जलवायु पर दो मसौदे पेश

जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन में चल रहे संयुक्त राष्ट्र सम्मलेन में समझौते के लिए दो मसौदे पेश किए गए हैं.
इन मसौदों में धनी देशों के लिए वर्ष 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की कटौती करने का लक्ष्य रखा गया है.
अगले हफ़्ते कोपेनहेगन में एकत्रित हो रहे दुनिया भर के नेता इन्ही मसौदों के आधार पर चर्चा करेंगे.
जो दो मसौदे पेश किए गए हैं उनमें से एक तो क्योटो संधि के विस्तार की तरह है और दूसरे में वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का प्रस्ताव किया गया है.
जो इन मसौदों में नहीं कहा गया है वह यह है कि आवश्यक क़दम उठाने के लिए धन की आपूर्ति कहाँ से होगी और यह क़ानूनी रुप से बाध्यकारी कब से होगी.
पर्यावरण संस्थाओं ने इन मसौदों का स्वागत करते हुए इसे भविष्य की ओर एक अच्छा क़दम बताया है.
मसौदे
बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता मैट मैक्ग्राथ का कहना है कि अच्छा यह है कि धनी देशों की अपेक्षाओं के विपरीत समझौते के लिए एक की जगह दो मसौदे पेश किए गए हैं.
इनमें से एक विकासशील देशों की मांग को पूरा करता है और वह क्योटो संधि के विस्तार की तरह है जबकि दूसरा मसौदा सभी के सहयोग से दीर्घकालिक प्रयासों को रेखांकित करता है.
इन मसौदों में कई चीज़ों को अभी भी कोष्ठकों में रखा गया है जिसका मतलब यह है कि इन मुद्दों पर अभी भी कोई सहमति नहीं बन पाई है. मसलन, वैश्विक तापमान में कमी का लक्ष्य डेढ़ प्रतिशत रखा जाए या फिर दो प्रतिशत.
इन मसौदों में कहा गया है कि धनी देश वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत तक कटौती करें और ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इन देशों को वर्ष 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की कटौती करने को कहा गया है.
यह लक्ष्य अभी तक चल रही चर्चाओं से कहीं अधिक है.
लेकिन क्या इस लक्ष्य को हासिल करना संभव होगा, इस सवाल पर सम्मेलन की अध्यक्ष और डेनमार्क की मंत्री कोनी हेडेगार्ड ने कहा, "हम कुछ समय पहले जहाँ थे उसकी तुलना में लक्ष्य के ज़्यादा क़रीब हैं. यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह सिर्फ़ मसौदा है और इस पर चर्चा होनी है. यह सम्मलेन की सबसे बड़ी चुनौती है और हमें पता है कि यह बहुत कठिन है."
इस बीच यूरोपीय संघ ने आर्थिक सहायता का जो प्रस्ताव रखा है उसका संयुक्त राष्ट्र के वार्ताकारों सहित कई देशों ने स्वागत किया है.
लेकिन अपेक्षाकृत कम विकसित और द्वीप देशों ने इस राशि को बेहद अपर्याप्त बताया है.
कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने चिंता ज़ाहिर की है कि यूरोपीय संघ सहायता का जो प्रस्ताव दे रहा है उसमें नई धनराशि नहीं है बल्कि वह सहायता के पुराने आश्वासन को नए रुप में प्रस्तुत करने जैसा है.












