फ़ेसबुक की जानकारी हुई लीक

एक सुरक्षा सलाहकार ने फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वाले 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों के फ़ेसबुक पर बने पन्नों को स्कैन किया और उन्हें इंटरनेट पर जारी कर दिया.
ये वो जानकारी है जो तकनीकी रुप से छिपी नहीं होतीं हैं और इन्हें कोई भी पढ़ सकता है.
सुरक्षा सलाहकार रॉन बोल्स का कहना है कि निजता से जुड़े मुद्दों पर बहस छेड़ने के लिए उन्होंने ऐसा किया है. हालांकि फ़ेसबुक के प्रतिनिधियों का कहना है कि ये जानकारी हर किसी के लिए पहले से ही इंटरनेट पर मौजूद थीं.
ये जानकारी एक फ़ाइल के रुप में इंटरनेट पर जारी की गईं जिसे डाउनलोड किया जा सकता है. इस फाइल में सदस्यों के नाम, उनके प्रोफ़ाइल कर पहुंचने का लिंक और आईडी नंबर मौजूद है.
इंटरनेट पर ये फ़ाइल तेज़ी से फैल रही है और ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे डाउनलोड कर देखना चाहते हैं.
ल्यूसिफ़र69 नामक एक सदस्य ने कहा कि “ये सूची बेहतरीन है और थोड़ा डराती भी है.’’
बीबीसी को जारी किए गए एक वक्तव्य में फ़ेसबुक ने कहा कि ये जानकारी तो पहले से ही वेबसाइट पर मौजूद थीं.
वक्तव्य में लिखा है,“ जो लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल करते हैं उन्हें इस बात का अधिकार है कि वो ये तय कर सकें कि कौन सी जानकारी लोगों तक पहुंचानी हैं और कौन सी नहीं.’’
“इस मामले में एक अनुसंधानकर्ता ने वही जानकारी इक्कठी कर जारी की हैं जो पहले से ही गूगल, बिंग और दूसरे सर्च इंजन पर उपलब्ध थीं.’’
निजता का सवाल
हालांकि निजता के अधिकार को लेकर काम करने वाले संगठन प्राइवेसी इंटरनेशनल ने बीबीसी से कहा कि फ़ेसबुक को पहले ही चेतावनी दे दी गई थी कि इस तरह की कोई घटना हो सकती है.
प्राइवेसी इंटरनेशनल के प्रतिनिधि साइमन डेविस ने कहा कि फे़सबुक के पास हज़ारों इंजीनियर हैं और वो इस तरह की गतिविधि को रोक सकता था.
डेविस ने कहा कि, "लोगों को आमतौर पर नहीं पता कि निजी जानकारी को कैसे छिपाया जा सकता है. ये उसी का नतीजा है.’’

गौरतलब है कि इस साल जून में फ़ेसबुक के सदस्यों की संख्या 50 करोड़ से ज़्यादा पहुंच गई थीं.
साल की शुरुआत में फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वालों ने इस बात को लेकर हंगामा भी किया कि फ़ेसबुक पर निजी जानकारी छिपाने की तकनीक यानी प्राइवेसी सेटिंग्स काफ़ी मुश्किल हैं. इसके बाद फ़ेसबुक ने इस तकनीक को सरल बनाया था.
हाल फ़िलहाल फ़ेसबुक की कार्यप्रणाली ऐसी है कि पेज बनाने के बाद यूज़र्स की सभी जानकारियां इंटरनेट पर मौजूद होती हैं. जो लोग अपनी जानकारियां बांटना नहीं चाहते उन्हें तकनीक का सहारा लेकर इन्हें छिपाना होता है.
































