विदेशी पर्यटकों की पसंद क्यों बन रहा है बीजिंग

    • Author, लिंडसे गैलोवे
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

प्रधानमंत्री मोदी के चीन दौरे की वजह से वहां का वुहान शहर ख़ूब सुर्ख़ियों में रहा. मीडिया ने बताया कि किस तरह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राजधानी बीजिंग से बाहर आकर किसी नेता की अगवानी की. प्रोटोकॉल तोड़ा... वग़ैरह... वग़ैरह...

मगर, चीन की सत्ता का असल केंद्र तो राजधानी बीजिंग ही है.

अमरीका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश माना जाता है. लेकिन जिस तेज़ी से चीन अपने पैर फैला रहा है, वो दिन दूर नहीं जब चीन दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त बनकर उभरेगा. वैसे आर्थिक रूप से उसने बहुत से देशों को अपना उपनिवेश बना ही लिया है. दुनिया भर में चीन के बने सामान ख़रीदे और बेचे जा रहे हैं.

जो लोग चीन के साथ आर्थिक रिश्ता बनाने के ख़्वाहिशमंद होते हैं. उनके लिए राजधानी बीजिंग पहली पसंद है. दुनिया भर से लोग बीजिंग आकर यहां अपना कारोबार या नौकरी कर रहे हैं.

ऐसे ही एक शख़्स हैं जर्मनी के क्लीमेंस सेही का कहना है कि बीजिंग में रहने का मतलब है, एक नए युग में रहकर ज़िंदगी का तजुर्बा करना.

सवाल उठता है कि आख़िर बीजिंग शहर विदेशी नागरिकों की पसंद कैसे बन रहा है?

चीन ने तकनीक में बहुत तरक्की की

चीन ने तकनीक के क्षेत्र में सबसे ज़्यादा तरक़्की की है. तकनीक के सहारे ही चीन ने अपने लोगों की रोज़मर्राह की ज़िंदगी बहुत आसान कर दी है. बीजिंग तेज़ी से कैशलेस सोसाइटी बनने के रास्ते पर है. यहां के लोग हाई क्वालिटी इंटरनेट का मज़ा लेते हैं. इंटरनेट के सहारे ही तमाम तरह के लेन-देन स्मार्टफ़ोन की मदद से हो जाते हैं.

बीजिंग में स्मार्टफ़ोन से ज़्यादा एडवांस तकनीक मौजूद है, जो शायद दुनिया के दूसरे देशों में उतने व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल नहीं की जाती है. ये तकनीक है, चेहरा पहचानने वाला सॉफ़्टवेयर. यानी बैंक खाते के मालिक का चेहरा पहचानने के साथ पैसों का लेन-देन हो जाता है. इस तकनीक की मदद से लोगों को बैंकों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते. साथ ही नक़दी का लेनदेन करने वालों का रोल भी नहीं रहता.

हाल ही में ये एलान किया गया है कि बीजिंग में बहुत से टेक्नोलॉजी पार्क तैयार किए जाएंगे. ये पार्क क़रीब 13 अरब युआन की लागत से तैयार होंगे. ऐसे टेक्नोलॉजी पार्क में लगभग चार सौ तरह के कारोबार के लिए तकनीक विकसित की जाएगी. ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस बायोमेट्रिक सिस्टम पर आधारित होंगे. इसमें बिना ड्राइवर वाली कारें भी शामिल हैं.

चीन के लोग खाने के भी शौक़ीन

तकनीकी तौर पर बीजिंग शहर बहुत आगे बढ़ रहा है. लेकिन, खान-पान में यहां का चलन आज भी पुराना ही है. जिस तरह मुंबई में पेट भरने के लिए वडा-पाव और दिल्ली में जगह-जगह छोले भटूरे और छोले चावल माक़ूल दाम पर मिल जाते हैं, उसी तरह बीजिंग मे हरेक नुक्कड़ पर पारंपरिक खाने बेचने वाले मिल जाएंगे जो सुबह से ही अपनी दुकान सजा लेते हैं. लिहाज़ा खाने के लिए कोई परेशानी नहीं हो सकती.

इसके अलावा चीनी लोग ख़ुद भी खाने के शौक़ीन हैं. पूरे साल कई तरह के फेस्टिवल का आयोजन होता ही रहता है. मसलन, फ़रवरी महीने में चीनी नए साल का आयोजन हुआ था जो कई दिन तक चला. इसी तरह स्प्रिंग फ़ेस्टिवल का आयोजन भी किया गया. ऐसे मौक़ों पर बाहर से आकर रह रहे लोगों को बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के साथ मेल-जोल का मौक़ा मिलता है.

जर्मनी से बीजिंग आकर बसे क्लीमेंस सेही का कहना है कि चीनी लोग नए साल का जश्न पूरे जोश के साथ मनाते हैं. अप्रवासी भी मिलकर उनके साथ जश्न की तैयारी करते हैं.

चीनी भाषा विदेशियों के लिए टेढ़ी खीर

बीजिंग में विदेशी लोगों की आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. अप्रवासी स्थानीय लोगों के साथ मिल जुलकर रहने की पुरज़ोर कोशिश करते हैं. लेकिन भाषा इसके आड़े आते हैं.

चीनी भाषा सीखना अप्रवासियों केलिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. इसी वजह से अप्रवासी लोग चीन की संस्कृति पूरी तरह से नहीं अपना पा रहे हैं.

सेही कहते हैं कि बहुत से अप्रवासी यहां वर्षों से रह रहे हैं. इसके बावजूद वो आज भी ठीक से चीनी भाषा नहीं बोल पाते. जो लोग बिल्कुल भी चीनी भाषा बोल और समझ नहीं पाते हैं, वो दूसरे अप्रवासियों के साथ दोस्ती करते हैं जिनके साथ वो सहज महसूस करते हैं.

चीन की भाषा यानी मैन्डरिन सिखाने के लिए बीजिंग में आप को बहुत सी कक्षाएं मिल जाएंगी. अगर लोकल रेडियो के एक दो प्रोग्राम रोज़ सुन लिए जाएं और कुछ बुनियादी शब्द सीख लिए जाएं, तो दुकानदारों से आसानी से बात की जा सकती है.

चीनियों को अकड़ बर्दाश्त नहीं

पश्चिमी देशों में लोग सीधे-सपाट बात करने के आदी होते हैं, लेकिन चीनी लोग अपने स्थानीय मूल्यों की बहुत क़द्र करते हैं. कोई उनसे अकड़ कर या गुस्से में बात करे ये उन्हें मंजूर नहीं.

बीजिंग में रहने वाले अमरीकी शहर सैन फ़्रांसिस्को के नागरिक और ब्लॉगर माइक वू कहते हैं कि आम बोल चाल में चीनी लोग भले ही अकड़ बर्दाश्त नहीं करते, लेकिन ख़रीदारी के मामले में बीजिंग का हाल भारतीय शहरों जैसा ही है.

हिंदुस्तान के किसी भी बाज़ार के दुकानदार की तरह बीजिंग में भी दुकानदार अक्सर अपने सामान की क़ीमत बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं. कई बार तो क़ीमतों में 70 फ़ीसदी तक मोल-भाव की गुंजाइश रहती है. अप्रवासियों को तो दाम और भी बढ़ा चढ़ाकर बताए जाते हैं. लिहाज़ा बीजिंग में ज़बान में मिठास के साथ खुलकर मोल-भाव किया जा सकता है.

लेकिन बीजिंग है सबसे प्रदूषित राजधानी

तमाम ख़ूबियों के बावजूद बीजिंग में रहने का एक बड़ा नुक़सान है. यहां की आबो-हवा इतनी ख़राब है कि बिना मास्क लगाए निकलना मुश्किल है. बीजिंग ने तकनीक के मामले में तो दुनिया के नक़्शे पर अलग पहचान बनाई है.

पर प्रदूषण के मामले में भी बीजिंग का कोई सानी नहीं है. ये दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी है. हालांकि सरकार ने प्रदूषण पर क़ाबू पाने के लिए बहुत से क़दम उठाए हैं और अभी भी प्रयास जारी हैं. लेकिन इसके बावजूद हालात बहुत बेहतर नहीं हुए हैं.

गर्मी के मौसम में जब प्रदूषण का स्तर कुछ कम होता है तभी लोग नीले आसमान के दर्शन कर पाते हैं और पार्कों में जाकर बच्चों के साथ खेल पाते हैं.

बीजिंग की नाइट लाइफ़ भी अप्रवासियों को ख़ूब लुभाती है. इसके अलावा ये शहर कला, संगीत और इतिहास की महत्वपूर्ण और दिलचस्प घटनाओं से लबरेज़ है.

लिहाज़ा कहा जा सकता है बीजिंग आने वाला हर विदेशी नागरिक यहां से ख़ाली हाथ नहीं जा सकता. यहां सभी के लिए कुछ ना कुछ मौजूद है. तभी तो इतनी बड़ी संख्या में लोग यहां आ रहे हैं.

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