सऊदी पत्रकार ख़ाशोज्जी पर मुखर पश्चिमी देश यमन पर चुप क्यों?

जमाल ख़ाशोज्जी

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी के मामले ने पश्चिमी देशों को काफ़ी नाराज़ किया.

अब सऊदी अरब ने ये बात मान ली है कि पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी दो अक्टूबर को तुर्की के इस्तांबुल स्थित उसके वाणिज्य दूतावास में ही मारे गए थे.

हालांकि इन देशों ने सऊदी अरब के ये मानने के पहले ही शक जताया था कि पत्रकार की हत्या हुई है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी गुरुवार को कहा था कि वो मानते हैं कि जमाल ख़ाशोज्जी की मौत हो गई है. ट्रंप ने ये चेतावनी भी दी थी कि अगर इसमें सऊदी अरब की भूमिका साबित हुई तो इसके 'बहुत गंभीर' परिणाम होंगे.

इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों की नाराज़गी का हाल ये है कि अमरीका, फ़्रांस और ब्रिटेन जैसे कई अहम देशों ने सऊदी अरब में 23 अक्टूबर को होने वाली एक बड़ी निवेश कॉन्फ्रेंस के बहिष्कार का एलान किया है.

कई अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ग्लोबल कंपनियों ने भी कांफ्रेंस के बॉयकॉट की घोषणा कर दी है

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पश्चिमी देशों की नाराज़गी का कारण?

ये सभी देश सऊदी अरब के क़रीबी दोस्त हैं. ऐसे में इन देशों और संस्थाओं की सऊदी अरब से नाराज़गी का मुख्य कारण क्या हो सकता है?

एक आज़ाद पत्रकार की हत्या और वो भी एक दूतावास में?

एक ज़माने में जमाल ख़ाशोज्जी सऊदी अरब के रॉयल परिवार से काफी क़रीब थे लेकिन पिछले कुछ समय से वो शक्तिशाली क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीतियों के आलोचक बन गए थे. अपनी सुरक्षा के कारण वो सऊदी अरब से निकल कर अमरीका में रहने लगे थे.

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ख़ाशोज्जी के साथ हुआ सुलूक, उन्हें लेकर की गई साज़िश और एक निहत्थे पर प्रहार किसी को बर्दाश्त नहीं होगा.

मानवाधिकार को बढ़ावा देने वाले पश्चिमी देशों के लिए ये सही मायने में एक बड़ा मुद्दा है. ये मामला तूल इसलिए भी पकड़ रहा है क्यूंकि सऊदी अरब ने इस मुद्दे पर संतोषजनक ढंग से जवाब नहीं दिए हैं.

सऊदी अरब के लिए ये एक बड़ा राजनयिक संकट है. लेकिन जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या केवल पश्चिमी देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता की बात है.

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इमेज कैप्शन, इस्ताबुंल में सऊदी का वाणिज्यिक दूतावास

यमन पर ख़ामोशी क्यों?

भारत समेत कई देशों में सोशल मीडिया पर लोग ये सवाल कर रहे हैं कि सऊदी अरब को आड़े हाथों लेने वाले पश्चिमी देश यमन पर खामोश क्यों हैं जहां सऊदी अरब ने 2015 से एक भयानक जंग छेड़ रखी है.

इस युद्ध में हर रोज़ बेगुनाह बच्चे, बूढ़े और महिलाओं की मौत हो रही है. यमन में युद्ध सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने शुरू किया है.

यमन में दो गुट हैं. एक को ईरान समर्थन देता है और दूसरे का साथ सऊदी अरब दे रहा है. दोनों देश इस इलाक़े में अपना सिक्का जमाना चाहते हैं. इसी लिए सऊदी अरब ने यमन में ईरान वाले गुट के खिलाफ युद्ध शुरू किया.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यमन इस समय दुनिया के लिए सबसे बड़ा मानवीय संकट है. इस युद्ध में अब तक लगभग 2.3 करोड़ लोग, जो आबादी का दो-तिहाई हिस्सा हैं, जीवित रहने के लिए मानवीय सहायता पर भरोसा कर रहे हैं. लगभग 80 लाख लोग अकाल के कगार पर हैं. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 100 वर्षों में ये सब से बुरा अकाल' हो सकता है.

यमन में अस्पताल और स्कूल की इमारतों पर भी बमबारी की जा रही है. इस अगस्त में, देश के उत्तर में एक स्कूल के अंदर कम से कम 42 बच्चे मारे गए थे.

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क्या ये दोहरी नीति नहीं?

एक व्यक्ति की मौत (या हत्या) एक त्रासदी है और लाखों बेक़सूर आम लोगों की मौतें केवल आंकड़े हैं? क्या अपने एक नागरिक की "हत्या" के लिए सऊदी अरब को डराना-धमकाना चाहिए और यमन में बड़े पैमाने पर जारी हत्याओं को नज़र अंदाज़ कर देना चाहिए?

ऐसे में अमरीका को नैतिकता के आधार पर सऊदी अरब के 110 अरब डॉलर के हथियारों का आर्डर रद्द नहीं कर देना चाहिए? राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐसा करने से ये कह कर इंकार कर दिया कि इससे अमरीकी नौकरियों पर बुरा असर होगा.

क्या ये पश्चिमी देशों की एक दोहरी नीति की मिसाल नहीं है?

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