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अमेरिका-चीन-भारत, विदेश नीति में बांग्लादेश का झुकाव कहां है?
- Author, तफ़सीर बाबू
- पदनाम, संवाददाता बीबीसी बांग्ला
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
बांग्लादेश में तारिक़ रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार को सत्ता संभाले करीब डेढ़ महीने हो गए हैं.
इस सरकार के सत्ता में आने के कुछ दिनों बाद से ही ईरान युद्ध के मुद्दे पर पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची है.
दुनिया के विभिन्न देशों की तरह बांग्लादेश को भी ईंधन की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए मुश्किलों से जूझना पड़ रहा है.
इस बीच प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर मध्य पूर्व के देशों का दौरा कर चुके हैं. उनके इस दौरे का मुख्य मक़सद उस इलाके के देशों के साथ बांग्लादेश के संबंधों को मजबूत करना और युद्ध की स्थिति में वहां काम करने वाले बांग्लादेशी मजदूरों की खोज-ख़बर लेना था.
इस सप्ताह बांग्लादेश के विदेश मंत्री को भारत का दौरा करना है. फिलहाल वो अमेरिका के दौरे पर हैं.
इससे पहले अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के सहायक विदेश मंत्री एस.पाल कपूर ने बांग्लादेश का दौरा किया था.
कुल मिला कर विदेशों से संबंधों को मजबूत बनाने की कोशिश और इसी दौरान ईरान युद्ध जारी रहने की वजह से बांग्लादेश एक मुश्किल दौर से गुजर रहा है.
विदेश नीति के मामले में किसकी ओर झुक रहा है बांग्लादेश?
अवामी लीग के 16 साल के कार्यकाल के दौरान बांग्लादेश की पहचान मूल रूप से भारत के नजदीकी देश के तौर पर थी, हसीना सरकार के पतन के बाद अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान दोनों देशों के संबंधों में तेजी से गिरावट आई.
लेकिन इसी दौरान अमेरिका के साथ बांग्लादेश के संबंधों में नए सिरे से गर्माहट आई.
अब बीएनपी सरकार के सत्ता में रहने पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस नई सरकार की विदेश नीति किस देश की ओर झुक रही है? भारत, चीन या अमेरिका?
इस मुद्दे पर बांग्लादेश सरकार की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम का कहना है कि सरकार की विदेश नीति किसी खास देश पर केंद्रित नहीं है.
शमा बीबीसी बांग्ला से कहती हैं, "नई सरकार की प्राथमिकता बांग्लादेश के लोगों के हितों को सुनिश्चित करना है. सभी देशों के साथ बेहतर संबंध कायम रखना ही हमारी नीति है. बांग्लादेश के हितों की रक्षा करते हुए ही हमारे आपसी और बहुपक्षीय संबंध तय होंगे. हमारी विदेश नीति में बांग्लादेश के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी. यह किसी ख़ास देश को ध्यान में रख कर तय नहीं की जाएगी."
अमेरिका समर्थक नीति
बांग्लादेश अपनी विदेश नीति के मामले में तमाम देशों के साथ बेहतर संबंधों की बात कर रहा है, लेकिन इसकी पहली बड़ी परीक्षा ईरान युद्ध के सवाल पर होगी.
बांग्लादेश ने अपने पहले बयान में खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की तो आलोचना की. लेकिन उसने ईरान पर अमेरिका के हमले की आलोचना करने से परहेज किया.
सरकार ने अपने बयान में ईरान के जवाबी हमले की निंदा करते हुए इसे मध्य पूर्व के कई देशों की संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया. इसकी आलोचना के बाद बांग्लादेश ने एक नया बयान जारी किया. लेकिन इस बयान पर ईरान की ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया आई है.
बांग्लादेश में ईरान के राजदूत जलील रहीमी जहानबादी ने बीते बुधवार को सार्वजनिक तौर पर कहा कि ईरान के मुद्दे पर बांग्लादेश का बयान और स्पष्ट होना चाहिए था. जलील का कहना था कि उनके देश को उम्मीद थी कि बांग्लादेश ईरान में आक्रामक ताकतों की निंदा करेगा.
ईरान युद्ध पर जारी बयान के साथ ही अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान अमेरिका के साथ हुए वाणिज्यिक समझौते के मुद्दे पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या बांग्लादेश विदेश नीति के मामले में अमेरिका की ओर झुक रहा है?
हालांकि सरकार ने ऐसे आरोपों को खारिज कर दिया है.
विदेश मंत्री डॉक्टर ख़लीलुर रहमान इससे पहले अपने कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोहरा चुके हैं कि बांग्लादेश इस मामले में अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ रहा है.
विदेश नीति पर उठने वाले सवालों और इसकी आलोचना के बीच अमेरिका में बांग्लादेश के पूर्व राजदूत एम.हुमायूं कबीर का कहना है कि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि बांग्लादेश की विदेश नीति किसी खास देश की ओर झुकी है.
कबीर ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "पहले बयान में हमने खाड़ी क्षेत्र पर ख़ास ज़ोर दिया था. ईरान पर हुए हमले के बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया था. लेकिन अगले दिन सरकार की ओर से जारी एक अन्य बयान में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई के निधन पर शोक जताया था. यानी उन्होंने अपने बयान को संतुलित किया है. यह एक नई सरकार है. इसलिए परिस्थिति को समझने के लिए उनको कुछ और समय दिया जाना चाहिए."
अमेरिका, चीन और भारत के परस्पर विरोधी हितों में जटिलता
बांग्लादेश में सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं, अतीत में भारत, चीन या रूस जैसे देशों को लेकर भी खींचतान होती रही है. कुछ मामलों में इन देशों की भूमिका का असर बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति पर भी पड़ा है.
सरकार हालांकि इस मामले में संतुलन बनाने का दावा करती है लेकिन कई बार देखा जाता है कि किसी एक देश की कोई परियोजना दूसरे देश के असंतोष का कारण बन जाती है. भारत और चीन के मामले में तीस्ता परियोजना का उदाहरण दिया जा सकता है.
ढाका विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रोफे़सर डा. लैलुफर यास्मीन मानती हैं कि तीस्ता परियोजना चीन-भारत संबंधों के मामले में बांग्लादेश का लिटमस टेस्ट साबित होगी.
जिन मुद्दों से दो देशों के परस्पर हित जुड़े हैं, उन मामलों में फ़ैसला लेना बांग्लादेश के लिए आसान नहीं होगा.
यही वजह है कि तीस्ता परियोजना पर बरसों से बातचीत जारी रहने के बावजूद अब तक उसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है. अवामी लीग की तरह ही अंतरिम सरकार भी इस मुद्दे पर कोई फैसला नहीं ले सकी.
लेकिन डॉ. लैलुफर यास्मीन मानती हैं कि अगर देश के हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत के जरिए जरिए तमाम पक्षों के बीच आम सहमति बनाई जा सके तो इससे राष्ट्रीय हित में कोई भी फैसला लेने में सहायता मिलेगी.
यास्मीन कहती हैं, "कई मामलो में हितों का आपसी टकराव होता है. लेकिन अगर किसी मुद्दे पर बांग्लादेश के तमाम राजनीतिक दलों में आम सहमति बन जाए तो उसकी आलोचना कम होगी. ऐसा नहीं होने की स्थिति में यह संदेह सिर उठाता रहेगा कि कोई परियोजना शायद किसी ठोस वजह के कारण ही किसी खास देश को सौंपी गई है. यह एक पार्टी-आधारित विदेश नीति हो जाती है. इसी वजह से कभी आप पर चीन समर्थक होने के आरोप लगते हैं तो कभी भारत या अमेरिका समर्थक होने के. इससे बाहर निकलना होगा."
इस बीच ईंधन संकट से निपटने के लिए बांग्लादेश ने भारत से अतिरिक्त डीजल भेजने की मांग की है. इसके साथ ही अमेरिका के साथ भी उसके सौहार्दपूर्ण संबंध हैं.
बीती फरवरी में प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले तारिक़ रहमान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भेजे गए पत्र से साफ है कि अमेरिका इस संबंध को अपनी 'इंडो-पैसिफिक' रणनीति से जोड़ना चाहता है. पत्र में स्पष्ट तौर पर 'इंडो-पैसिफिक' की बात कही गई है.
लेकिन चीन इस मुद्दे पर चिंतित है.
डा. लैलुफर यास्मीन कहती हैं, "बांग्लादेश को इस बात का ध्यान रखना होगा कि अमेरिका के हितों की रक्षा करने के दौरान कहीं देश में चीन के निवेश में कोई बाधा नहीं पहुंचे. इसकी वजह यह है कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए चीनी निवेश और धन की ज़रूरत है."
इस बारे में पूछने पर अमेरिका में देश के पूर्व राजदूत एम. हुमायूं कबीर का कहना था कि अतीत में किसी देश के प्रति झुकाव का बांग्लादेश को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है. वैसी गलती अब दोहराई नहीं जा सकती.
उनका कहना था, "सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हमें भारत के साथ मिल कर काम करना होगा. भारत को भी हमारे साथ मिल कर काम करना होगा. इसकी वजह यह है कि दोनों देशों की लंबी सीमा एक-दूसरे से लगी है. इसके अलावा इस बात को ध्यान में रखना होगा कि बांग्लादेश करीब 50 अरब डॉलर का निर्यात करता है. लेकिन इसके लिए कच्चा माल चीन और भारत से आता है."
कबीर कहते हैं, "तमाम हित एक चेन की तरह आपस में जुड़े हैं. अब एक की अनदेखी कर दूसरे के साथ संबंध बहाल नहीं रखा जा सकता. किसी एक देश के साथ पक्षपात की स्थिति में जटिलताएं पैदा होंगी."
'किसकी नाराजगी महत्वपूर्ण नहीं'
लेकिन विभिन्न देशों के साथ पारस्परिक हितों के मामले में बांग्लादेश की भावी नीति क्या होगी?
इस सवाल पर विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम कहती हैं, "हम वही करेंगे जो बांग्लादेश के हित में बेहतर हो. इस मामले में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इससे कौन नाराज होगा."
उन्होंने बीबीसी बंगला से कहा, "भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता परियोजना के अलावा पानी के बंटवारे, व्यापार घाटा और सीमा समस्या जैसे मुद्दे हैं. आपसी बातचीत के जरिए ही इन तमाम मुद्दों को हल किया जाएगा. इसी तरह चीन और अमेरिका के साथ भी समान नीति के आधार पर संबंध रहेंगे. कौन किस नीति से नाराज होगा, इससे महत्वपूर्ण यह है कि बांग्लादेश के लोग किस बात से खुश होंगे और उनके हित में क्या बेहतर होगा. बांग्लादेश के हित सुनिश्चित करने के बाद हम देखेंगे कि किस देश की दिलचस्पी किस मुद्दे में हैं. पहले हमें यह तय करना होगा कि देश के लोग क्या चाहते हैं."
बांग्लादेश ने अपनी विदेश नीति साफ कर दी है. इसमें बांग्लादेश के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी.
लेकिन दिक्कत यह है कि ताकतवर देश भी इसी तरह पहले अपने हितों की रक्षा करना चाहते हैं और इसके लिए तरह-तरह से दबाव भी बनाते हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि इस दबाव को संभालना ही अब बांग्लादेश की विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.