चीन पूरी दुनिया में चौतरफ़ा घिरने के बाद भी इतना आक्रामक क्यों है?

शी जिनपिंग

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चीन ख़ुद चुनौतियों से जूझ रहा है या पूरी दुनिया को चुनौती दे रहा है? जब चीन ने हॉन्ग कॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू किया, तो पूरी दुनिया का ध्यान खिंचा.

पश्चिम के देशों ने चीन के इस क़दम की खुलकर निंदा की. अमरीका और ब्रिटेन ने तो कुछ समझौतों से भी ख़ुद को पीछे खींच लिया. चीन की सत्ताधारी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पिछले कुछ सालों से स्वायत्त हॉन्ग कॉन्ग में अपना कंट्रोल कड़ा करने में लगी हुई थी. इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का लागू किया जाना कोई चौंकाने वाला क़दम नहीं था.

लेकिन चौंकाने वाला यह है कि चीन इतना कुछ तब कर रहा है, जब वो ख़ुद ही चौतरफ़ा घिरा हुआ है.

चार मई को समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक विशेष रिपोर्ट प्रकाशित की थी.

इस रिपोर्ट के अनुसार, ''चीन की सरकार की एक आतंरिक रिपोर्ट है जिसमें बताया गया है कि दुनिया भर में चीन विरोधी भावना 1989 में टिएनामन चौक पर हुए जनसंहार के बाद से सबसे ज़्यादा है. दुनिया भर में चीन के ख़िलाफ़ कोरोना वायरस के कारण शत्रुता बढ़ेगी और अमरीका से सीधा टकराव होगा. इस रिपोर्ट को गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को सौंपा था. अमरीका में जैसे-जैसे कोरोना के मामले बद से बदतर होंगे टकराव और बढ़ेगा.''

चीन ने हॉन्ग कॉन्ग में ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन और चुनावी हार के बाद एक साल से भी कम वक़्त में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लागू कर दिया. चीन कोविड 19 के कारण दुनिया भर में आलोचना झेल रहा है. पूरे मामले में पारदर्शिता नहीं बरतने के आरोप लगे रहे हैं.

राजनयिक और कारोबारी संबंधों की समीक्षा

चीन

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दुनिया भर के कई बड़े देश चीन के साथ अपने राजनयिक और कारोबारी संबंधों की समीक्षा कर रहे हैं. यहाँ तक कि चीन से आने वाली सप्लाई को भी सीमित किया जा रहा है.

अमरीका चीन को हर तरफ़ से झटका दे रहा है. चीन के नेताओं को पता होगा कि चीन विरोधी भावना उनके लिए हर मोर्चे पर नुक़सान पहुँचाने वाला है लेकिन फिर वो ऐसे क़दम क्यों उठा रहा है, जिससे अमरीका समेत पश्चिम के कई देशों को आसानी से नाराज़ किया जा सकता है.

बात केवल पश्चिम के देशों की नहीं है, बल्कि चीन भारत जैसे पड़ोसी देश के साथ भी उतने ही आक्रामक तरीक़े से पेश आ रहा है जबकि उसे पता है कि भारत के साथ कारोबार में उसे अरबों डॉलर का फ़ायदा है.

चीन पर चौतरफ़ा उठते सवालों के बीच देश के भीतर भी बहस चल रही है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को और ज़्यादा राष्ट्रवादी होना चाहिए या उदार रुख़ अपनाना चाहिए. कुछ लोग कह रहे हैं कि चीन का आक्रामक होना बैक फ़ायर करेगा.

चीन के भीतर भी कई लोग कह रहे हैं कि दुनिया भर में चीन विरोधी भावना के ख़िलाफ़ अगर चीन उग्र राष्ट्रवाद की तरफ़ बढ़ता है तो यह आग में घी का काम करेगा.

रेनमिन यूनिवर्सिटी ऑफ चाइना में अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रोफ़ेसर शी यिनहोंग ने कॉलेज के एक ऑनलाइन सेमिनार में कहा था, ''हमारा लक्ष्य चीन की राजनीतिक व्यवस्था को श्रेष्ठ बताना और जब पूरी दुनिया महामारी से जूझ रही है ऐसे में चीन को विश्व नेता के तौर पर पेश करना है. लेकिन समस्या यह है कि चीन महामारी के दौरान उभरकर आई वैश्विक जटिलता को नहीं समझ रहा है. ऐसे में हमारी आक्रामकता से बहुत कुछ हासिल नहीं होगा. मुझे लगता है कि हम क्या चाहते हैं और क्या मिला है, इसमें बहुत गैप है.''

चीन कोरोना

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चीन का स्टेट मीडिया कोरोना महामारी के दौरान काफ़ी आक्रामक रहा है और खुलकर ये बातें कही कि चीन ने अपनी क्षमता से महामारी को क़ाबू में कर लिया लेकिन अमरीका नाकाम रहा. शी यिनहोंग ने स्टेट मीडिया के इस रुख़ को बैक फ़ायर करने वाला बताया है.

रोमानियन इंस्टिट्यूट फोर द स्टडी ऑ द एशिया-पैसिफिक के प्रमुख एंड्रेई लुंगु ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में 15 मई को लिखा था कि चीन ने पिछले 40 सालों में अपनी मेहनत और लगन के दम पर दुनिया में जो जगह बनाई थी, उसे उसकी आक्रामकता ने संदिग्ध बना दिया है.

एंड्रेई ने लिखा है, ''चीन ने पिछले 40 सालों में अपने लाखों नागरिकों के काम, त्याग और रचनात्मकता के दम पर जो आर्थिक तरक़्क़ी हासिल की, उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है. इसमें चीन के डिप्लोमेट की भी अहम भूमिका रही. डिप्लोमेसी के दम पर चीन ने जिनके साथ असहज रिश्ते थे उनके साथ भी सहज किए. वो चाहे जापान हो या अमरीका. चीन ने यूएन और डबल्यूटीओ में भी अहम जगह बनाई. ऐसा इसलिए भी संभव हो रहा था कि चीनी डिप्लोमैट पूरी तरह से ट्रेंड और सॉफ्ट स्पोकेन थे. इन डिप्लोमेट्स ने चीन की पहुँच वहाँ तक बनाई जहाँ असंभव सा लगता था. इन्होंने निजी तौर पर रिश्ते विकसित किए और लोगों का भरोसा जीता."

उन्होंने आगे लिखा है- चीन की डिप्लोमैसी का वो स्वर्ण काल था. तब वो बहुत ही अनुशासित थे. लेकिन आज की तारीख़ में चीन के डिप्लोमेट पर हर जगह सवाल खड़े हो रहे हैं. अब ये डिप्लोमैट्स चीन की प्रॉपेगैंडा मशीनरी के अपेंडिक्स बन गए हैं. इनका फ़ोकस अब घरेलू जनता के इमोशन पर है न कि विदेशियों पर. एक अच्छा डिप्लोमेट वो होता है जो कलह कम करे न कि बढ़ाए. लेकिन चीन के डिप्लोमेट विदेश सरकारों से खुलेआम बयानबाज़ी कर रहे हैं. विदेशी मीडिया को टारगेट कर रहे हैं और यहाँ तक कि विदेशी नेताओं पर भी टिप्पणी कर रहे हैं. ऐसा फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और ब्राज़ील में देखने को मिला. चीन को जब चाहिए था कि कोविड 19 की महामारी में अपनी संदिग्ध हुई छवि को उदारता से ठीक करे तो वो आक्रामकता दिखाकर डरा रहा है.

कई देशों के साथ टकराव

चीनी सैनिक

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पिछले कुछ महीनों में चीन ने भारत के साथ दशकों बाद सरहद पर हिंसक संघर्ष छेड़ा, दक्षिण चीन सागर में वियतनाम और मलेशिया के साथ टकराव बढ़ाया, ताइवान स्ट्रेट में रात में सैन्य अभ्यास करके ताइवान पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की और ऑस्ट्रेलिया की वाइन, बीफ़, जौ और अपने छात्रों को लेकर बहिष्कार की धमकी दी.

दूसरी तरफ, चीन के कूटनीतिक योद्धा पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट पार्टी के हितों का बचाव करने के लिए आक्रामक तौर पर साइबर कैंपेन छेड़े हुए हैं. नेपाल की ओली सरकार अभी संकट में है तो काठमांडू स्थित चीनी दूतावास बेहद सक्रिय रहा. चीन की राजदूत होउ यांकी नेपाल की सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के साथ लगातार बैठकें करती दिखीं.

नेपाल के भीतर भी चीन की इस सक्रियता को लेकर सवाल उठे. भारत के भीतर भी चिंताएँ बढ़ीं कि क्या नेपाल में भी भारत का प्रभाव अब अतीत का हिस्सा बन गया.

चीन की इस बढ़ती आक्रामकता ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सहयोगियों ऑस्ट्रेलिया, जापान, भारत और अमरीका को ठोस रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया. अमरीका ने गलवान में भारत के 20 सैनिकों के मारे जाने पर खुलकर समर्थन दिया.

भारत, जापान, मलेशिया और ऑस्ट्रेलिया चीन के साथ कारोबार कम कर रहे हैं. भारत ने चीन से आने वाली एफ़डीआई का ऑटोमैटिक रूट बंद कर दिया. ऐसा ही जर्मनी ने भी किया और यूरोपीय यूनियन में भी ऐसी ही मांग उठ रही है. फ़्रांस में चीन के राजदूत वहाँ की सरकार से उलझते दिखे.

ऑस्ट्रेलिया ने साफ़ कह दिया कि वो चीन की धमकियों से डरेगा नहीं, भले उसकी वाइन, बीफ़ और जौ चीन ना ख़रीदे.

भारत ने टिकटॉक समेत चीन के 52 ऐप्स पर बैन लगा दिया. कई देश विदेशी निवेश को लेकर नए नियम बना रहे हैं ताकि चीन को रोका जा सके. भारत और ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में हुए वर्चुअल समिट में सैन्य उपकरण करार किया.

जापान और भारत के बीच भी इसी तरह का समझौता होने वाला है. चीन ताइवान को वन चाइना पॉलिसी के तहत अपना हिस्सा मानता है लेकिन ताइवान की विश्व सवास्थ्य संगठन में ऑब्जर्वर का स्टेटस मिला. चीन के ख़िलाफ़ पूरी आबोहवा है लेकिन वो झुक नही रहा. ऐसा क्यों है?

चीन के आक्रामक रुख़ की वजह क्या?

हॉन्ग कॉन्ग

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भारत के विदेश सचिव रहे श्याम सरन कहते हैं, ''चीन आक्रामकता को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. वो अपने घर में भी आर्थिक मोर्चे पर कमज़ोर पड़ा है लेकिन उसकी आक्रामकता में कमी नहीं दिख रही है. वो चाहे हॉन्ग कॉन्ग का मसला हो या ताइवान का या फिर साउथ चाइना सी का. यहाँ तक कि संकट की घड़ी में वो भारत के साथ भी उलझ गया. दूसरी बात यह भी है कि चीन ने महामारी को क़ाबू में कर लिया जबकि अमरीका जैसे देश अब भी जूझ रहे हैं. ऐसे में उसे लगता होगा कि वही सुपर है. लेकिन इस आक्रामकता से उसे सफलता मिलेगी, मुझे ऐसा नहीं लगता है. उस पर चौतरफ़ा शक बढ़े हैं. न केवल उसकी डिप्लोमैसी संदिग्ध हुई है बल्कि उसका निवेश और क़र्ज़ भी शक के दायरे में है. अमरीका और ब्रिटेन तीखे सवाल पूछ रहे हैं.''

क्या टिएनामन चौक पर हुए जनसंहार के बाद चीन जब पूरी दुनिया में घिरा था तब भी इतना आक्रामक था?

श्याम सरन कहते हैं, ''तब चीन के पास इतनी ताक़त नहीं थी कि इतना आक्रामक होता. आज की तारीख़ में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. सैन्य ताक़त भी है. अभी वो आक्रामकता को रणनीति बनाने में सक्षम है लेकिन यह रणनीति उसके लिए क़ामयाब रहेगी इस पर शक है. अभी चीन के बाहर भी यह संदेश गया है कि वो राष्ट्रवाद को हवा दे रहा है.''

कहा जा रहा है कि चीन जैस-जैसे विदेशों में घिर रहा है, वैसे-वैसे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपनी छवि सुधारने के लिए देश में राष्ट्रवाद को हवा दे रही है. चीन की जीडीपी पहली तिमाही में चार दशक में पहली बार 6.8 फ़ीसदी नीचे गई.

कोरोना महामारी के दौरान चीन में बेरोज़गारी दर भी 10 फ़ीसदी रही. चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग ने 29 मई को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि 60 करोड़ चीनी नागरिकों की मासिक कमाई अब भी महज़ 1,000 रेनमिनबी (चीनी मुद्रा) यानी 10,670 रुपए हैं.

शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप

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जब हॉन्ग कॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाने की बात हो रही थी तभी चीन में ताइवान को लेकर भी चर्चा गर्म थी क्या उसका मिलिट्री टेकओवर कर लेना चाहिए. ज़ाहिर है चीन के लिए ताइवान में ऐसा करना इतना आसान नहीं है.

यहाँ तक कि ताइवान की राष्ट्रपति साइ इंग वेन चीन को खुलेआम चुनौती देती हैं और कहती हैं ताइवान दूसरा हॉन्ग कॉन्ग नहीं बनेगा.

यह पहले से ही तय था कि अगर चीन हॉन्ग कॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाता है तो अमरीका और ब्रिटेन प्रतिबंध लगाएँगे और यूरोप भी नाराज़ होगा लेकिन चीन ने इसकी चिंता नहीं की.

कई विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि हॉन्ग कॉन्ग पर चीन की विदेशी आलोचना से अगर किसी को मज़बूती मिलेगी तो वो है राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी.

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