उड़ीसा के तट भी चपेट में

विलुप्त गाँव
इमेज कैप्शन, ओडीशा के इस तटीय स्थान पर कभी गाँव बसता था
    • Author, संदीप साहू,
    • पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

जलवायु परिवर्तन ने उड़ीसा के भी तट पर क़हर बरपाने शुरू कर दिए हैं. समुद्र के जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि की वजह से राज्य के 480 किलोमीटर लंबे तट में से क़रीब 110 किलोमीटर इलाक़े में बड़े स्तर पर भूमि क्षय हो रहा है, लेकिन सबसे बुरी स्थिति केंद्रपाड़ा ज़िले के सतभैया की है.

सतभैया कभी सात गाँवों का समूह हुआ करता था, जिनमें से पाँच को समुद्र निगल चुका है. अब बचे हुए दो गाँवों का अस्तित्व ही ख़तरे में है.

सतभैया से विस्थापित लोगों का पुनर्वास आज तक नहीं हो पाया है. पहली बार के विस्थापितों में कई लोग वहाँ से दो किलोमीटर दूर एक ख़ाली जगह पर बस गए, जो अब बराहीपुर गाँव के नाम से जाना जाता है. बाद में विस्थापित लोगों को समाजसेवी रमा देवी की नेतृत्व में वहाँ से छह किलोमिटर दूर ओकिलापाल में बसा गया है. विस्थापितों में कईयों को तीन तो कईयों को चार बार अपना ठिकाना बदलना पड़ा है.

राज्य सरकार 70 की दहाई से पुनर्वास के लिए योजना बना रही है, लेकिन अभी तक इनमें से एक भी योजना शुरू नहीं हो पाई है. विस्थापितों के पुनर्वास के लिए पहले मगरकंडा में स्थान निर्धारित किया गया था. लेकिन बाद में पता चला कि वो जंगल की जम़ीन है. इसके बाद आजतक कोई नया स्थान निर्धारित नहीं किया जा सका है.

सरकार से नाराज़गी

पुनर्वास की समस्या को लेकर सरकार की बेरुख़ी से लोग बेहद नाराज़ है.

सतभैया के सरपंच सस्मिता दास अपनी नाराज़गी को इन शब्दों में बयान करते हैं, "वर्ष 2004 के चुनाव से पहले मुख्यमंत्री आए थे, मगरकंडा में उन्होंने पुनर्वास स्थल का शिलान्यास भी किया. लेकिन चुनाव के ख़त्म होने के बाद चुप्पी साध ली. वर्ष 2008 में जब हम लोगों ने अनशन किया, तो प्रशासन ने हमसे एक महीने का समय माँगा, लेकिन आजतक कुछ नहीं हुआ. बहुत वादे किए गए हैं, पर हम जहाँ थे वहीं हैं."

समुद्र के लगातार आगे बढ़ते रहने से न केवल लोग विस्थापित हुए हैं, बल्कि उनकी जीविका कृषि पर भी इसका बुरा असर पड़ा है.

अपना घर और खेती दोनों गँवा चुके कानहापुर गाँव के नलिनी कांत बिसवाल कहते हैं, "खेती पर अब लोगों को भरोसा नहीं रहा. समुद्र में ज्वार आने से नमकीन पानी खेतों में आ जाता है. जिससे फ़सल बर्बाद हो जाती है. इस डर से लोग अब खेती कम ही करते हैं. एकाध परिवार को छोड़ लगभग सभी परिवार से कोई न कोई बाहर के प्रदेश में मज़दूरी करते हैं, जिससे घर का गुज़ारा होता है."

ये सच है कि सतभैया इलाक़े में समुद्र के आगे बढ़ने की प्रक्रिया लगभग 40 वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी. लेकिन जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ये प्रक्रिया काफ़ी तीब्र हुई है. एक अंदाज़े के अनुसार पिछले 10 वर्षों में समुद्र औसतन 50 मीटर प्रति वर्ष की गति से आगे बढ़ रहा है.

कारण

घनश्याम पाँडा
इमेज कैप्शन, घनश्याम पांडा मानते हैं कि 60 के दशक में बने पारादीप बंदरगाह ही उनकी बर्बादी के असल कारण हैं

बराहीरपुर के 80 वर्षीय घनश्याम पांडा इसके लिए 60 के दशक में बने पारादीप बंदरगाह को ज़िम्मेदार मानते हैं.

पाँडा कहते हैं, "जबसे पारादीप में बंदरगाह बना है, तब से समुद्र एक के बाद एक गाँव निगल रहा है. जब हम लोग सतभैया छोड़कर यहाँ आकर बसे थे तो ये जगह समुद्र से क़रीब दो किलोमीटर दूर था. लेकिन अब समुद्र कुछ मीटर दूर रह गया है. जल्दी ही हमें ये जगह भी छोड़नी पड़ेगी."

विशेषज्ञ भी सतभैया की दुर्गति के लिए इसके आसपास चल रहे विकास परियोजनाओं को ही दोषी मानते हैं.

राज्य के जानेमाने पर्यावरणविद डॉक्टर सुंदर नारायण पात्रा कहते हैं, "भीतारकणिका पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही संवेदनशील इलाक़ा है. यहाँ पहले पारादीप बंदरगाह बना, फिर व्हीलर आईलैंड में प्रक्षेपात्र परीक्षण हुआ. अब वहाँ से कुछ ही दूर पारादीप से भी बड़ा धमरा बंदरगाह बन रहा है. सतभैया की दुर्गति इन सभी परियोजनाओं का मिलाजुला परिणाम है."

एक घर का हाल
इमेज कैप्शन, तटीय इलाक़े में एक घर का हाल

जलवायु परिवर्तन पर काम कर रहे समाजसेवी संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवेल्पमेंट के निदेशक तपन पढी कहते हैं, "इस इलाक़े में कोई भी विकास योजना शुरू करने से पहले इस बात का सही आंकलन होना चाहिए कि तटवर्तीय इलाक़े पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा जो अभी नहीं किया जा रहा है."

सतभैया एक तरह से राज्य के लिए चेतावनी है, लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि राज्य सरकार ने इससे कोई सीख ली है. सतभैया के विनाश में पारादीप की भूमिका के बारे में भी जानते हुए भी सरकार उड़ीसा के तट पर छह और बंदरगाहों की स्थापना कर रह रही है और इसके अलावा कई बड़े उद्योग भी लगाए जा रहे हैं. जिनमें पारादीप के निकट प्रस्तावित पास्को स्टील प्लांट सबसे बड़ा है.

ज़ाहिर है उड़ीसा के तट पर मंडरा रहे ख़तरों के बादल आने वालों दिनों में और घने होने जा रहे हैं.