वास्तविक परिस्थिति से ये ज़ाहिर है कि इस्लामी ख़िलाफ़त की दोबारा बहाली संभव नहीं है और जो लोग इस कोशिश में लगे हैं, वे हवा में सोचते हैं.
आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के साथ, राज्य की स्थापना के मापदंड में भी बदलाव आया है. इसमें सबसे अहम है कि राज्य के पास एक निश्चित भू-भाग हो लेकिन वहीं धर्म बहुत कम महत्व का रह गया है.
समकालीन समाज का ताना बाना पुराने ज़माने के समाज की रूपरेखा से पूरी तरह से अलग है. इसलिए जो इस ख्याल में रहते हैं कि इस्लामी साम्राज्य की दोबारा स्थापना होगी, वो अतीत में जी रहे हैं.
मुस्लिम जगत की समस्याएं
आज अंतरराष्ट्रीय संबंध आपसी लाभ पर आधारित हैं न कि धार्मिक निष्ठा और भावना पर.
एक महत्वपुर्ण बिंदु ये भी है कि आज का मुस्लिम जगत अलग-अलग मतों को मानने वालों और समूहों में बंटा हुआ है.
और अगर इनके बीच एकरूपता थोपी जाएगी तो आपस में युद्ध की आग भड़क सकती है जिससे मुस्लिम जगत की समस्याएं और बढ़ेंगी.
एक और महत्वपूर्ण दिक़्क़त ये है कि इस्लामी ख़िलाफ़त के विचारकों और समर्थकों में भी वैचारिक एकता नहीं है.
एक समूह का मत है कि इस्लामी ख़िलाफ़त का उद्देश्य जिहाद, युद्ध और काफ़िरों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना है, जबकि दूसरे समूह का मानना है कि इस्लामी ख़िलाफ़त के अंदर केवल इस्लामी क़ानून का लागू करना भर उद्देश्य है.
सियासी आज़ादी की ज़मानत
इतना ही नहीं एक ऐसा भी समूह है जो चाहता है कि इस्लामी ख़िलाफ़त एक ऐसी हुकूमत क़ायम करेगी जो सियासी आज़ादी की ज़मानत भी देगी और व्यक्ति की आज़ादी का भी सम्मान करेगी.
'इस्लामी ख़िलाफ़त' के परिभाषा में जो मतभेद हैं, उसका कारण ये है कि इसके विचारक अब तक इस्लामी राज्य के संचालन पर कोई ठोस विचार नहीं दे पाए हैं.
कुछ इस्लामी विद्वान और विचारक ये मानते हैं कि 'ख़िलाफ़त' एक थियोक्रेटिक राज्य (धर्माधरित राज्य) होगा.
लेकिन सच ये है कि ख़िलाफ़त का राज्य संचालन का ढांचा खोखला नज़र आ रहा है और यह आज के सामाजिक हालात से मेल नहीं खाता है.
और इसी कारण बीते ज़माने में भी इस्लामी राज्य उथल-पुथल के शिकार रहे हैं.
ख़िलाफ़त का सपना
इस्लामी राज्य या ख़िलाफ़त एक ही सूरत में सफल हो सकता है कि पूरे ख़िलाफ़त में एक ही शासक हो, कोइ सीमा न हो, भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता हो, जो आज के ज़माने में संभव ही नहीं है.
इस्लामी ख़िलाफ़त का ख़्वाब देखने वालों को अगर एक तरफ़ रख दें और देखें तो इस्लामी ख़िलाफ़त के दौरान मुसलमानों के बीच कभी भी एकता रही ही नहीं.
वे अक्सर आपस में लड़ते रहे, ख़िलाफ़त कभी भी उन को एकजुट कर ही नहीं पाया, और इसी कारण बाहरी दुश्मन का भय दिखा कर उनको एकजुट करने की कोशिश करनी पड़ती थी.
इस्लामी ख़िलाफ़त के पक्षधर अब तक क्या हासिल कर पाए हैं?
इस्लामवादी सगठनों के अनेकों सदस्यों ने पिछले कई दशकों में खासकर उस्मानी ख़िलाफ़त के पतन के बाद ख़िलाफ़त की दोबारा स्थापना के अपने मक़सद में जान गंवाई है.
निरंकुश तानाशाही
मगर ये क़ुर्बानी और ये कोशिश सही दिशा में नहीं थी, न केवल ये कि ये लोग अपनी कोशिश में नाकाम रहे बल्कि इन्होंने अतिवादी सोच को बढ़ावा दिया.
इससे इस्लामी जगत को फ़ायदे के बजाय बहुत नुक़सान उठाना पड़ा और मुस्लिम जगत को घायल और लहूलुहान कर दिया.
उदाहरण के तौर पर अफ़ग़ानिस्तान में इख़्वानुल मुसलेमीन की पिछले 90 साल की कोशिश का यह नतीजा निकला कि इस क्षेत्र में दमनकारी निरंकुश तानाशाही को आगे बढ़ने का मौक़ा मिला.
ये तानाशाह पश्चिमी दुनिया को ये यक़ीन दिलाने में सफल रहे कि अगर इन धर्मांध लोगों को हम नहीं रोक पाए और हमारी सहायता नहीं की गई तो ये उसी प्रकार का समाज खड़ा करेंगे जैसा समाज यूरोप में फ्रांस की क्रांति (1789) से पहले था.
ये एक ऐसे समाज की स्थापना करने की बात करते हैं जो विकास और आधुनिकता का घोर विरोधी है.
इंसान की आज़ादी
अगर इस्लामवादी ताक़तें अब भी चाहें तो बदलाव और विकास में अपना योगदान दे सकती हैं.
इनके लिए बेहतर ये है कि पुराने घिसेपिटे समाज को दोबारा ज़िंदा न कर, एक नए, सभ्य और आधुनिक समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं.
एक ऐसे सियासी निज़ाम के लिए कोशिश करें जो लोगों की आकांक्षाओं और उम्मीदों पर आधारित हो, जहां इंसान की आज़ादी की क़दर हो.
इस्लामवादियों को अपने अतीत से सबक़ सीखते हुए ये मान लेना चाहिए कि कोई भी राजनीतिक ढांचा कमियों से ख़ाली नही है और ख़िलाफ़त का निज़ाम तो आज की परिस्थिति में क़तई कामयाब नहीं हो सकता है.
इस्लामवादियों के प्रचार के अतिरिक्त इस्लामी ख़िलाफ़त का कोई ठोस प्रमाण इस्लामी ग्रंथों या इतिहास में नहीं मिलता है.
बल्कि धर्मभ्रष्ट मुस्लिम हुकमरानों के कारनामों को वाजिब ठहराने के लिए उनके दरबारी उलेमाओं ने इस तरह से व्याख्या की कि उसे ख़िलाफ़त का रंग दिया जा सके और निरंकुश शासन को बनाए रखा जा सके.
कुछ ऐसे भी इस्लामवादी हैं जो इस्लाम के इतिहास को ही असली इस्लाम मानते हैं, ऐसा करके वे लोग असल में इस्लाम के पथ से विमुख हो गए हैं.
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