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कश्मीर पर तनाव के बीच पाकिस्तान का यह हिन्दू बहुल ज़िला
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
शनिवार का दिन मैंने कच्छ-गुजरात की सीमा से जुड़े पाकिस्तानी ज़िले थरपारकर में बॉर्डर देखते हुए गुज़ारा.
कश्मीर की लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर रोज़-रोज़ होने वाली फ़ायरिंग से बिल्कुल अलग एकदम शांति भरी सीमा जहां बाड़ के दूसरी ओर कच्छ के दलदल के किनारे भारतीय बीएसएफ़ की चौकियां बनी हैं.
उनके बिल्कुल सामने पाकिस्तानी सीमा के अंदर चोरयो नाम के गांव में ग्रेनाइट के पहाड़ पर शेरां वाली माता का मंदिर है जहां पर यात्रियों और पर्यटकों का हुजूम जमा है.
चोरयो गांव के छोटे-छोटे मैले-कुचैले बच्चे इन यात्रियों, पर्यटकों और उनकी आती-जाती गाड़ियों के पीछे-आगे होकर हर किसी का जय माता दी कहके स्वागत कर रहे थे. इस उम्मीद में कि शायद कोई सिक्का, कोई नोट, कोई चिप्स का पैकेट या टॉफ़ी इन मासूमों के हाथ आ जाए.
शेरां वाली मां के मंदिर के माथे पर कश्मीर का नया-नया सा झंडा बैनर की तरह लटका हुआ है और छत पर पाकिस्तान का झंडा लगा है.
यहां सादे कपड़ों में तैनात एक अकेला पुलिसकर्मी लोगों को बार-बार याद दिला रहा है कि यह बॉर्डर एरिया है, यहां तस्वीर लेना मना है, कहीं दुश्मन फ़ायदा न उठा ले. मगर इसकी कोई नहीं सुन रहा.
मैंने पुलिसकर्मी से पूछा कि तुम्हारा नाम? कहने लगा- शिवराज मेघवाड़.
थरपारकर पाकिस्तान का अकेला ज़िला है जहां हिंदू आबादी मुसलमानों से ज़्यादा है. शायद इसीलिए यहां हर तीसरी गाड़ी पर इन दिनों पाकिस्तान का झंडा लहरा रहा है और शायद इसीलिए इस ज़िले के सबसे बड़े चौक का नाम कश्मीर चौक है.
जो भी जिस देश में रहता है, उसे उसका वफ़ादार होना चाहिए और इस वफ़ादारी पर किसी को शक नहीं होना चाहिए.
लेकिन जब कोई भारतीय मुसलमान बिना पूछे देश भक्ति का मुद्दा बीच में ले आए या कोई पाकिस्तानी हिंदू बिना पूछे कश्मीरियों की हिमायत में यह बताने लगे कि कैसे दो दिन पहले थारपारकर में लोगों ने बड़े जोश से जुलूस निकाला था, तो शक होने लगता है.
शक इस बात का कि उसे ये सब क्यों बताना पड़ रहा है, मैंने तो पूछा ही नहीं.
ज़ात का पत्रकार होना, रस्सी में भी सांप ढूंढना और हर बात पर बतंगड़ तलाश करना ही शायद मेरी रोज़ी-रोटी है. मगर हो सके तो मेरी ख़ातिर एक बार सोचिएगा ज़रूर कि शेरां वाली माता पाकिस्तान में हो तो कैसे हरा-हरा सोचती है और सिर्फ़ ढाई किलोमीटर परे बाड़ के उस तरफ़ हो तो उससे क्या-क्या गेरुआ उम्मीदें बांधी जाती हैं.
वैसे कब धर्म बड़ा, देश छोटा और कब देश छोटा और धर्म बड़ा लगने लगता है, अगर इसका भी कोई एक जवाब नहीं तो फिर हम एक-दूसरे के साथ जो अच्छा-बुरा कर रहे हैं, अगर वाक़ई सोचसमझकर कर रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं?
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