आर्थिक मंदी से कार्बन उत्सर्जन में कमी

कार्बन उत्सर्जन
इमेज कैप्शन, कार्बन उत्सर्जन विश्व से सामने एक बड़ी चिंता का मुद्दा है

पर्यावरण पर वैश्विक आर्थिक मंदी का असर जानने के लिए किए गए पहले सबसे बड़े सर्वेक्षण में कहा गया है कि इस मंदी से ग्रीन हाउस समूह की गैसों के उत्सर्जन में ख़ासी कमी दर्ज की गई है.

यह सर्वेक्षण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने किया है और उसका कहना है कि ग्रीन हाउस समूह की गैसों में आई इस गिरावट से यह अवसर उपलब्ध हुआ है कि तमाम देश कार्बन गैसों के भारी मात्रा में होने वाले उत्सर्जन पर क़ाबू पाने के लिए प्रयास जारी रखें.

सर्वेक्षण में पाया गया है कि आर्थिक मंदी के प्रभाव में ऐसे ईंधन का इस्तेमाल बहुत कम किया गया है जिससे कार्बन डॉय आक्साइड समूह की गैसों का उत्सर्जन होता है और यह कमी इतनी है जितनी की पिछले चार दशकों में भी नहीं दर्ज की गई.

कार्बन उत्सर्जन में हुई इस कमी के लिए एक कारण यह भी बताया गया है कि औद्योगिक उत्पाद में कमी होने की वजह से उन भारी मशीनों का इस्तेमाल कम हुआ है जिनके चलने और उनमें ईंधन के प्रयोग से कार्बन उत्सर्जन होता है.

इसके अलावा बहुत से देशों की सरकारों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए व्यापक नीतियाँ भी अपनाई हैं और उनका भी असर नज़र आ रहा है.

साथ ही कोयले से चलने वाले नए बिजली घर बनाने की योजनाओं को ठंडे बस्ते में डालने से भी ख़ासी मदद मिली है.

अनुमान

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने अनुमान व्यक्त किया है कि कार्बन उत्सर्जन में जो यह कमी दर्ज की गई है उसमें से लगभग एक चौथाई का श्रेय उन कठोर नियमों को जाता है जो विभिन्न सरकारों ने बनाए हैं.

दिसंबर 2009 में कोपनहेगेन में पर्यावरण सम्मेलन होने वाला है जिसमें विश्व नेता इन ताज़ा आँकड़ों पर विचार करने वाले हैं.

उससे पहले मंगलवार, 22 सितंबर को अनेक देशों के नेता न्यूयॉर्क में इकट्ठा होंगे. इस सम्मेलन का आयोजन संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने किया है.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुख्य अर्थशास्त्री फ़ातिह बीरल का कहना था कि कार्बन उत्सर्जन में इस कमी से अब उन लक्ष्यों को हासिल करना कम मुश्किल होगा जो पर्यावरण में ख़तरनाक बदलाव से बचने के लिए ज़रूरी हैं.

उनका कहना था कि कोपनहेगन में अगर कोई सहमति होती है तो इससे संकेत मिलेगा कि पर्यावरण की दिशा में किसी टिकाऊ हल और निश्चित दिशा की तरफ़ बढ़ा जा सकेगा लेकिन अगर यह अवसर गँवा दिया जाता है तो उसके बाद किसी टिकाऊ हल की दिशा में आगे बढ़ना बहुत मुश्किल और ख़र्चीला विकल्प होगा.

यह सर्वेक्षण अक्तूबर में सार्वजनिक किए जाने की संभावना है.