तीस हज़ार रेप पीड़ितों का इलाज करने वाले डॉक्टर को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

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साल 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार कांगो में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर डेनिस मुकवेगे और यज़ीदी महिला अधिकार कार्यकर्ता नादिया मुराद को दिया गया है.
डेनिस मुकवेगे डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में कार्यरत एक स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं.
उन्होंने और उनके सहकर्मियों ने तीस हज़ार से अधिक बलात्कार पीड़ितों का इलाज किया है और गंभीर यौन हिंसा की शिकार महिलाओं के इलाज में उन्होंने विशेषज्ञता हासिल की है.
उनकी कहानी बलात्कार के युद्ध में हथियार के तौर पर इस्तेमाल का भी विस्तृत विवरण देती है.
पढ़िए डेनिस मुकवेगो की बीबीसी पर मूलरूप से 2013 में प्रकाशित हुई कहानी-
जब युद्ध छिड़ा, पूर्वी डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कागों के लेमेरा स्थित मेरे अस्पताल में 35 मरीज़ों की मौत हो गई.
मैं बुकावू भाग आया और यहां मैंने टेंट में अस्पताल शुरू किया. मैंने प्रसूति गृह शुरू किया जिसमें ऑपरेशन थिएटर भी था.
लेकिन 1998 में फिर से सबकुछ तबाह हो गया. मुझे साल 1999 में सबकुछ फिर से शुरू करना पड़ा.
इस साल पहली बलात्कार पीड़ित हमारे अस्पताल आई. बलात्कार करने के बाद उस महिला के जननांगों और जांघों पर गोलियां मारी गई थीं.
मुझे लगा ये युद्ध में किया गया एक बर्बर कृत्य है. लेकिन असली झटका तीन महीने बाद लगा. उस महिला की ही तरह 45 और पीड़ित महिलाएं हमारे पास आईं. उनकी कहानी भी ऐसी ही थी. उन सबने यही बताया, "लोग हमारे गांव में घुसे, बलात्कार किया और हमें यातनाएं दीं."
बलात्कार की रणनीति

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कई महिलाएं ऐसी भी आईं जिनके शरीर जले हुए थे. उन्होंने बताया कि बलात्कार के बाद उनके जननांगों में रसायन डाल दिए गए थे.
मैं अपने आप से सवाल पूछने लगा था कि आख़िर ये सब हो क्या रहा है. ये सिर्फ़ युद्ध में किए गए हिंसक कृत्य नहीं थे, बल्कि किसी रणनीति का हिस्सा थे.
कई बार महिलाओं का समूहों में सार्वजनिक बलात्कार किया जाता. एक रात के भीतर ही पूरे गांव की महिलाओं का बलात्कार हो जाता.
ऐसा करके वो सिर्फ़ महिलाओं को ही नहीं बल्कि समूचे समुदाय को चोट पहुंचा रहे थे. पुरुषों को बलात्कार देखने के लिए मजबूर किया जाता था.
इस रणनीति का नतीजा ये हुआ कि लोग अपने गांव छोड़कर भागने लगे, उन्होंने अपनी ज़मीनें छोड़ दीं, अपना संसाधन और बाकी सबकुछ छोड़ दिया. ये एक प्रभावशाली रणनीति थी.
कई स्तर पर करना होता है इलाज
हम महिलाओं का इलाज कई चरणों में करते हैं. ऑपरेशन करने से पहले हम उनका मनोवैज्ञानकि परीक्षण करते हैं. इससे हम ये जानते हैं कि वो सर्जरी के दौरान होने वाली पीड़ा को सहन कर पाएंगी या नहीं.
इसके बाद हम अगले चरण में आते जिसमें महिलाओं का ऑपरेशन किया जाता या फिर चिकित्सकीय देखभाल की जाती. इसके बाद महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक रूप से देखभाल की जाती.
अधिकतर महिलाएं जो हमारे पास आती हैं उनके पास कुछ भी नहीं होता. कई बार तो उनके पास पहनने के कपड़े तक नहीं होते.

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हमें उन्हें खाना खिलाना पड़ता, उनकी देखभाल करनी पड़ती. अस्पताल से छुट्टी के बाद अगर वो जीवन को आगे बढ़ान में सक्षम नहीं होतीं तो उन पर फिर से ख़तरा होता. इसलिए हमें उनकी सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी मदद करनी होती- उदाहरण के तौर पर हम महिलाओं को नई स्किल्स सीखने में मदद करते और लड़कियों की वापस पढ़ाई शुरू करने में मदद करते.
और सबसे आख़िर में हम उन्हें क़ानूनी मदद मुहैया कराने की कोशिश करते हैं. कई बार पीड़ित महिलाएं अपने हमलावरों को पहचानती हैं. हम अदालती कार्रवाई में उनकी मदद करते हैं.
साल 2011 में हमारे पास आने वाले मामलों की संख्या में गिरावट आई. हमें लगा कि हम कांगों में महिलाओं के लिए इस बेहद ख़तरनाक और दर्दनाक स्थिति के अंत की ओर बढ़ रहे हैं. लेकिन अगले ही साल युद्ध फिर से शुरू हो गया और ऐसे मामलों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई.
महिलाओं से बलात्कार की ये घटनाएं सीधे तौर पर युद्ध से जुड़ी हुई हैं.
जानलेवा हमला

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कांगो में चल रहा युद्ध कुछ धर्मांध समूहों के बीच की लड़ाई नहीं है. न ही ये किन्हीं दो प्रांतों या देशों के बीच की लड़ाई है. ये युद्ध आर्थिक वजहों से चल रहा है और इस युद्ध में कांगो की महिलाएं बर्बाद हो रही हैं.
एक बार जब मैं विदेशी यात्रा से वापस लौट रहा था तब मैंने देखा पांच लोग मेरा इंतज़ार कर रहे हैं. उनमें से चार के पास एके-47 और एक के पास पिस्टल थी.
वो मेरी गाड़ी में घुस गए और मुझ पर बंदूकें तान दीं. उन्होंने मुझे गाड़ी से उतारा, मेरे गार्ड ने मेरा बचाव करने की कोशिश की. उसे गोली मार दी गई. उसकी वहीं मौत हो गई.
मैं नीचे गिर गया. हमलावर गोलियां चलाते रहे. मुझे नहीं मालूम मैं बचा कैसे.
फिर वो मेरी गाड़ी लेकर भाग गए. उन्होंने कुछ और नहीं छीना.

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बाद में मुझे पता चला कि मेरी दो बेटियां और भतीजी घर में ही थीं. हमलावर जब मेरा इंतेज़ार कर रहे थे, वो वहीं थीं. उन्होंने उन पर भी बंदूकें तानी थीं. ये बहुत भयावह था.
मैंने हमलावरों को कुछ देर के लिए ही देखा था और मैं उन्हें पहचान नहीं सकता था. मैं ये भी नहीं कह सकता कि उन्होंने मुझ पर हमला क्यों किया. इसका जवाब वो ही जानते हैं.
हमले के बाद मैं अपने परिवार के साथ स्वीडन चला गया, और फिर वहां से ब्रसल्स.
वतन वापसी
लेकिन साल 2013 में मैं फिर से अपने देश लौट आया.
कांगो की महिलाओं की इस शोषण के खिलाफ़ लड़ने की हिम्मत ने मुझे वापस लौटने के लिए प्रेरित किया.
मुझ पर हुए हमले के बाद महिलाओं ने सरकार के सामने प्रदर्शन किए थे. उन्होंने घर वापसी के लिए मेरे टिकट के पैसे इकट्ठा किए थे. ये वो महिलाएं थी जिनके पास अपना कुछ भी नहीं था. वो ग़रीबी के सबसे निचले पायदान पर रहती हैं. ख़र्च करने के लिए उनके पास एक डॉलर भी नहीं होता.

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महिलाओं की इस कोशिश के बाद मैं लौटने के लिए ना कह ही नहीं सकता था. सच तो ये है कि मैं स्वयं भी इस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ते रहना चाहता था.
लौटने के बाद मेरा जीवन बदल गया. मुझे अस्पताल में ही रहना पड़ा और सुरक्षा लेनी पड़ी. बीस स्वयंसेवी महिलाओं का समूह बारी-बारी से मेरी निगरानी में लगा रहता.
उनके पास न हथियार थे न ही कुछ और.
लेकिन उनके साथ होने से मुझे सुरक्षा का गहरा भाव महसूस हुआ. मैं उन महिलाओं के साथ था जिनके लिए मैं काम कर रहा था.
उन महिलाओं ने ही मुझे अपना काम जारी रखने की प्रेरणा दी है और मैं अपना काम कर रहा हूं.
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