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अफ़ग़ानिस्तानः अचानक काबुल पहुंचे अमेरिकी रक्षा मंत्री
अमेरिका के रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन अचानक बिना बताए अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंचे हैं. कुछ सप्ताह बाद ही अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अमेरिकी बलों को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना है.
काबुल में राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी से मुलाक़ात के बाद उन्होंने कहा कि युद्ध का ज़िम्मेदार अंत होना चाहिए हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि ये कब होगा.
ऑस्टिन ने कहा कि ज़ोर हिंसा कम करने और वार्ता के ज़रिए संघर्ष को समाप्त करने पर होना चाहिए.
बीते साल ट्रंप प्रशासन और तालिबान के बीच हुए समझौते के तहत अफ़ग़ानिस्तान से सभी अमेरिकी बलों के लौटने पर सहमति बनीं थी.
लेकिन इस बात को लेकर सवाल हैं कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तानी सरकार के साथ वार्ता करने के अपने वादे पर क़ायम रह पाएगा या नहीं.
नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान से एक मई तक सभी सैनिकों को वापस बुला लेने की तय समयसीमा को हासिल करना मुश्किल होगा.
बाइडन के इस बयान के बाद तालिबान ने अंजाम भुगतने की चेतावनी भी दी है.
ऑस्टिन अफ़ग़ानिस्तान जाने वाले बाइडन प्रशासन के पहले उच्च स्तरीय अधिकारी हैं. एशिया के अपने दौरे के समापन वो काबुल पहुंचे थे.
पत्रकारों से बात करते हुए ऑस्टिन ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि क्या तालिबान समझौते के तहत अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी कर रहा है या नहीं.
न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक रक्षा मंत्री ने कहा, 'ये जाहिर है कि देश में हिंसा ऊंचे स्तर पर है.'
उन्होंने कहा, 'हम चाहते हैं कि हिंसा कम हो और अगर हिंसा कम हुई तो इससे बातचीत के लिए अच्छा माहौल बनेगा और कूटनीतिक काम के नतीजे मिल सकेंगे.'
आशंकाएं ज़ाहिर की गई हैं कि यदि दीर्घकालिक समझौता होने से पहले अफ़ग़ानिस्तान से सभी विदेशी सुरक्षा बल लौट गए तो तालिबान फिर से सत्ता हथिया सकता है.
अमेरिका कहना है कि उसके क़रीब ढाई हज़ार सैनिक अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में हैं.
क्या था अमेरिका-तालिबान समझौता?
ट्रंप प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी को प्राथमिकता बनाया था.
फ़रवरी 2020 में हुए समझौते के तहत अमेरिका को चौदह महीनों के भीतर अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैन्यबल वापस बुलाने थे. बदले में तालिबान को अपने वादे पूरे करने थे जिनमें अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा को मज़बूत न होने देना भी शामिल था. साथ ही तालिबान को राष्ट्रीय स्तर पर शांति वार्ता शुरू करनी थी.
इस ऐतिहासिक समझौते के बाद कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तालिबान ने विदेशी बलों पर तो हमले बंद कर दिए हैं लेकिन अफ़ग़ानिस्तानी सुरक्षा बलों पर उसके हमले जारी हैं.
अफ़ग़ानिस्तान सरकार के साथ वार्ता के लिए तालिबान अपने हज़ारों लड़ाकों की रिहाई की शर्त रखी थी.
इसके बाद तालिबान और सरकार के बीच क़तर की राजधानी दोहा में सीधी वार्ता शुरू तो हुई लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है.
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