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सारा अल अमीरी: वो महिला, जो यूएई के ख़ास मिशन का मंगल करना चाहती हैं
- Author, जोनाथन एमोस
- पदनाम, बीबीसी विज्ञान संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
संयुक्त अरब अमीरात आने वाले कुछ दिनों में मंगल ग्रह के लिए एक सैटेलाइट भेजेगा. 'होप' नाम का ये सैटेलाइट मंगल ग्रह के मौसम और उसकी जलवायु का अध्ययन करेगा.
1.3 टन वज़न वाले इस उपग्रह को जापान के तानेगाशिमा अंतरिक्ष केंद्र से H-2A रॉकेट के ज़रिए प्रक्षेपित किया जाएगा.
50 करोड़ किलोमीटर के सफ़र के बाद 'होप' अगले साल फरवरी में मंजिल पर पहुँचेगा.
ये मौक़ा संयुक्त अरब अमीरात के लिए इसलिए भी ख़ास है क्योंकि उसकी स्थापना के 50 साल पूरे होने जा रहे हैं.
तानेगाशिमा का मौसम अनुकूल होते ही 'होप' की लॉन्चिंग की तारीख़ और वक़्त दोनों की ही घोषणा कर दी जाएगी. तकनीकी वजहों से पहले ही इसके प्रक्षेपण को दो बार टाला जा चुका है.
मंगल ग्रह पर पहुँचने के लिए इस महीने तीन मिशन लॉन्च किए जाने हैं. संयुक्त अरब अमीरात का होप इन्हीं तीनों में से एक है.
अमरीका और चीन भी ऐसे ही दो मिशन के लिए तैयारी कर रहे हैं और उनकी तैयारियाँ आख़िरी चरण में हैं.
मंगल पर क्यों जा रहा है यूएई?
अंतरिक्ष यानों के उत्पादन और डिजाइनिंग का संयुक्त अरब अमीरात के पास बहुत मामूली अनुभव है.
लेकिन इसके बावजूद यूएई वो करने की कोशिश कर रहा है जो अब तक केवल अमरीका, रूस, यूरोप और भारत करने में कामयाब रहे हैं.
लेकिन ये संयुक्त अरब अमीरात के लोगों की महत्वाकांक्षा को बयान करता है कि वे इस चुनौती के लिए तैयार हैं.
अमरीकी विशेषज्ञों की निगरानी में यूएई के इंजीनियरों ने छह सालों की मेहनत के बाद एक परिष्कृत उपग्रह तैयार किया है.
और जब ये सैटेलाइन मंगल पर पहुँचेगा, तो उम्मीद की जा रही है कि इससे विज्ञान की नई सूचना, मंगल के वातावरण के बारे में ताज़ा जानकारी सामने आएगी.
विशेषकर वैज्ञानिकों को लगता है कि 'होप' मिशन से शायद ये पता चल पाए कि मंगल पर ऐसा क्या हुआ कि उस पर हवा और पानी दोनों ख़त्म हो गए.
'होप' मिशन को अरब जगत में प्रेरणा के एक बहुत बड़े स्रोत के रूप में देखा जा रहा है.
उम्मीद है कि इससे संयुक्त अरब अमीरात के नौजवानों और अरब दुनिया के बच्चों का विज्ञान के प्रति रुझान बढ़ेगा.
यूएई की सरकार देश की अर्थव्यवस्था की निर्भरता तेल और गैस से हटाकर भविष्य में ज्ञान पर आधारित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाना चाहते हैं.
लेकिन हमेशा की तरह जब बात मंगल ग्रह की होती है तो इसका जोखिम भी बहुत ज़्यादा है. लाल ग्रह पर भेजे गए अब तक के सभी अभियानों में आधे नाकाम रहे हैं.
'होप' मिशन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ओमरान शराफ़ को इसके ख़तरों का अंदाज़ा है लेकिन वे ज़ोर देकर कहते हैं कि उनका देश सही दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "ये एक रिसर्च और डेवलपमेंट मिशन है और हां, इसमें नाकामी भी मिल सकती है. हालांकि एक राष्ट्र के तौर पर तरक्की करने में नाकाम होना कोई विकल्प नहीं होता यूएई इस मिशन से जो क्षमता हासिल करने वाला है और इस देश में जो ज्ञान आएगा, यही बात सबसे ज़्यादा मायने रखती है."
यूएई यहाँ तक कैसे पहुँच पाया?
संयुक्त अरब अमीरात की सरकार ने प्रोजेक्ट टीम से कहा था कि वे किसी विदेश और बड़ी कंपनी से अंतरिक्ष यान नहीं ख़रीदेंगे. उन्हें इस सैटेलाइट का निर्माण ख़ुद करना होगा.
इसका मतलब था कि अमरीकी विश्वविद्यालयों के साथ साझीदारी करना क्योंकि ज़रूरी अनुभव उन्हीं के पास था.
संयुक्त अरब अमीरात और अमरीका के इंजनीयरों और वैज्ञानिकों ने साथ मिलकर स्पेस क्राफ्ट की डिजाइन तैयार की और उसका निर्माण किया.
इस टीम ने इस सैटेलाइट पर लगने वाले तीन उपकरण भी बनाए, जो मंगल ग्रह का अध्ययन करने वाले हैं.
'यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो' के 'लैबोरेटरी ऑफ़ एटमॉसफेरिक एंड स्पेस फिजिक्स' (एलएएसपी) में इस सैटेलाइट का बाहरी ढाँचा तैयार किया गया.
जबकि काफ़ी बड़े हिस्से का काम दुबई के मोहम्मद बिन राशिद स्पेस सेंटर में पूरा किया गया.
एलएएसपी के सीनियर सिस्टम इंजीनियर ब्रेट लैंडिन का मानना है कि यूएई के लोग अगले मिशन का काम अपने बूते करने के लिए तैयार हैं.
"बाइक कैसे चलाई जाती है, किसी को इसके बारे में बताना एक बात है लेकिन जब तक आप ये ख़ुद नहीं कर लेते हैं, आप ये नहीं समझ पाएँगे कि ये कैसा लगता है. अंतरिक्ष यान के मामले में भी ऐसा ही है. अंतरिक्ष यान में ईंधन भरने का तरीक़ा मैं आपको बता सकता हूँ लेकिन जब तक कि आप इसके लिए ख़ास तौर पर तैयार किए शूट में बेहद संवेदनशील 800 किलो रॉकेट फ़्यूल स्टोरेज टैंक से स्पेस क्राफ्ट में ख़ुद नहीं भर लेते हैं, आप नहीं समझ पाएँगे कि ये कैसा अनुभव होता है. उनके इंजीनियरों ने ये कर लिया है और अब वे जानते हैं कि ये कैसे करना है. अगली बार वे स्पेस क्राफ्ट बना लेंगे."
मंगल पर 'होप' मिशन का मक़सद
संयुक्त अरब अमीरात मंगल ग्रह पर पहुँचकर वो नहीं करना चाहता है जो जानकारी दूसरे देश पहले ही हासिल कर चुके हैं.
इसके लिए वे अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के पास गए. नासा ने मंगल मिशन के लिए एक सलाहकार समिति 'मार्क्स एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम एनालिसिस ग्रुप' (एमईपीएजी) बना रखी है.
उन्होंने पूछा कि यूएई ऐसा क्या रिसर्च करे कि मौजूदा उपलब्ध जानकारी में इजाफा हो सके. एमईपीएजी की सिफारिशों के आधार पर मिशन होप का लक्ष्य तय किया गया.
एक पंक्ति में कहें तो संयुक्त अरब अमीरात का सैटेलाइट इस बात का अध्ययन करेगा कि वातावरण में ऊर्जा किस तरह से गति करती है. ऊपर से नीचे तक, दिन के पूरे वक्त और साल के सभी मौसमों में. ये सैटेलाइट मंगल पर फैली धूल का भी अध्ययन करेगा. इसी धूल के कारण मंगल का तापमान प्रभावित होता है.
मंगल के वातावरण में मौजूद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के तटस्थ परमाणुओं के बर्ताव का भी ये सैटेलाइट अध्ययन करेगा. सूर्य से आने वाले ऊर्जा कण मंगल ग्रह पर पहुँचकर उसके क्षरण का कारण बनते हैं. ऐसी आशंकाएँ हैं कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के तटस्थ परमाणुओं की इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका रहती है.
ऐसी वैज्ञानिक मान्यता रही है कि अतीत में मंगल ग्रह पर पानी था. आख़िर उस पानी को क्या हुआ. होप मिशन की स्टडी के दायरे में ये विषय भी रहेगी.
मंगल के अध्ययन के लिए होप सैटेलाइट अपनी स्थिति भूमध्यरेखीय रखेगा. ग्रह से उसकी दूरी 22 हज़ार से 44 हज़ार किलोमीटर के बीच रहेगी.
होप प्रोजेक्ट पर काम कर रही एलएएसपी की साइंस टीम के लीडर डेविड ब्रेन बताते हैं, "लाल ग्रह की ज़मीन का हर टुकड़ा दिन के हर वक़्त दिखे, इस ख्वाहिश ने होप की कक्षा को बड़ा और अंडाकार बना दिया है. इस फ़ैसले की वजह से होप ओलिंपस मॉन्स (सौर मंडल का सबसे बड़ा ज्वालामुखी) के ऊपर से देख सकेगा."
सारा अल अमीरी कौन हैं?
होप प्रोजेक्ट की साइंस लीडर संयुक्त अरब अमीरात की आधुनिक विज्ञान मामलों की राज्य मंत्री भी हैं.
कई मायनों में वे इस पूरे मिशन का चेहरा है.
वे दुबई के मोहम्मद बिन राशिद स्पेस सेंटर में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर इस प्रोजेक्ट से जुड़ीं और अब वे अंतरिक्ष अभियान के लिए अपने पैशन को बढ़ा रही हैं.
ये बात गौर करने वाली है कि होप मिशन पर काम कर रही 34 फ़ीसदी अमीराती महिलाएं हैं.
सारा अल अमीरी ने बताया, "अहम बात ये है कि इस मिशन की लीडरशिप टीम में मर्दों और औरतों को बराबर-बराबर जगह है."
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