भारत में मुसलमानों के मुद्दों पर अब तक चुप रहे अरब देश नूपुर शर्मा की टिप्पणी पर क्यों हुए सख़्त

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- Author, सईदा अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी बांग्ला, ढाका
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
भारत में पिछले दिनों बीजेपी के दो पूर्व प्रवक्ताओं की पैग़ंबर मोहम्मद पर अपमानजनक टिप्पणी के मामले पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया हुई जिसके बाद बीजेपी को अपने प्रवक्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी पड़ी और भारत सरकार भी इस मामले पर सफ़ाई देने पर विवश हुई.
बीजेपी की अब निलंबित हो चुकीं राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने 26 मई को एक टीवी कार्यक्रम में पैग़ंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ जो टिप्पणी की थी उसके वायरल होने के बाद सबसे पहले अरब देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया की. क़तर, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देशों ने तल्ख़ शब्दों में अपनी आपत्ति जताई और कई ने भारतीय राजदूतों को भी तलब किया.
वैसे, 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हमलों की बातें उठती रही हैं लेकिन यह पहला मौक़ा था जब अरब देशों ने इतनी कड़ी प्रतिक्रिया दी.
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प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि अरब देशों का विरोध चौंकाने वाला है क्योंकि बीते कुछ सालों में भारत और अरब देशों के संबंध मज़बूत हुए हैं. इसके साथ ही उनका रवैया इसलिए भी हैरान करता है क्योंकि अरब देश आमतौर पर भारत के घरेलू मामलों में दख़ल नहीं देते हैं.
जानकार ध्यान दिलाते हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत में गो-रक्षा या अन्य बातों को लेकर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हमलों की घटनाएँ हुईं, लेकिन अरब देशों की ओर से कभी भी कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया.
विश्लेषकों का कहना है इस बार प्रतिक्रिया के पीछे दो मुख्य वजह हैं, पहली वजह ये है कि इस बार ये मामला पैग़ंबर से जुड़ा था और दूसरी वजह रही सोशल मीडिया.
नूपुर शर्मा के बयान के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जिसके बाद अरब जगत के बहुत से लोगों ने नाराज़गी भरे कमेंट किए और कइयों ने भारतीय उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान तक किया.

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सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान में पूर्व भारतीय राजदूत तलमीज़ अहमद ने कहा कि खाड़ी देशों में सोशल मीडिया पर जिस तरह की बहस छिड़ गई उसके बाद अरब नेता एक पक्ष लेने के लिए मजबूर हो गए.
तलमीज़ अहमद ने कहा, "नूपुर शर्मा ने जो बयान दिया था वो पैग़ंबर मोहम्मद और उनके परिवार को लेकर दिया था. इस्लाम में अल्लाह के बाद पैग़ंबर मोहम्मद सबसे बड़े हैं और मुस्लिम समुदाय उनके बारे में किसी भी तरह की अपमानजनक टिप्पणी को स्वीकार नहीं कर सकता. यह वो रेखा है जिसे पार नहीं किया जाना चाहिए था, लेकिन इस मामले में सीमा का उल्लंघन हुआ है."
तलमीज़ अहमद कहते हैं, "सोशल मीडिया पर पहली प्रतिक्रिया आई थी. यह सोशल मीडिया की ताक़त ही थी जिसने इस क्षेत्र में धार्मिक और राजनीतिक नेताओं पर दबाव डाला. और इसे नज़रअंदाज़ करने का कोई विकल्प नहीं था."
भारत और अरब देशों के बीच संबंध
बीते दो दशकों में, खाड़ी और अरब देशों के साथ भारत के संबंधों में सुधार हुआ है. वे एक-दूसरे के काफी क़रीब आए हैं. यह नज़दीकी ना सिर्फ़ रणनीतिक है बल्कि आर्थिक स्तर पर भी है.
मौजूदा समय में भारत के कुल आयात का आधा खाड़ी देशों के गठबंधन, 'गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल' के छह सदस्य देशों से आता है.
ईरान और इराक को मिलाकर भारत का 70 फ़ीसदी पेट्रोल खाड़ी देशों से आता है.
भारत के प्राकृतिक गैस के वार्षिक आयात का आधा क़तर से आता है.
इन आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इन देशों के साथ भारत के व्यापारिक संबंध काफी मज़बूत हैं.
भारत, यूएई को सालाना 25 अरब डॉलर का निर्यात करता है. इसके अलावा, खाड़ी के छह देशों में 65 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं. शेष अरब देशों में भी बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं.

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'एशिया प्रोग्राम एट द विल्सन सेंटर' के डायरेक्टरमाइकल कुगलमैन का कहना है कि इन कारणों से, भारत की अर्थव्यवस्था खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर करती है.
उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व, भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है. भारत अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के लिए खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है. इनमें ईंधन, तेल, गैस और बाहरी देशों से भेजी गई मुद्रा भी शामिल है.
वह कहते हैं, "खाड़ी के देश भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में से भी हैं और यही कारण है कि भारत के लिए क़तर समेत अन्य देशों की प्रतिक्रिया पर तत्काल कार्रवाई करना अनिवार्य हो गया था.'
हालांकि कुगलमैन का कहना है कि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत ही खाड़ी देशों पर निर्भर है बल्कि खाड़ी देश भी अपनी कई ज़रूरतों के लिए भारत पर निर्भर हैं, यह साझेदारी का संबंध है.

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क्या रहा है इतिहास
अरब जगत के साथ भारत के रिश्ते आज चाहे जैसे हों लेकिन एक इतिहास रहा है जब भारत और अरब देशों के बीच संबंध अच्छे नहीं थे.1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो अरब देशों का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहा.
कश्मीर मुद्दे पर भी अरब देशों ने पाकिस्तान का ही समर्थन किया, शायद इसी वजह से भारत के साथ अरब देशों के रिश्ते कभी बहुत मज़बूत और सौहार्दपूर्ण नहीं रहे.
भारत ने पहली बार साल 2002 में अरब लीग के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए. उस समय तक ये संबंध बेहद औपचारिक, महज़ तेल के आयात और भारतीय प्रवासियों के अरब जाने तक ही सीमित थे.
लेकिन 2014 में जब बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला, तब से अरब देशों के साथ, ख़ासतौर पर खाड़ी देशों के साथ भारत के रिश्तों में व्यापक सुधार आया. और शायद यही वजह है कि पीएम मोदी ने ख़ुद भी काफी कुछ किया.
भारत की न्यूज़ वेबसाइट द वायर की पत्रकारदेवीरूपा मित्रा का कहना है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से निश्चित तौर पर संबंध बेहतर हुए हैं.
2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, अरब देशों, विशेषकर खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों में सुधार हुआ.
देवीरूपा मित्रा ने कहा, "अगर आप ग़ौर करें तो पाएंगे कि मोदी सरकार और खाड़ी देशों के बीच जो संबंध हैं वे बेहद सहज हैं."
मोदी सरकार ने यूएई, कतर, सऊदी अरब और हर शाही परिवार के साथ निजी संबंधों को मज़बूत करने के लिए काफी मेहनत की है. शाही परिवार के साथ मोदी की तस्वीरें भी इसका सुबूत हैं कि मोदी अपने संबंधों को मज़बूत करने के लिए दृढ़ संकल्प हैं.
इसके अलावा साल 2016 में अबू धाबी में पहला हिंदू मंदिर भी बनाया गया था.

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भारत की कार्रवाई
जानकारों का मत है कि इन्हीं कारणों से भारत ने अरब दशों की प्रतिक्रिया के कुछ समय बाद ही नूपुर शर्मा को निलंबित कर दिया और दिल्ली बीजेपी की मीडिया सेल के प्रमुख नवीन जिंदल को पार्टी से निकाल दिया.
बीजेपी की ओर से एक बयान में कहा गया कि वह किसी भी धर्म या किसी भी धार्मिक व्यक्ति का अपमान करने वाले की निंदा करते हैं. किसी भी समुदाय या धर्म का अपमान करना या उसे नीचा दिखाना पार्टी की विचारधारा के विरूद्ध है.
जानकार मानते हैं कि जिस तरह से यूक्रेन-रूस युद्ध तुरंत ख़त्म होता नहीं दिख रहा है, ऐसे में दुनिया के कई देश ऊर्जा की आपूर्ति और इसके संभावित संकट को महसूस कर रहे हैं. ऐसे में भारत अपने किसी भी क़दम से ऊर्जा के सुरक्षित स्रोत को जोखिम में नहीं डालना चाहेगा.
इसके अलावा इस बात का भी डर है कि अरब देशों में काम के लिए गए और वहां रहने वाले भारतीयों को भी मुश्किल हो सकती है. इसलिए विश्लेषकों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए भारत के पास त्वरित कार्रवाई करना ही एकमात्र रास्ता था.
हालांकि एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि नूपुर शर्मा और जिंदल को हटाया जाना पर्याप्त नहीं है.
दुबई के पत्रकार सैफ़ुर रहमान का कहना है कि यहां सामाजिक संगठन इतने मज़बूत नहीं हैं, ना ही यहां कोई राजनीतिक संगठन है. ऐसे में ज़्यादातर लोग अपनी नाराज़गी सोशल मीडिया के माध्यम से ही ज़ाहिर करते हैं लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था यहां नहीं है, जो इस विरोध को और आगे ले जा सके.
क्या अरब में मिलने वाली नौकरियों पर होगा असर
विश्लेषकों का कहना है कि अब जब यह शुरुआती विवाद थमता सा नज़र आ रहा है, ऐसे में यह देखना अहम होगा कि क्या अरब देशों की इस प्रतिक्रिया पर भारत में कोई दीर्घकालिक असर होगा. हालांकि जैसी स्थिति अब नज़र आ रही है उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि ना तो भारत और ना ही अरब देश ये चाहेंगे कि इस मामले को और तूल दिया जाए.
लेकिन पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद अंदेशा जताते हैं कि इस घटना का असर आने वाले दिनों में भारतीय कामगारों की नियुक्ति पर हो सकता है.
तलमीज़ अहमद कहते हैं, "पहले वे अरब के नागरिकों को ही नियुक्त किया करते थे. उसके बाद 80 के दशक में उन्होंने पाकिस्तानियों को रखना शुरू किया लेकिन इस्लामी चरमपथियों के साथ उनके संबंध पाए गए. इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान से हटकर भारतीयों को रखना शुरू किया. भारतीय बहुत गैर-राजनीतिक होते हैं, वे घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करते हैं. उन्होंने भारतीयों को नौकरी दी, ना कि किसी समुदाय विशेष को."
वह आगे कहते हैं,"खाड़ी देशों में कुल कामगारों का 12 से 15 फ़ीसद भारतीय मुस्लिम हैं. लेकिन मेरी चिंता यह है कि हो सकता है कि नौकरी देने वाले अब यह सोचने लगे कि उन्हें किसी भी तरह का कट्टरपंथी नहीं चाहिए जिसकी वजह से सामाजिक सौहार्द बिगड़े.
हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि अभी ऐसा लग रहा है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तनावपूर्ण स्थिति का कूटनीतिक समाधान निकाल लिया है.
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