पुलवामा CRPF हमला: भारत के साथ बातचीत पर एक पाकिस्तानी का नज़रिया

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- Author, डॉ. हसन जाविद
- पदनाम, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, राजनीति शास्त्र, लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंस
- पढ़ने का समय: 4 मिनट
पुलवामा हमले पर अपने पहले सार्वजनिक बयान में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने हमले के पीछे पाकिस्तान के होने के भारतीय आरोपों को यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि पाकिस्तान को इस घटना से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.
इमरान ख़ान ने भारत को पुलवामा हमले की जांच में सहयोग करने का प्रस्ताव भी दिया और कहा कि यदि किसी पाकिस्तानी संगठन का हाथ इसमें साबित होता है तो वो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई ज़रूर करेंगे.
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भारतीय नेताओं और मीडिया की ओर से युद्ध की चेतावनियों पर इमरान ख़ान ने कहा कि वो बातचीत में विश्वास रखते हैं और यही दोनों देशों के बीच संबंधों में ज़हर घोलने वाले विवादित मुद्दों को हल करने का एकमात्र रास्ता है.
पाकिस्तान के विशेषज्ञों में ये आम राय है कि पुलवामा हमले के बाद भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर जबावी कार्रवाई करने का भारी दबाव है.

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भारत में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. चुनावों के समय बीजेपी कमज़ोर नहीं दिखना चाहेगी. अगर बीजेपी ऐसे समय में कमज़ोर दिखी तो प्रतिद्वंद्वी पार्टियां इसका चुनावी फ़ायदा उठा सकती हैं.
भारतीय जनता पार्टी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाने का दावा करती रही है. ऐसे में मोदी सरकार पर दबाव और भी ज़्यादा है.
वहीं भारतीय मीडिया ज़ोर-शोर से लगातार प्रधानमंत्री से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ठोस कार्रवाई करने की मांग कर रहा है.
तर्क दिया जा रहा है कि 2016 में उड़ी में सैन्य कैंप के हमले के जवाब में की गई सर्जिकल स्ट्राइक से भी बड़ी कार्रवाई पुलवामा के जबाव में की जानी चाहिए.
इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी परेशानी ये है कि इससे भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को ख़राब करने वाले मूल मुद्दे का समाधान नहीं होगा.
विवादों का क्या होगा
जैसा कि इमरान ख़ान ने पुलवामा हमले पर अपनी टिप्पणी में कहा है कि युद्ध से न ही पहले भारत और पाकिस्तान के विवाद सुलझें हैं और न ही अब सुलझेंगे.

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अगर इस तथ्य को भी अलग कर दिया जाए कि भारत और पाकिस्तान के बीच यदि युद्ध होता है तो इसमें जान-माल की भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी, ऐसे युद्ध या इससे छोटे स्तर के युद्ध से शुरू होकर नौबत परमाणु हथियारों के इस्तेमाल तक पहुंच सकती है. इस बात से दोनों ही देशों के नेताओं को चिंतित होना चाहिए.
ठीक इसी तरह से जब पाकिस्तान को भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है तो पाकिस्तान के चीन और सऊदी अरब जैसे देशों से क़रीबी रिश्ते बनाकर और अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर चल रही वार्ता में अहम भूमिका निभा कर भारत की कोशिशों को कुंद कर रहा है.
इससे पहले, जब भी पाकिस्तान ने भारत के सैन्य और नागरिक ठिकानों पर हुए हमले में अपनी भूमिका को नकारा है, उसे शक से ही देखा गया है क्योंकि पाकिस्तान के संबंध अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर में सक्रिय जेहादी संगठनों से रहे हैं.
अब पाकिस्तान की सरकार ऐसे संबंधों को नकारती है, ख़ासकर जेहादियों के ख़िलाफ़ दशक भर से चल रहे सैन्य अभियान के बाद. पाकिस्तानी सेना जेहादी चरमपंथ को ख़त्म करने के लिए लंबा अभियान चलाए हुए है.
क्या पाकिस्तान मददगार?
लेकिन सरकार के इन दावों पर सवाल इसलिए उठता है क्योंकि अब भी कई समूह और व्यक्तियों को पाकिस्तानी सरकार की मदद हासिल है.
इनमें मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफ़िज़ सईद और उनका संगठन जमात-उद-दावा और जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अज़हर शामिल हैं. ये दोनों ही संगठन पाकिस्तान में पूरी आज़ादी से सक्रिय हैं.
मुंबई और पठानकोट हमलों के बाद भी पाकिस्तान ने सहयोग के लिए हाथ बढ़ाया था लेकिन इससे हासिल कुछ नहीं हुआ क्योंकि अंत में भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही एक दूसरे पर साझा जांच में रोड़ा अटकाने और सहयोग न करने के आरोप लगाए.

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इस सबके बावजूद, उपमहाद्वीप में तनाव कम करने के लिए समझ से काम लेने और वार्ता करने के पक्ष में भी कई कारण हैं. सबसे पहले तो ये याद रखना ज़रूरी है कि भारत में नागरिक और सैन्य नेतृत्व कोई अखंड इकाइयां नहीं हैं और दोनों ही पड़ोसी देशों के बीच लगातार चल रहे तनाव से उन गुटों को ही मज़बूती मिलती है जो नफ़रत, दुश्मनी और पागलपन के दम पर ही अपनी राजनीतिक स्थिति को सशक्त करते रहे हैं.
दोनों ही देशों के बीच रिश्ते भी ऐसे ही गुटों की वजह से ठप पड़े हुए हैं. ऐसे में ये वैकल्पिक रास्ता की ओर चलना समझदारी की ही बात होगी भले ही ऐसा करना एक मुश्किल राजनीतिक फ़ैसला ही क्यों न हो.
दूसरी बात ये है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान के ऊपर अपनी ज़मीन से संचालित हथियारबंद समूहों और चरमपंथी गुटों से अपने रिश्तों की समीक्षा करने को लेकर भारी दबाव है.
अफ़ग़ानिस्तान और ईरान भी भारत के पाकिस्तान पर अपनी ज़मीन पर हुए हमलों के आरोप लगाने में सुर में सुर मिला रहे हैं.
भारत को ठहरकर कश्मीर में अपनी नीतियों पर भी पुनर्विचार करना चाहिए. कश्मीर में भारत के लगातार जारी दमनकारी और हिंसक अभियान ने स्थानीय जनता में चरमपंथ की भावना भरने का काम रावलपिंडी से संचालित साज़िशों से ज़्यादा किया है.
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आख़िरकार पुलवामा का हमलावर एक स्थानीय युवा ही है न कि पाकिस्तान से आया कोई विदेशी लड़ाका, और उसके दोस्तों और परिवारों के बयान बताते हैं कि भारतीय सेना की ओर से किए गए दुर्व्यवहार ने उसे हिंसा का रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया.
पुलवामा हमले पर अपने बयान में इमरान ख़ान ने भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता शुरू करने का आह्वान किया है, इसमें दक्षिण एशिया में चरमपंथ के मुद्दे पर बातचीत भी शामिल है. उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार करना ही सही दिशा में उठाया गया क़दम साबित होगा.
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